डिप्टी बनाम चीफ़: कर्नाटक में लीडरशिप की जंग से कांग्रेस की फजीहत हो रही है

कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के बीच सत्ता-संघर्ष कांग्रेस सरकार को अस्थिर कर रहा है। 2023 की भारी जीत के बाद शुरू हुआ रिश्ता अब “रोटेशन फ़ॉर्मूला” की खींचतान में फंस गया है। सिद्धारमैया स्थिरता के नाम पर अभी हटने को तैयार नहीं, जबकि शिवकुमार अपने समर्थक विधायकों के सहारे वादा पूरा करने का दबाव बना रहे हैं। हाईकमान असमंजस में है और इस टकराव के कारण शासन ठप, योजनाएं रुकीं और जनता नाराज़ है, जबकि BJP मौके की तलाश में है। कर्नाटक की सत्ता आज दो महत्वाकांक्षाओं और कमज़ोर हाईकमान के बीच झूल रही है।

Nov 30, 2025 - 12:36
 0
डिप्टी बनाम चीफ़: कर्नाटक में लीडरशिप की जंग से कांग्रेस की फजीहत हो रही है

-बृज खंडेलवाल-

कर्नाटक इन दिनों किसी रियासत की तरह चल रहा है! नाश्ते की मेज़ पर मुख्यमंत्री और उनके डिप्टी इडली-वड़ा नहीं, बल्कि तख़्त की लड़ाई लड़ रहे हैं — धीमी गति की चाकू-छुरी वाली जंग की तरह — और दिल्ली का तथाकथित हाईकमान गलियारे में सहमा खड़ा है, महाभारत के धृतराष्ट्र जैसा हिचकिचाता हुआ।

इस वक़्त कर्नाटक हज़ार ज़ख़्मों से लहूलुहान है — दोनों सत्राप, सिद्धारमैया और शिवकुमार, दो मुक़ाबिल शेरों की तरह एक-दूसरे का चक्कर काट रहे हैं, पंजे छुपाए लेकिन नीयत में तख़्त का ख़्वाब। दिल्ली का हाईकमान ख़ामोश, बेअसर अपीलें, और किसी पर असर नहीं।

यह महज़ गुटबाज़ी नहीं, बल्कि उत्तराधिकार की सियासत है जिसे उसूलों की शक्ल दी गई है। हर लीक हुई चिट्ठी, हर आधी रात की मुलाक़ात, हर तंज़ — सब एक दूसरे पर वार भी है और दिल्ली की कमज़ोर होती पकड़ पर भी सवाल। कभी ख़ौफ़ पैदा करने वाला हाईकमान अब थका-मांदा बादशाह लगता है जो बाग़ी उमरावों से रहम की भीख मांग रहा हो।

अफ़सोस ये कि अवाम ने कांग्रेस को रोटी, तालीम और अस्पतालों के नाम पर भारी बहुमत दिया था, न कि इस ख़त्म न होने वाली महल की साज़िश के लिए। हुकूमत शोर-शराबे में डूब गई है; फ़ाइलें धूल खा रही हैं, वज़ीर सिर्फ़ दिखावा कर रहे हैं, और ख़ज़ाने की ताक़त वफ़ादारी ख़रीदने में लग रही है, विकास के मंसूबों में नहीं।

जनता का भरोसा 50 फ़ीसदी से नीचे गिर चुका है। एनडीए मौक़े पर नज़रें गड़ाए बैठा है।

जब तक दिल्ली हिम्मत नहीं दिखाती — या तो सिद्धारमैया को पक्का ताज दे या शिवकुमार को बाक़ायदा विरासत सौंपने की राह बनाए — यह हुकूमत धमाके से नहीं, बल्कि धीरे-धीरे दम घुटने से गिर जाएगी। कर्नाटक का  जनादेश दो आदमियों की महत्वाकांक्षा और एक हाईकमान की बेबसी में क़ैद है। सूबे और उसके लोग इससे कहीं बेहतर हक़दार हैं।

2023 की शानदार फ़तह के बाद कांग्रेस की यह  सरकार अब अपने ही बनाए राजनीतिक जाल में उलझ चुकी है। जो तालमेल कभी “अनुभव और जज़्बे” का बेहतरीन मेल बताया गया था — सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार का — वही अब तख़्त की जद्दोजहद में बदल गया है, जबकि 8 दिसंबर से विधानसभा का सत्र शुरू होने वाला है।

दो साल पहले कांग्रेस 224 में से 135 सीटों के साथ वापस आई थी। सिद्धारमैया, पुराने अहिंदा नेता, और शिवकुमार, मज़बूत वोक्कालिगा सपोर्ट वाले, को एक संतुलित जोड़ी के तौर पर पेश किया गया। लेकिन आज वही फ़ॉर्मूला हुकूमत को पंगु बनाने पर तुला है।

