गाली, घमंड और ग्लोबल गिरावट के बाद अब दुनिया है आगे, और अमेरिका छूटेगा पीछे, वहां के बुद्धिजीवी वर्ग की डरावनी खामोशी चिंतनीय!

ट्रंप की यूरोप-विरोधी बयानबाज़ी, भारत-ईयू डील से उपजी अमेरिकी बेचैनी का प्रतीक नजर आती है। अमेरिका की यह आक्रामक भाषा कूटनीति नहीं, बल्कि असुरक्षा और संस्थागत पतन का संकेत है। सबसे चिंताजनक पहलू अमेरिकी बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण को मौन स्वीकृति देती दिखती है। दुनिया आगे बढ़ रही है, जबकि अमेरिका आत्मघाती अहंकार में खुद को अलग-थलग कर रहा है।

Jan 29, 2026 - 12:34
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गाली, घमंड और ग्लोबल गिरावट के बाद अब दुनिया है आगे, और अमेरिका छूटेगा पीछे, वहां के बुद्धिजीवी वर्ग की डरावनी खामोशी चिंतनीय!

-बृज खंडेलवाल-

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बौखलाहट अब साफ झलक रही है। यूरोपीय संघ पर उनकी कैप्स-लॉक वाली, बचकानी और अपमानजनक टिप्पणियां कोई साधारण बयान नहीं। ये भारत-यूरोपीय संघ के ऐतिहासिक “मदर ऑफ ऑल डील्स” पर झुंझलाहट का नतीजा हैं। लेकिन असल में ये उससे कहीं गहरी हैं, एक व्यक्ति और उसके पीछे के पूरे राजनीतिक आंदोलन का एक खौफनाक आत्मचित्र, जो पश्चिमी सभ्यता की उन बुनियादों को ही तोड़ रहा है, जिन पर अमेरिका खड़ा है।

यह नीति नहीं, एक दबंग की आदिम दहाड़ है। आवाज़ को विज़न समझ बैठना, और बेइज्जती को ताकत। यूरोप को “कंगाल”, “बच्चा” या “नकारा” कहना महाद्वीप का अपमान ही नहीं, यह उस इतिहास पर थूकना है, जिससे अमेरिका की पहचान बनी। ज्यादातर अमेरिकी उसी यूरोप की संतान हैं। वही यूरोप, जिसने एन्लाइटनमेंट की रौशनी, वैज्ञानिक सोच को मजबूती, साहित्य-कला को नई ऊंचाइयां और लोकतंत्र को दर्दनाक मगर परिपक्व रास्ता दिया। अमेरिका का संविधान, संस्थाएं, विचार, सब पर यूरोप की गहरी छाप है। ऐसे में यूरोप का मजाक उड़ाना आत्म-अपमान से कम नहीं।

हकीकत ये कि यूरोप कोई खेल का मैदान नहीं, जहा “डैडी टैक्स” जैसे जुमलों से तालियाँ बटोरी जाएं। यूरोपीय संघ का €15 ट्रिलियन का सिंगल मार्केट दुनिया का सबसे परिष्कृत, नियम-आधारित आर्थिक ढांचा है। अमेरिका का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर। हर साल 600 अरब डॉलर से ज्यादा अमेरिकी सामान-सेवाएं यूरोप खरीदता है। लाखों अमेरिकी नौकरियां इसी पर टिकी हैं। ऐसे साझेदार का उपहास आर्थिक आत्महत्या है और अमेरिका के अपने आंकड़े ये चीख-चीखकर बता रहे हैं।

अमेरिका आज ट्रेड डेफिसिट से जूझ रहा है। बाजार अस्थिर, महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है। ट्रंप के टैरिफ, जिन्हें वे ताकत का प्रतीक बताते हैं, असल में अमेरिकी उपभोक्ताओं पर छुपा टैक्स है। ये सच्चाई भाषणों से नहीं बदलती।

इस तमाशे में सबसे डरावनी है खामोशी। अमेरिका की तथाकथित लिबरल अंतरात्मा कहां है? यूनिवर्सिटीज, थिंक-टैंक्स, एडिटोरियल बोर्ड्स, मानवाधिकार संगठन, क्यों चुप हैं? जो दुनिया भर में लोकतंत्र की खामियां तलाशते हैं, वे अपने घर की सांस्कृतिक-कूटनीतिक आगजनी पर क्यों मौन हैं? ये चुप्पी कायरता नहीं, मानसिक जड़ता का संकेत है। ऊपर आइवरी टावरों में बहस, नीचे नींव जल रही है और फायर ब्रिगेड वाले सो रहे हैं।

ट्रंप की रणनीति, डिप्लोमेसी के सर्व मान्य सिद्धांतों को चुनौती देती है। न भाषा का सबूर, न ही तथ्यों का सम्मान, जसपाल भट्टी का उलटा शो चल रहा है। उपनाम गढ़ना, कैप्स-लॉक ट्वीट, स्कूली गालियां, ये राज्यकला नहीं है। 70 साल के वैश्विक गठबंधन मयखानों की तकरार, बार-फाइट में बदल रहे हैं। ये ताकत नहीं, असुरक्षा बताती है। नियम-आधारित व्यवस्था, जिसने युद्ध रोका, समृद्धि फैलाई, गरिमा की बात की, क्या अहंकार, सौदेबाजी और धमकी से बदली जा सकती है?

असल खतरा इसी सोच में है। संस्थाओं का धीमा, मुस्कुराता क्षरण। यूरोप को संदेश साफ, तुम्हारा इतिहास बेकार, साझेदारी मुफ्त, परिपक्वता कमजोरी है, लेकिन ये रणनीतिक भूल है। गठबंधन स्थायी नहीं। बाजारों की याददाश्त लंबी होती है। सब्र, सदियों पुरानी सभ्यताओं का भी सीमा पर है। सवाल तैर रहा है,  कब तक यूरोप ऐसे सहयोगी की बेरुखी या दुश्मनी सहेगा?

भारत-ईयू डील कोई तंज नहीं, भविष्य का खाका है। दुनिया की दूसरी लोकतांत्रिक ताकतें जुड़ेंगी, नवाचार करेंगी। अमेरिका जोकर बने तो उसकी मर्जी। यूरोप निर्भरता बदल रहा है; मार-ए-लागो के अपमान इसे तेज कर रहे हैं।

ट्रंप की बौखलाहट अमेरिकी पतन का मील का पत्थर साबित होगी। देश उस ताकत के हाथों हाइजैक हो रहा है, जो विरासत से नफरत करती है, आपसी निर्भरता न समझे और पुल जला दे। ये अमेरिका को महान नहीं, अप्रासंगिक बना रहा है, हर बचकानी गाली के साथ।

दुनिया आगे बढ़ रही है। लोग गंभीर कमरों में फ्यूचर के सौदे कर रहे हैं।  अमेरिका जहरीली छाया में चिल्लाता, खुद को शर्मिंदा करता, सबको खतरे में डालता, पीछे छूट रहा है।

SP_Singh AURGURU Editor