सुप्रीम कोर्ट की राजस्थान सरकार को फटकार, राजनीतिक दबाव में मुकदमे की मंजूरी नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में अभियोजन स्वीकृति यानी केस चलाने की इजाजत देने के फैसले पर राजस्थान सरकार को कड़ी फटकार लगाई है।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में अभियोजन स्वीकृति यानी केस चलाने की इजाजत देने के फैसले पर राजस्थान सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि पब्लिक सर्वेंट को बेवजह मुकदमों और उत्पीड़न से बचाने के लिए अभियोजन मंजूरी का प्रावधान किया गया है। अदालत ने कहा कि यदि सरकार पहले अभियोजन की अनुमति देने से इनकार करे और बाद में राजनीतिक दबाव में अपना रुख बदल दे, तो यह कानून की मंशा के विपरीत है। इस मामले में राजनीतिक निर्देश का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 19 के तहत निर्णय लेने की प्रक्रिया शेक्सपियर के प्रसिद्ध संवाद 'To be or not to be' जैसी दुविधा नहीं हो सकती। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि सरकार अपने फैसले को लेकर असमंजस में दिखती है, तो यह माना जा सकता है कि उस पर बाहरी या अनुचित प्रभाव पड़ा है। इस मामले में राजनीतिक निर्देश का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार की विशेष अनुमति याचिका खारिज करते हुए हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें अभियोजन स्वीकृति को रद्द कर दिया गया था। साथ ही अदालत ने राज्य सरकार पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया। अदालत ने कहा कि मुख्यमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप के कारण एक सरकारी अधिकारी को अनावश्यक रूप से अदालतों के चक्कर लगाने पड़े। मामला एक सरकारी डॉक्टर से जुड़ा है, जिन पर घूस मांगने का आरोप लगाया गया था।
शिकायत के अनुसार डॉक्टर ने घुटने के ऑपरेशन के लिए 5,000 से 6,000 रुपये मांगे, जबकि मरीज का इलाज सरकारी योजना के तहत होना था। ट्रैप के दौरान डॉक्टर के सरकारी आवास की मेज की दराज से 2,000 रुपये बरामद किए गए थे। हालांकि मार्च 2018 में राजस्थान सरकार के कार्मिक विभाग के संयुक्त सचिव ने अभियोजन की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि फोन कॉल की रिकॉर्डिंग से रिश्वत लेने का आरोप साबित नहीं होता। साथ ही यह भी कहा गया था कि दराज का ताला तोड़कर रुपये बरामद किए गए, जिससे पूरी कार्रवाई संदिग्ध प्रतीत होती है। आदेश में यह भी उल्लेख था कि राजनीतिक दल के कुछ लोगों ने प्रचार पाने के उद्देश्य से डॉक्टर को फंसाने की कोशिश की थी और न तो मरीज तथा न ही उसके परिजनों ने कोई शिकायत दर्ज कराई थी।
इस प्रस्ताव को मुख्य सचिव ने भी मंजूरी दे दी थी, लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय के संयुक्त सचिव ने मामले पर पुनर्विचार करने को कहा। इसके बाद राज्य सरकार ने अपना रुख बदलते हुए अभियोजन की मंजूरी दे दी। राजस्थान हाई कोर्ट ने इस मंजूरी को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया था, जिसके खिलाफ राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए स्पष्ट किया कि अभियोजन स्वीकृति का निर्णय राजनीतिक दबाव या बाहरी प्रभाव के आधार पर नहीं लिया जा सकता।