धीरेंद्र शास्त्री के मुद्दे पर अखिलेश की घेराबंदी, कहीं खुद ही तो नहीं फंस रहे सियासी जाल में?

धीरेंद्र शास्त्री के मुद्दे पर अखिलेश ने एक राजनीतिक मोर्चा जरूर खोल दिया है, लेकिन यह मोर्चा सपा के लिए उतने ही सवाल खड़े कर रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र शास्त्री को घेरने की कोशिश में सपा अध्य़क्ष अखिलेश यादव उसी राजनीतिक घेरे में आ गए हैं, जिसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहले से उनके लिए तैयार कर रहे हैं?

Nov 6, 2026 - 09:42
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धीरेंद्र शास्त्री के मुद्दे पर अखिलेश की घेराबंदी, कहीं खुद ही तो नहीं फंस रहे सियासी जाल में?

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच धर्म और राजनीति का पुराना समीकरण एक बार फिर चर्चा में है। इस बार केंद्र में हैं बागेश्वर धाम के कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव। भगवान श्रीकृष्ण को लेकर शास्त्री की टिप्पणियों पर अखिलेश ने जिस आक्रामक अंदाज में विरोध दर्ज कराया है, उसने एक नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि अखिलेश वास्तव में धार्मिक भावनाओं की रक्षा के लिए आवाज उठा रहे हैं या भाजपा के उस राजनीतिक मैदान में उतर रहे हैं, जहां पहले से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उनका इंतजार कर रहे हैं?

श्रीकृष्ण के अपमान का मुद्दा या राजनीतिक अवसर?

धीरेंद्र शास्त्री के एक वायरल वीडियो में भगवान श्रीकृष्ण की त्रिभंगी मुद्रा और भगवान श्रीराम की सीधे खड़े होने वाली मुद्रा की तुलना को लेकर विवाद पैदा हुआ। इसके बाद भगवान श्रीराम के पिता राजा दशरथ को लेकर उनकी एक अन्य टिप्पणी भी चर्चा में आई। आलोचना बढ़ने पर शास्त्री ने सफाई दी और अपनी बात से किसी की धार्मिक भावना आहत होने पर खेद जताया।

अखिलेश यादव ने इसे गंभीर मामला बनाते हुए शास्त्री के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। उन्होंने कहा कि कथावाचक ने यदुवंशियों और रघुवंशियों दोनों की भावनाएं आहत की हैं। यहां तक कि उन्होंने ब्रज और अवध में उनके प्रवेश पर रोक लगाने जैसी टिप्पणी भी की। बाद में प्रदेश सरकार और प्रशासन से उनके प्रस्तावित कार्यक्रमों को अनुमति नहीं देने की अपील भी कर दी।

सवाल यह है कि अखिलेश की इस सक्रियता के पीछे केवल धार्मिक भावना है या इसके राजनीतिक निहितार्थ भी हैं?

धीरेंद्र शास्त्री की लोकप्रियता और उनके कार्यक्रमों में जुटने वाली भीड़ को देखते हुए यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या सपा नेतृत्व को आशंका है कि चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में उनके कार्यक्रमों के जरिए भाजपा के पक्ष में धार्मिक माहौल तैयार हो सकता है?

योगी का पुराना सवाल फिर प्रासंगिक

अखिलेश यादव की मुश्किल यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लंबे समय से उन्हें श्रीकृष्ण जन्मभूमि के मुद्दे पर घेरते रहे हैं। योगी बार-बार सवाल उठाते रहे हैं कि खुद को यदुवंशी बताने वाले अखिलेश यादव मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि के विषय पर खुलकर अपना पक्ष क्यों नहीं रखते?

