सिंधु संधि पर हेग कोर्ट के फैसले का फायदा उठाने की कोशिश करेगा पाक,  भारत ने पहले ही कमजोर कर दी धार, कोर्ट को बताया गैरकानूनी

सिंधु जल संधि पर हेग कोर्ट के फैसले के बाद पाकिस्तान इसे अपनी जीत के तौर पर पेश कर रहा है। हालांकि, भारत ने इस कोर्ट को ही गैर-कानूनी करार दिया है।

Sep 13, 2026 - 20:57
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सिंधु संधि पर हेग कोर्ट के फैसले का फायदा उठाने की कोशिश करेगा पाक,  भारत ने पहले ही कमजोर कर दी धार, कोर्ट को बताया गैरकानूनी

इस्लामाबाद। हेग स्थित ऑर्बिट्रेशन कोर्ट (मध्यस्थता न्यायालय) के फैसले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि का मुद्दा एक बार फिर से सुर्खियों में हैं। इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में संधि पर भारत की रोक को गलत बताया है, जिसे पाकिस्तान अपनी जीत के तौर पर पेश कर रहा है। हालांकि, भारत ने फैसले को खारिज कर दिया है और सिंधु जल संधि पर हेग कोर्ट के अधिकार को अवैधानिक करार दिया है।

खास बात है कि इस मामले को पाकिस्तान ही हेग के ट्रिब्यूनल में ले गया था। भारत ने न कभी इस कोर्ट के गठन को मान्यता दी और न ही इसकी किसी सुनवाई में शामिल हुआ। हालांकि, एक्सपर्ट इस फैसले को पाकिस्तान के लिए फौरी राहत के तौर पर देख रहे हैं।

स्टिमसन सेंटर थिंक टैंक के दक्षिण एशिया प्रोग्राम के सीनियर फेलो डैनियल मार्की ने SCMP से कहा कि यह पाकिस्तान के लिए फायदेमंद है। उन्होंने कहा कि ट्रिब्यूनल के फैसले ने पाकिस्तान को एक राजनयिक मौका दिया है। हालांकि, वो इसे आंशिक सफलता कहते हैं और कहा कि पाकिस्तान को खुद को बेहतर स्थिति में दिखाने के मौके का पूरा फायदा उठाएगा।

फैसले के बाद पाकिस्तान ने ऐसा करना भी शुरू कर दिया। पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार ने सोशल मीडिया पर लिखा, "यह फैसला पाकिस्तान के उस लगातार रुख की पुष्टि करता है कि किसी बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि को एकतरफा तौर पर निलंबित या रद्द नहीं किया जा सकता।" लेकिन नई दिल्ली ने पाकिस्तान के मंसूबों पर यह कहकर पानी फेर दिया कि इस ट्रिब्यूनल को फैसला सुनाने का अधिकार ही नहीं है।

भारत का कहना है कि यह कोर्ट गैर-कानूनी तरीके से बनाया गया है, क्योंकि संधि में साफ है कि आर्बिट्रेशन पैनल बनाने के लिए दोनों पक्षों की सहमति जरूरी है। मनोहर पर्रिकर इंस्टिट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के सीनियर फेलो उत्तम सिन्हा का कहना है कि भारत इस सिस्टम के अधिकार को चुनौती दे रहा है। सिन्हा ने कहा कि भारत का मकसद पाकिस्तान का पानी रोकना नहीं है, बल्कि हाइड्रोपावर स्टोरेज, सिंचाई और ऐसी ही चीजों पर संधि के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल करना है।

वहीं, किंग्स कॉलेज लंदन में डिपार्टमेंट ऑफ वॉर स्टडीज में सीनियर फेलो और पाकिस्तानी पॉलिटिकल साइंटिस्ट आयशा सिद्दीका ने भारत पर तकनीकी पेच की आड़ लेने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि भारत पहले कुलभूषण जाधव के मामले में इसी कोर्ट के पास गया था। सिद्दीका ने सवाल किया कि "भारत अब कैसे कह सकता है कि वह इस कोर्ट को नहीं मानेगा। हालांकि, अमेरिकी तरह वह भी इस फैसले को मानने से इनकार कर सकता है।"

कई एक्सपर्ट भारत के फैसले को सही बताते हैं। पाकिस्तान का सबसे बड़ा तर्क है कि भारत एकतरफा तौर पर संधि स्थिति नहीं बदल सकता है। ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल रिलेशंस की एसोसिएट प्रोफेसर श्रीपर्णा पाठक इससे सहमति नहीं रखती हैं। वे 2019 में अमेरिका का इंटरमीडिएट रेंज न्यूक्लियर फोर्सेज ट्रीटी से बाहर निकलने का जिक्र किया। ट्रंप के पहले कार्यकाल में वॉशिंगटन इस संधि से बाहर निकल गया था, जो रूस के प्रतिबंधित क्रूज मिसाइल सिस्टम तैनात करने के बाद हुआ था।