विकास का विकेंद्रीकरण, शहरों का विस्तार, लेकिन बजट में नदियां क्यों रह गईं हाशिये पर?
केंद्रीय बजट 2026 ने भारत के शहरी विकास की दिशा बदलने का संकेत दिया है, जहां महानगरों के बोझ को कम कर टियर-2 और टियर-3 शहरों को नई भूमिका दी जा रही है। सिटी इकॉनमिक रीजन जैसी अवधारणाएं आगरा और मैसूर जैसे शहरों के लिए अवसर खोलती हैं। लेकिन इस विकास कथा में नदियां और पारिस्थितिकी अभी भी हाशिये पर हैं। यदि नदियों का पुनर्जीवन नहीं हुआ, तो शहरों का सपना अधूरा ही रहेगा।
-बृज खंडेलवाल-
भारत के बड़े शहर अब थक चुके हैं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता में दम घोंटने वाली ट्रैफिक, बहुत ऊँचे किराए और साँस लेने में तकलीफ हो रही है। आम आदमी इन शहरों से परेशान है।
आज भारत तेज़ी से शहरों की ओर बढ़ रहा है। 2025-26 में भारत की कुल आबादी करीब 147 करोड़ है, जिसमें से लगभग 36-37% लोग शहरों में रहते हैं। यानी करीब 53-55 करोड़ लोग शहरी इलाकों में हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में भारत की शहरी आबादी लगभग 36% है, जो 2050 तक 50% के करीब पहुँच सकती है। बड़े शहरों की आबादी बहुत तेज़ बढ़ रही है।
दिल्ली की आबादी 2025-26 में करीब 3.3-3.5 करोड़ है, जो दुनिया के सबसे बड़े शहरों में से एक है। मुंबई करीब 2.2 करोड़, कोलकाता 1.5-1.6 करोड़, बेंगलुरु 1.4 करोड़ और चेन्नई 1.2 करोड़ के आसपास है। हैदराबाद भी 1.1 करोड़ से ऊपर है। ये महानगर रोज़गार और सुविधाओं के लिए लोगों को खींचते हैं, लेकिन अब इनकी क्षमता खत्म हो रही है। ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और महँगी ज़िंदगी ने लोगों को परेशान कर दिया है।
इस साल का केंद्रीय बजट इसी समस्या को समझ रहा है। यह विकेंद्रित शहरी विकास का सपना दिखा रहा है। रिकॉर्ड 12.2 लाख करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) सिर्फ़ एलान नहीं, बल्कि बड़ा संकेत है। अब विकास सिर्फ़ दिल्ली-मुंबई जैसे कुछ महानगरों तक सीमित नहीं रहेगा। टियर-2 और टियर-3 शहर अब मुख्य भूमिका निभाएँगे।
बजट में सबसे अहम नई अवधारणा है सिटी इकॉनमिक रीजन (CER)। शहर को सिर्फ़ नगर निगम की सीमा में नहीं देखना है। इसे एक जीवंत आर्थिक क्षेत्र की तरह देखा जाएगा, जहाँ भूगोल, संस्कृति, कौशल और व्यापार जुड़े हों। पाँच साल में हर CER के लिए 5,000 करोड़ रुपये की 'चैलेंज मोड' फंडिंग मिलेगी। मतलब, काम दिखाओ, पैसा लो। यह पुरानी खैरात वाली व्यवस्था से हटकर प्रदर्शन पर आधारित है।
आगरा और मैसूर जैसे शहरों के लिए यह बड़ा मौका है। आगरा दशकों से सिर्फ़ ताजमहल के कारण जाना जाता है। पर्यटक आते हैं और शाम तक चले जाते हैं। CER मॉडल से आगरा दिल्ली-वाराणसी कॉरिडोर पर लॉजिस्टिक्स और सर्विस हब बन सकता है। आगरा के एक होटल मालिक कहते हैं, “अगर यहाँ नौकरियाँ और अच्छी पढ़ाई मिले, तो शहर सचमुच जिएगा।”
मैसूर शांत और सुसंस्कृत है, लेकिन बेंगलुरु का सैटेलाइट बनकर थक गया है। एक स्टार्टअप फाउंडर श्रुति कहती हैं, “हम भीड़ नहीं चाहते। हम मैसूर की साफ हवा और काम दोनों चाहते हैं।”
कनेक्टिविटी इस बदलाव की कमर है। हाई-स्पीड रेल, मालगाड़ी कॉरिडोर और इंडस्ट्रियल लिंक से दूरी कम होगी। रोज़गार छोटे शहरों में फैलेगा। ई-बसें और ग्रीन मोबिलिटी से शहर तेज़ भी होंगे और साफ़ भी।
AMRUT जैसी योजनाएँ जारी हैं, जो बताती हैं कि असली स्मार्ट सिटी पानी, सीवर, नालियाँ और सार्वजनिक जगहों से बनती है, न कि सिर्फ़ इंस्टाग्राम फ़िल्टर से। इन्फ्रास्ट्रक्चर रिस्क गारंटी फंड और एसेट मोनेटाइजेशन से निजी पूंजी आएगी, क्योंकि सरकार अकेले सब नहीं कर सकती।
सरकार ने लड़कियों के छात्रावास, क्षेत्रीय मेडिकल सेंटर और पर्यटन सर्किट पर भी ध्यान दिया है। शहर सिर्फ़ कमाई की जगह नहीं, बल्कि अच्छी ज़िंदगी की जगह बनेंगे।
लेकिन एक बड़ा सवाल है; हमारी नदियों का क्या? बजट में नदी पुनर्जीवन की बात है, लेकिन नदियों को अभी भी ज़्यादा आर्थिक रास्ता माना जा रहा है, पारिस्थितिक जीवनरेखा कम।
भारत की नदियां बुरी हालत में हैं। यमुना दिल्ली में जहरीली फोम वाली हो चुकी है। 2025 में भी यमुना में फेकल कोलीफॉर्म लाखों में है, जो सुरक्षित सीमा से हज़ारों गुना ज़्यादा है। गंगा में भी कई जगह प्रदूषण बहुत ज़्यादा है। 2025 कुंभ में प्रयागराज में फेकल कोलीफॉर्म 1,400 गुना ज़्यादा पाया गया। साबरमती अहमदाबाद में बॉडी 292 mg/L तक पहुँच चुकी है। मूसी हैदराबाद में फार्मा और सीवर से भरी है। सीपीसीबी की रिपोर्ट में 296 नदी खंड प्रदूषित हैं।
लॉजिस्टिक्स हब ज़रूरी हैं, लेकिन प्रदूषण और जैव विविधता को नज़रअंदाज़ करना पुरानी गलतियाँ दोहराना है। नदियाँ साफ़ नहीं हुईं, तो शहरों का विकास भी अधूरा रहेगा।
यह बजट शहरों को पैसा नहीं देता, बल्कि शहरी ताकत का नक्शा बदलता है। अगर राज्य और नगर निकाय इसे गंभीरता से लें, तो भारत को नए आत्मविश्वासी शहर मिलेंगे। जहाँ लोग मजबूरी में नहीं, बल्कि सोच-समझकर आएँगे। जहाँ रोज़गार घर के पास होगा। और बड़े महानगर थोड़ा सांस ले सकेंगे। मौका बहुत बड़ा है। खतरा सिर्फ़ अमल न करने का है।