मुख्यमंत्री का तर्क है कि यदि अखिलेश भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपनी आस्था और यदुवंशी पहचान को राजनीतिक मंचों पर सामने रखते हैं तो उन्हें श्रीकृष्ण जन्मभूमि के प्रश्न पर भी स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।

यही वह राजनीतिक मोर्चा है, जहां धीरेंद्र शास्त्री प्रकरण अखिलेश के लिए दोधारी तलवार बन सकता है। एक तरफ वह भगवान श्रीकृष्ण के अपमान का मुद्दा उठाकर यदुवंशी समाज और कृष्ण भक्तों के बीच अपनी संवेदनशीलता का संदेश देना चाहते हैं, दूसरी तरफ भाजपा उनसे पूछ सकती है कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि के विवाद पर उनका स्पष्ट पक्ष क्या है?

क्या अखिलेश भाजपा के चुनावी एजेंडे में उलझ रहे हैं?

भाजपा की राजनीति में अयोध्या और श्रीराम मंदिर का मुद्दा लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। मंदिर निर्माण के बाद पार्टी ने इसे अपनी उपलब्धि के रूप में जनता के सामने रखा। अब मथुरा और श्रीकृष्ण जन्मभूमि का प्रश्न भी राजनीतिक विमर्श में लगातार उठ रहा है।

योगी आदित्यनाथ इस मुद्दे पर अखिलेश को पहले भी चुनौती दे चुके हैं। ऐसे में धीरेंद्र शास्त्री के विवाद को श्रीकृष्ण के सम्मान से जोड़कर अखिलेश ने अनजाने में भाजपा को एक नया राजनीतिक सवाल उठाने का अवसर तो नहीं दे दिया?

अखिलेश की रणनीति यह हो सकती है कि भाजपा के धार्मिक विमर्श पर उसका एकाधिकार न रहने दिया जाए। वह यह संदेश देना चाहते हों कि भगवान श्रीकृष्ण के प्रति आस्था केवल भाजपा की राजनीतिक संपत्ति नहीं है और सपा भी सनातन परंपराओं तथा धार्मिक भावनाओं के सम्मान के पक्ष में खड़ी है।

लेकिन इस रणनीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह केवल विवादित कथावाचक के विरोध तक सीमित रहते हैं या श्रीकृष्ण जन्मभूमि सहित दूसरे धार्मिक और सांस्कृतिक सवालों पर भी अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हैं।

राजा भैया का आयोजन भी बना राजनीतिक संदर्भ

इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू प्रतापगढ़ के कुंडा में प्रस्तावित धीरेंद्र शास्त्री की कथा है। यह आयोजन जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के अध्यक्ष रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया से जुड़ा है। 17 से 19 नवंबर तक प्रस्तावित इस कार्यक्रम को लेकर अखिलेश की आपत्ति ने राजनीतिक चर्चा को और हवा दे दी है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि अखिलेश ने केवल कुंडा के कार्यक्रम पर सवाल नहीं उठाया, बल्कि प्रदेश के विभिन्न जिलों में प्रस्तावित आयोजनों को अनुमति नहीं देने की अपील की है। इससे मामला किसी एक आयोजन के विरोध से आगे बढ़कर धार्मिक आयोजनों और राजनीतिक प्रभाव के प्रश्न तक पहुंच गया है।

क्या भाजपा को घेरने निकले अखिलेश खुद घिर सकते हैं?

अखिलेश यादव के सामने असली चुनौती यही है। वह धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणियों को लेकर भाजपा पर सवाल उठा सकते हैं कि ऐसे कथावाचकों को राजनीतिक संरक्षण क्यों मिलता है। लेकिन भाजपा भी पलटकर पूछ सकती है कि भगवान श्रीकृष्ण के प्रति इतनी चिंता है तो मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर उनका रुख क्या है?

2027 के चुनाव में भाजपा हिंदुत्व और धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान के मुद्दों को आगे बढ़ाती है तो सपा के सामने अपनी पीडीए राजनीति के साथ धार्मिक आस्था के प्रश्नों पर भी संतुलन बनाने की चुनौती होगी।

SP_Singh AURGURU Editor