इस संकट की जड़ है वो चर्चित “रोटेशन फ़ॉर्मूला” — जो कभी लिखा नहीं गया पर जिसकी बात सब करते हैं। कहा गया कि पहले 30 महीनों तक सिद्धारमैया CM रहेंगे और फिर कुर्सी शिवकुमार को मिलेगी। नवंबर 2025 में आधी मियाद पूरी होते ही शिवकुमार का खेमा — 50–55 विधायकों के सहारे — दिल्ली पर दबाव बढ़ा रहा है। उनका दावा है कि वोक्कालिगा वोट बैंक को मज़बूत रखने के लिए वादा निभाना ज़रूरी है।

82 वर्षीय सिद्धारमैया इनकार करते हैं कि कोई समझौता हुआ था। उनके वफ़ादार मंत्री भी यही कहते हैं कि स्थिरता के लिए निरंतरता ज़रूरी है। शांत करने के लिए वे नए डिप्टी सीएम, बड़े-बड़े मंत्रालय और अहम नियुक्तियों का वादा कर रहे हैं, मगर शिवकुमार गुट इसे “आधे-अधूरे” उपाय मानता है — क्योंकि असली मसला सत्ता हस्तांतरण है।

पिछले महीने लड़ाई खुलकर सामने आ गई। प्रेस कॉन्फ़्रेंस में इशारों-इशारों में ताने, TV पर दोनों तरफ़ से रोज़ाना बयानबाज़ी, दिल्ली के चक्कर और 29 नवंबर की मशहूर “इडली डिप्लोमैसी” वाली मुस्कानें — लेकिन अंदर ही अंदर सुलह कमज़ोर है। बताया जाता है कि सिद्धारमैया 2028 में ट्रांज़िशन की बात कर रहे हैं, पर शिवकुमार को “अबकी बार, अभी” चाहिए।

इस लड़ाई में जाति की राजनीति भी शामिल है और विरासत का सवाल भी। सिद्धारमैया अपने राजनीतिक सफ़र के आख़िरी हिस्से में हैं और इसे मुकम्मल करना चाहते हैं। शिवकुमार, जो दो बार सीएम बनने से चूक चुके हैं, इसे अपना आख़िरी बड़ा मौक़ा मान रहे हैं।

दिल्ली, हिमाचल और तेलंगाना की समस्याओं में उलझी कांग्रेस high कमान, हस्तक्षेप से डर रही है। किसी एक को चुनना दरारें पैदा कर देगा, लेकिन देरी भी नुकसानदेह है। क्योंकि कोई लिखित समझौता नहीं, इसलिए दिल्ली मजबूर भी है और जवाबदेह भी।

उधर बीजेपी दम साधे इंतज़ार में है। विपक्ष के 85 विधायक (जनता दल एस) समेत) मौक़ा तलाश रहे हैं। बग़ावत की चर्चाएं और अविश्वास प्रस्ताव की फ़ुसफ़ुसाहटें जारी हैं।

असल नुक़सान सरकार को नहीं, गवर्नेंस को हुआ है। “गृह ज्योति” और “अन्न भाग्य” जैसे फ़ायदा योजनाएं पिछड़ रही हैं। सिंचाई परियोजनाएं अटकी हैं। बेंगलुरु में शहरी कामकाज ठहरा हुआ है क्योंकि फ़ंड और फ़ैसले दोनों लटके पड़े हैं।

अफ़सर मानते हैं कि जब वज़ीर अपनी कुर्सी बचाने में लगे हों तो फ़ाइलें धीमी चलती हैं। नतीजा — पॉलिसी पैरालिसिस। ग्रामीण इलाकों में योजनाएं रुकी हैं, शहरों में ट्रैफ़िक और गड्ढे बढ़ रहे हैं, लोग परेशान हैं।

हल मुश्किल इसलिए भी है क्योंकि दोनों नेता अपने-अपने सामाजिक और चुनावी आधार के लिए अनिवार्य हैं  सिद्धारमैया अहिंदा (मुस्लिम, दलित, पिछड़ा) वोट का आधार, और शिवकुमार दक्षिण कर्नाटक में वोक्कालिगा इलाक़ों के बेजोड़ संगठनकर्ता।

किसी एक को कमज़ोर करना, ज़मीन खोना है। दिल्ली में एक “मध्य रास्ता” भी सुना जा रहा है — सिद्धारमैया तीन साल पूरे करें और फिर 2028 से पहले सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण हो। लेकिन बड़ा सवाल वही है: क्या कांग्रेस निजी महत्वाकांक्षा को काबू में रखकर सामूहिक हुकूमत बचा पाएगी?

SP_Singh AURGURU Editor