सिर्फ आठ घंटे बिस्तर पर रहना काफी नहीं, नींद की गहराई भी जरूरी; 95 हजार लोगों की रिसर्च में 83 बीमारियों से जुड़ा संबंध
चीन में 95,559 लोगों पर हुई नई रिसर्च में नींद की अवधि के साथ उसकी गुणवत्ता और अलग-अलग चरणों का स्वास्थ्य से संबंध पाया गया। ज्यादा आरईएम नींद 83 बीमारियों के कम जोखिम से जुड़ी मिली, जबकि गहरी नींद का संबंध सात स्वास्थ्य स्थितियों के कम जोखिम से था। अधिकांश बीमारियों के लिए छह से आठ घंटे की नींद में जोखिम सबसे कम पाया गया, जबकि पांच घंटे से कम नींद 37 स्वास्थ्य स्थितियों के अधिक जोखिम से जुड़ी रही। हालांकि यह अवलोकनात्मक अध्ययन है, इसलिए इससे कारण-परिणाम साबित नहीं होता।
नई दिल्ली। रात में कितने घंटे सोए, यह महत्वपूर्ण है, लेकिन नींद कितनी गहरी रही और उसमें कितना समय आरईएम (REM) चरण में गुजरा, इसका भी स्वास्थ्य से गहरा संबंध हो सकता है। 95,559 लोगों पर हुई एक बड़ी नई रिसर्च में पाया गया कि ज्यादा आरईएम नींद 83 बीमारियों के कम जोखिम से जुड़ी थी, जबकि ज्यादा गहरी नींद भी कुछ प्रमुख बीमारियों के कम जोखिम से संबंधित मिली। वहीं पांच घंटे से कम सोने वालों में 37 स्वास्थ्य स्थितियों का जोखिम अधिक पाया गया। अध्ययन में अधिकांश बीमारियों के लिए छह से आठ घंटे की नींद वह अवधि रही, जिसमें जोखिम सबसे कम पाया गया।
सात रातों तक कलाई पर पहना गया उपकरण
यह अध्ययन चीन की कैपिटल मेडिकल यूनिवर्सिटी और सहयोगी शोधकर्ताओं ने किया है और इसके निष्कर्ष 17 सितंबर 2026 को प्रतिष्ठित ओपन-एक्सेस मेडिकल जर्नल PLOS Medicine में प्रकाशित हुए। शोधकर्ताओं ने यूके बायोबैंक के 95,559 प्रतिभागियों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। प्रतिभागियों ने लगातार सात दिन और रात कलाई पर एक्सेलेरोमीटर आधारित उपकरण पहना था। इससे शोधकर्ताओं ने नींद की अवधि के साथ-साथ आरईएम, गहरी और हल्की नींद, रात में बार-बार जागने तथा एक रात से दूसरी रात नींद के समय में होने वाले बदलाव का अनुमान लगाया।
इसके बाद प्रतिभागियों के स्वास्थ्य रिकॉर्ड को औसतन 8.9 वर्ष तक देखा गया। शोधकर्ताओं ने एक हजार से ज्यादा बीमारियों और स्वास्थ्य स्थितियों के साथ नींद के इन पैटर्न के संबंधों का अध्ययन किया। विश्लेषण में नींद के पैटर्न और बाद में सामने आई बीमारियों के बीच 156 महत्वपूर्ण संबंध मिले।
आरईएम नींद का संबंध 83 बीमारियों से
रिसर्च का सबसे उल्लेखनीय निष्कर्ष आरईएम नींद से जुड़ा रहा। अध्ययन में आरईएम नींद में लगभग 47.6 मिनट की अधिकता 83 बीमारियों के कम जोखिम से संबंधित थी। इनमें हृदय विफलता, डिमेंशिया और पार्किंसन जैसी गंभीर बीमारियां भी शामिल थीं। उदाहरण के तौर पर अधिक आरईएम नींद हृदय विफलता के करीब 26 प्रतिशत कम जोखिम, डिमेंशिया के करीब 46 प्रतिशत कम जोखिम और पार्किंसन रोग के और भी कम जोखिम से संबंधित पाई गई।
हालांकि यहां यह समझना जरूरी है कि शोध में यह साबित नहीं हुआ कि आरईएम नींद बढ़ाने से ये बीमारियां निश्चित रूप से रुक जाती हैं। अध्ययन में केवल दोनों के बीच संबंध देखा गया है।
गहरी नींद का भी अपना महत्व
शोधकर्ताओं ने गहरी नींद और सात स्वास्थ्य स्थितियों के बीच भी संबंध पाया। ज्यादा गहरी नींद टाइप-2 डायबिटीज और मेजर डिप्रेसिव डिसऑर्डर सहित कुछ स्थितियों के कम जोखिम से जुड़ी थी। इसका मतलब यह नहीं है कि गहरी नींद किसी बीमारी की दवा है, बल्कि यह संकेत देता है कि नींद के अलग-अलग चरण शरीर और मस्तिष्क के लिए अलग-अलग महत्व रखते हैं।
