राष्ट्र पहले, राजनीति बाद में: इतिहास की भूल दोहराने से बचना होगा
राष्ट्रीय एकता किसी भी देश की सबसे बड़ी शक्ति होती है। राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन यदि वे सामाजिक विभाजन में बदल जाएं तो विदेशी शक्तियां उसका लाभ उठाने का प्रयास कर सकती हैं। इतिहास से सीख लेकर भारत को राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए एकजुटता बनाए रखनी होगी।
-राजीव जैन-
भारत की तरह ईरान भी एक संप्रभु राष्ट्र है, जहां राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय अस्मिता करोड़ों नागरिकों की चेतना में गहराई से समाई हुई है। किंतु उसकी सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि वहां का समाज लंबे समय से दो वैचारिक धाराओं में विभाजित रहा। एक वर्ग वर्तमान शासन के समर्थन में और दूसरा पूर्व राजशाही के प्रति सहानुभूति रखने वाला।
ऐसे विभाजित सामाजिक वातावरण का लाभ उठाने का प्रयास बाहरी शक्तियां अक्सर करती हैं। अमेरिका जैसे मक्कार देश ने भी ईरान में सरकार विरोधी वर्ग को समर्थन देकर राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की रणनीति बनाई, क्योंकि उसकी निगाह वेनेजुएला की तरह वहां के विशाल तेल संसाधनों पर थी। यदि परिस्थितियां अनुकूल रहतीं तो अमेरिका आंतरिक असंतोष को और हवा देकर सत्ता परिवर्तन की कोशिश की जा सकती थी। किंतु युद्ध के शुरुआती दौर में इजराइल द्वारा ईरान के एक स्कूल पर बम गिराने से पौने दो सौ बच्चों की मौत की घटना ने जनभावनाओं को झकझोर दिया। इसके बाद अमेरिका के खिलाफ व्यापक जनाक्रोश उभरा, विदेशी हस्तक्षेप के प्रति नाराजगी नफरत की हद तक बढ़ी और ईरान के आंतरिक मतभेद काफी हद तक पीछे छूट गए। सारे लोगों के सड़क पर उतरने से विरोधियों के हौसले पस्त हो गए। परिणामस्वरूप सरकार विरोधी स्वर भी कमजोर पड़ गए।
भारत की परिस्थितियां भले ही अलग हों, लेकिन यहां भी वैचारिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण लगातार बढ़ता दिखाई देता है। जनता कट्टरता के मामले में दो भागों में बंट चुकी है। एक वर्ग सरकार के साथ है तो दूसरा वर्ग सरकार के विरोध में। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, किंतु जब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा समाज को स्थायी खांचों में बांटने लगे, तब यह चिंता का विषय बन जाती है। सत्ता प्राप्ति की होड़ में ऐसे अनेक तरीके अपनाए जा रहे हैं, जिनकी कभी कल्पना भी नहीं की गई थी।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारत लंबे समय तक विदेशी शासन के अधीन रहा। हम 800 सालों तक विदेशी आक्रांताओं और 200 साल अंग्रेजों के गुलाम रहे। उस दौर में आंतरिक विघटन, आपसी अविश्वास और राष्ट्रीय एकता का अभाव भी प्रमुख कारणों में शामिल थे। आज भी अमेरिका और चीन जैसी विश्व की बड़ी शक्तियां अपने-अपने रणनीतिक हितों के अनुसार देशों की आंतरिक परिस्थितियों पर नजर रखती हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि भारत अपने भीतर ऐसा कोई वातावरण न बनने दे, जिसका लाभ बाहरी ताकतें उठाने का प्रयास करें।
आज राष्ट्रवाद की परिभाषा को लेकर भी अलग-अलग धारणाएं दिखाई देती हैं। कुछ लोगों को राष्ट्रवादी पाजामे पहना दिए गए हैं जबकि कुछ को गैर-राष्ट्रवादी कहकर खारिज कर दिया जाता है। यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अमेरिका और चीन जैसे दुष्ट राष्टों की निगाह गैर राष्ट्रवादी घोषित वर्ग की तरफ नहीं जाएगी? किसी भी लोकतांत्रिक समाज में वैचारिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्रीय हित की कसौटी पर सभी नागरिकों की भूमिका समान रूप से महत्वपूर्ण होती है। इसलिए ऐसी परिस्थितियों से बचना आवश्यक है, जो समाज में स्थायी विभाजन को जन्म दें।
समय की मांग है कि राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। दूरदृष्टि बनाकर रखनी होगी। अपने राजनीतिक उद्देश्यों की प्रतिपूर्ति के लिए देश को बांटने की कोशिश करने वालों से सावधान रहना होगा। गुलामी के दौर के इतिहास की भूलों से सीख लेकर हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि भारत की एकता, अखंडता और सामाजिक समरसता किसी भी परिस्थिति में कमजोर न पड़े। यदि राष्ट्र मजबूत रहेगा, तभी लोकतंत्र, विकास और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।
(लेखक जाने माने कार्टूनिस्ट हैं। आप एवरेस्ट बैंक में उप महाप्रबंधक और पंजाब नेशनल बैंक में मुख्य प्रबंधक पद पर सेवाएं दे चुके हैं।)