प्रधान की विदाई के बाद थमा सियासी तूफ़ान? क्या मोदी ने समय रहते काट दिया विपक्ष का सबसे बड़ा हथियार
नई दिल्ली। राजनीति में हर आंदोलन केवल आंदोलन नहीं होता। कुछ आंदोलन सत्ता की नींद उड़ा देते हैं और कुछ विपक्ष को वह हथियार दे देते हैं, जिसकी तलाश उसे लंबे समय से होती है। नीट परीक्षा पेपर लीक विवाद भी धीरे-धीरे उसी मुकाम पर पहुंच रहा था। शुरुआत कुछ युवाओं के विरोध से हुई थी, लेकिन देखते ही देखते यह बड़ी संख्या में युवाओं की बेचैनी, अभिभावकों की चिंता और विपक्ष की आक्रामक राजनीति का साझा मंच बन गया। ऐसे समय में यदि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ है, तो सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या यह सरकार की मजबूरी थी या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वह राजनीतिक चाल, जिसने बड़ा आकार लेते जा रहे जनआंदोलन की धार समय रहते कुंद कर दी?
दिलचस्प बात यह है कि आंदोलन की शुरुआत उतनी प्रभावशाली नहीं थी। छात्रों के नाम पर कुछ युवा सड़कों पर आए, सोशल मीडिया पर अभियान चले, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षित राजनीतिक और सामाजिक समर्थन तुरंत नहीं मिला। यहां तक कि शिक्षा सुधारों और युवाओं के मुद्दों पर आवाज उठाने वाले सोनम वांगचुक के अनशन और अपीलों को भी वह व्यापक जनसमर्थन नहीं मिला, जिसकी उम्मीद की जा रही थी।
लेकिन राजनीति का तापमान अचानक तब बढ़ा, जब संसद मार्च के दौरान प्रदर्शन हिंसक हो गया। पथराव, पुलिस की कार्रवाई और लाठीचार्ज की तस्वीरों ने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया। इसके बाद यह केवल परीक्षा में कथित अनियमितता का मामला नहीं रहा, बल्कि युवाओं बनाम सरकार की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा। यही वह क्षण था, जब लगभग पूरा विपक्ष इस आंदोलन के साथ आ खड़ा हुआ। संसद के भीतर सरकार घिरने लगी और संसद के बाहर सड़कों पर विरोध का दायरा बढ़ने लगा।
राजनीतिक दृष्टि से यही वह मोड़ था, जहां सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल विपक्ष नहीं, बल्कि युवा मतदाता थे। भारत की चुनावी राजनीति में युवा वर्ग निर्णायक होता जा रहा है। पहली बार मतदान करने वाली पीढ़ी भावनात्मक मुद्दों पर भी तेज़ी से प्रतिक्रिया देती है और सोशल मीडिया के दौर में उसकी नाराजगी कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय विमर्श बन सकती है।
यही वह बिंदु है, जहां राजनीतिक विश्लेषक सरकार की रणनीति को पढ़ने की कोशिश करते हैं। यदि सरकार ने शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लिया, तो इसे केवल प्रशासनिक फैसला मानना शायद अधूरा होगा। इसे एक ऐसे राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसके जरिए सरकार ने यह संकेत देने की कोशिश की कि वह बढ़ते जनाक्रोश को अनदेखा नहीं कर रही।
राजनीति का एक पुराना सिद्धांत है- कभी-कभी एक चेहरा बदलकर पूरा नैरेटिव बदल दिया जाता है। संभव है कि सरकार ने भी यही आकलन किया हो कि यदि आंदोलन लंबा खिंचता, तो विपक्ष इसे 2027 के चुनावी विमर्श तक ले जाने की कोशिश करता। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितता और युवाओं की निराशा जैसे मुद्दों के साथ यदि नीट विवाद भी स्थायी रूप से जुड़ जाता, तो यह भाजपा के लिए गंभीर राजनीतिक चुनौती बन सकता था।
यहीं प्रधानमंत्री मोदी की राजनीतिक शैली की चर्चा भी होती है। उनके आलोचक और समर्थक, दोनों इस बात से सहमत दिखाई देते हैं कि वे अक्सर विवादों को लंबा खिंचने देने के बजाय ऐसे निर्णय लेते हैं, जो राजनीतिक नुकसान को सीमित कर सकें। यदि इस फैसले के पीछे यही सोच रही हो, तो कहा जा सकता है कि सरकार ने विपक्ष के हाथ में जाता हुआ सबसे धारदार हथियार समय रहते कुंद कर दिया।
इस फैसले का तत्काल राजनीतिक असर भी देखने को मिला। आंदोलन समाप्त हो गया। विपक्ष, जो अब तक शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को अपना सबसे बड़ा राजनीतिक लक्ष्य बना चुका था, अचानक नई रणनीति तलाशने की स्थिति में आ गया। जिस मांग को लेकर संसद से सड़क तक संघर्ष चल रहा था, उसके पूरा हो जाने के बाद आंदोलन का केंद्रीय नारा स्वतः कमजोर पड़ गया।
हालांकि, इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि इस्तीफे के बाद भी परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार नहीं होते, जांच निष्पक्ष नहीं दिखती या भविष्य में ऐसी घटनाएं दोहराई जाती हैं, तो यही मुद्दा किसी नए रूप में फिर लौट सकता है। इसलिए यह मान लेना कि केवल इस्तीफे से पूरा विवाद समाप्त हो गया, जल्दबाज़ी होगी।
फिर भी तत्काल राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो इस घटनाक्रम ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। आंदोलन ने सरकार को झुकने पर विवश किया, लेकिन सरकार ने भी ऐसा निर्णय लिया जिसने आंदोलन की राजनीतिक ऊर्जा को काफी हद तक निष्प्रभावी कर दिया। यही कारण है कि जिस मुद्दे पर विपक्ष लंबी लड़ाई की तैयारी कर रहा था, वह अचानक अपने सबसे प्रभावी नारे से वंचित होता दिखाई दिया।
राजनीति में कई बार जीत नारे लगाने वाले की नहीं, बल्कि समय पर फैसला लेने वाले की मानी जाती है। यदि यह निर्णय वास्तव में बढ़ते राजनीतिक संकट को सीमित करने की रणनीति का हिस्सा था, तो कहा जा सकता है कि सरकार ने एक बड़े बवाल को तत्काल टालने में सफलता पाई। वहीं विपक्ष के लिए चुनौती अब यह है कि वह युवाओं के असंतोष को केवल एक इस्तीफे से आगे ले जाकर व्यापक राजनीतिक विमर्श में बदल पाता है या नहीं। यही आने वाले समय की राजनीति की दिशा तय करेगा।