आरईएम नींद वह अवस्था है जिसमें आमतौर पर सपने अधिक आते हैं। यह मस्तिष्क की स्मृति, सीखने और भावनात्मक प्रक्रियाओं से जुड़ी मानी जाती है। दूसरी ओर, गहरी नींद शरीर की रिकवरी और पुनर्स्थापन से जुड़ी होती है। इसलिए केवल बिस्तर पर बिताया गया समय नींद की पूरी तस्वीर नहीं बताता।
छह से आठ घंटे की नींद में कम जोखिम
अध्ययन में नींद की कुल अवधि और बीमारियों के जोखिम के बीच सीधा संबंध नहीं, बल्कि गैर-रैखिक संबंध पाया गया। 86 स्वास्थ्य स्थितियों के लिए नींद की अवधि और जोखिम के बीच महत्वपूर्ण संबंध मिला और इनमें 69 स्थितियों के लिए सबसे कम जोखिम छह से आठ घंटे की नींद की अवधि में केंद्रित था।
इसके विपरीत, पांच घंटे से कम सोने वाले लोगों में 37 स्वास्थ्य स्थितियों का जोखिम अधिक पाया गया। शोधकर्ताओं ने इसे विशेष रूप से कम नींद की ओर ध्यान दिलाने वाला निष्कर्ष माना है।
सिर्फ कम सोना ही नहीं, नींद का टूटना भी महत्वपूर्ण
अध्ययन में नींद की नियमितता भी सामने आई। जिन लोगों की रात-दर-रात सोने की दिनचर्या ज्यादा अनियमित थी, उनमें कई स्वास्थ्य स्थितियों का जोखिम अधिक पाया गया। इसी तरह सोने के बाद लंबे समय तक जागते रहने यानी नींद के बार-बार टूटने का संबंध भी कई बीमारियों से देखा गया।
इसका सीधा मतलब यह है कि कोई व्यक्ति आठ घंटे बिस्तर पर रहने के बावजूद यदि बार-बार जागता है या उसकी सोने-जागने की दिनचर्या लगातार बदलती रहती है, तो उसकी नींद की गुणवत्ता उतनी अच्छी नहीं हो सकती जितनी केवल कुल घंटे देखकर लगती है।
स्मार्टवॉच के आंकड़ों को लेकर एक जरूरी सावधानी
इस अध्ययन की एक खासियत यह है कि शोधकर्ताओं ने केवल लोगों से यह नहीं पूछा कि वे कितने घंटे सोते हैं। कलाई पर पहने गए उपकरणों से सात दिनों की गतिविधि और नींद से संबंधित आंकड़े लिए गए और डीप-लर्निंग एल्गोरिदम की मदद से नींद के अलग-अलग चरणों का अनुमान लगाया गया। इससे सामान्य लोगों द्वारा अपनी नींद को याद करके बताने की तुलना में अधिक वस्तुनिष्ठ आंकड़े मिले।
फिर भी शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह ऑब्जर्वेशनल यानी अवलोकनात्मक अध्ययन है। इसलिए इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कम आरईएम या कम गहरी नींद सीधे बीमारी पैदा करती है, अथवा आरईएम बढ़ाने से बीमारी का खतरा निश्चित रूप से घट जाएगा। जीवनशैली, उम्र, पहले से मौजूद बीमारियां और दूसरे कारक भी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।
आम आदमी के लिए रिसर्च का संदेश
इस अध्ययन का संदेश केवल इतना नहीं है कि “छह से आठ घंटे सोइए।” इससे यह संकेत मिलता है कि अच्छी नींद की तीन बातें महत्वपूर्ण हैं—पर्याप्त अवधि, नींद की गुणवत्ता और नियमितता। देर रात तक जागना, रोज अलग समय पर सोना या रात में बार-बार नींद टूटना केवल अगले दिन की थकान से जुड़ी बात नहीं हो सकती, बल्कि लंबे समय में स्वास्थ्य से भी संबंधित हो सकती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, छह से आठ घंटे की नींद बनाए रखना मध्यम आयु और अधिक उम्र के लोगों के लिए स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन किसी व्यक्ति को अपनी नींद में लगातार परेशानी, अत्यधिक खर्राटे, बार-बार जागना या दिन में असामान्य नींद महसूस होती है तो केवल इस अध्ययन के आधार पर स्वयं कोई बीमारी मान लेना उचित नहीं है। ऐसी स्थिति में चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।