इसरो की मदद से कृत्रिम सूर्यग्रहण लगाने की तैयारी

पेरिस। अगले सूर्यग्रहण में अभी महीनों का इंतजार है, लेकिन पृथ्वी से ऊपर वैज्ञानिक जल्द ही कृत्रिम सूर्यग्रहण बनाकर इतिहास रचने के लिए तैयार हैं। यूरोपीय स्पेस एजेंसी के अंतरिक्ष मिशन के लिए अंतिम तैयारियां शुरू हो गई हैं, जिसमें सैटेलाइट को भेजकर पृथ्वी से बहुत ऊपर कृत्रिम सूर्यग्रहण बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) इसमें अहम भूमिका निभा रहा है।

Dec 1, 2024 - 13:46
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इसरो की मदद से कृत्रिम सूर्यग्रहण लगाने की तैयारी

प्रोब-3 मिशन यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का कक्षा में सटीक ढंग से उड़ान भरने का पहला प्रयास है। इसमें दो अंतरिक्ष यान ग्रह के चारों ओर ऐसी व्यवस्था में चक्कर लगाएंगे, जो एक मिलीमीटर से भी अधिक नहीं हटती है। सब कुछ ठीक रहा तो अंतरिक्ष यान चार दिसम्बर को भारतीय समयानुसार शाम 4.08 बजे भारत के श्रीहरिकोटा में सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से उड़ान भरेगा। इसे इसरो के पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) से लॉन्च किया जाएगा।

इस मिशन का उद्येश्य दो सैटेलाइट की जोड़ी का उपयोग करते हुए सूर्य के कोरोना का अध्ययन करना है। कृत्रिम सूर्यग्रहण की स्थिति बनने पर वैज्ञानिकों के लिए सैटेलाइट की मदद से सूर्य के कोरोना के अध्ययन करने के लिए अच्छा अवसर होगा। प्रोबा-3 मिशन में दो उपग्रह शामिल हैं- ऑकल्टर सैटेलाइट (ओएससी) और कोरोनाग्राफ सैटेलाइट (सीएससी)।

ओएससी में 1.4 मीटर की ऑक्ल्टरिंग डिस्क है, जो सूरज की रोशनी को रोकने के लिए डिजाइन की गई है, जो 150 मीटर की दूरी पर लगभग 8 सेंटीमीटर चौड़ी छाया बनाती है। इस छाया के भीतर सीएससी स्थित है, जिसमें 5 सेंटीमीटर एपर्चर वाला एक टेलिस्कोप है। ये उपग्रह फॉर्मेशन फ्लाइंग तकनीकों का उपयोग करके मिलीमीटर सटीकता के साथ एक सटीक फॉर्मेशन बनाए रखेंगे।

अंतरिक्ष में उपग्रहों की यह स्थिति दीर्घवृत्ताकार कक्षा के सबसे बाहरी हिस्से पर होगी, जो पृथ्वी से लगभग 60,000 किलोमीटर दूरी पर है। यहां गुरुत्वाकर्षण बन न्यूनतम है, जिसमें स्टेशन कीपिंग के लिए जरूरी प्रोपेलैंट में कमी आएगी। कोरोना का निरीक्षण करना बेहद मुश्किल है क्योंकि सूर्य की चमक, कोरोना के सबसे चमकीले बिंदु से दस लाख गुना अधिक है, जो दूरबीनों को अंधा कर देती है। यही वजह है कि वैज्ञानिक कृत्रिम सूर्यग्रहण की स्थिति तैयार करने जा रहे हैं।