सपा-कांग्रेस गठबंधन में सीटों पर दबाव की जंग तेज, कांग्रेस ने 150 सीटों पर लड़ने की इच्छा जताई, अखिलेश जिताऊ उम्मीदवार की शर्त पर कायम

सपा और कांग्रेस के बीच 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर गठबंधन तो बरकरार है, लेकिन सीट बंटवारे पर अभी बात सिरे नहीं चढ़ पा रही। कांग्रेस कम से कम 150 सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग सार्वजनिक कर चुकी है, जबकि अखिलेश यादव सीट का फैसला ‘जिताऊ उम्मीदवार’ और स्थानीय स्थिति के आधार पर करने की बात कह रहे हैं। संकेत हैं कि दोनों दलों के बीच अक्टूबर में सीट बंटवारे की बातचीत निर्णायक दौर में पहुंच सकती है।

Sep 29, 2026 - 21:46
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सपा-कांग्रेस गठबंधन में सीटों पर दबाव की जंग तेज, कांग्रेस ने 150 सीटों पर लड़ने की इच्छा जताई, अखिलेश जिताऊ उम्मीदवार की शर्त पर कायम

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की तस्वीर तो बनी हुई है, लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों की ओर से दबाव की रणनीति अपनाई जा रही है। कांग्रेस ने पहले ही गठबंधन में कम से कम 150 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा सार्वजनिक कर चुकी है, वहीं सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव सीटों के बंटवारे का आधार संख्या के बजाय उस सीट पर जीतने की क्षमता पर जोर दे रहे हैं। दोनों दलों के रुख से साफ है कि गठबंधन पर सहमति की कोशिशों के साथ सीटों को लेकर अपनी-अपनी स्थिति मजबूत करने की कवायद भी चल रही है।

कांग्रेस ने 150 सीटों का आंकड़ा सामने रखा

यूपी कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने 28 सितंबर को कहा कि कांग्रेस के पास प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों के लिए संभावित उम्मीदवार हैं और गठबंधन के तहत पार्टी कम से कम 150 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है। उन्होंने यह भी कहा कि सीट बंटवारे की प्रक्रिया अक्टूबर में पूरी होने की संभावना है। गौतम ने गठबंधन में कांग्रेस के लिए 50 प्रतिशत सीटों के अधिकार की बात भी कही।

यह पहली बार है जब कांग्रेस की ओर से सीटों की मांग को लेकर 150 का स्पष्ट आंकड़ा सार्वजनिक रूप से सामने आया है। इससे आने वाले दिनों में सपा-कांग्रेस के बीच बातचीत का सबसे बड़ा मुद्दा सीटों की संख्या बनने के संकेत हैं।

अखिलेश का जवाब- सीट उसे मिले जो जीत सकता है

इसके जवाब में अखिलेश यादव ने सीटों के बंटवारे के लिए ‘जिताऊ क्षमता’ को प्रमुख आधार बताया है। रायबरेली से पीडीए रथयात्रा शुरू करते हुए उन्होंने कहा था कि जिस सीट पर जो दल जीत सकता है, वह सीट उसे मिलनी चाहिए। साथ ही उन्होंने कांग्रेस के साथ गठबंधन को मजबूत बताते हुए कहा कि दोनों दल मिलकर काम करेंगे।

सपा की इस स्थिति का मतलब यह है कि पार्टी केवल किसी निश्चित संख्या के आधार पर सीटें बांटने के बजाय सीट-दर-सीट स्थिति, संगठन और उम्मीदवार की चुनावी क्षमता को बातचीत का आधार बनाना चाहती है।

बाहर बयानबाजी, अंदर गठबंधन की बात

सीटों को लेकर दोनों दलों के नेताओं के बीच सार्वजनिक बयानबाजी के बावजूद अखिलेश यादव ने इसे गठबंधन टूटने के संकेत के रूप में पेश नहीं किया है। उन्होंने कहा है कि दोनों दलों के बीच बाहर से अलग-अलग बातें दिखाई दे सकती हैं, लेकिन अंदर से वे साथ हैं। इससे संकेत मिलता है कि सार्वजनिक दबाव के साथ-साथ गठबंधन बनाए रखने की कोशिश भी जारी है।

अखिलेश की दिल्ली बैठक से दूरी भी चर्चा में

30 सितंबर को होने वाली इंडिया गठबंधन की बैठक में अखिलेश यादव के खुद शामिल न होने और पार्टी की ओर से प्रतिनिधि भेजे जाने को भी सीट बंटवारे के मौजूदा तनाव के संदर्भ में देखा जा रहा है। सपा ने इसके लिए राज्यसभा चुनाव की तैयारियों को वजह बताया है। कुछ रिपोर्टों में इसे तत्काल सीट-बंटवारे की बातचीत से दूरी बनाए रखने की रणनीति के रूप में भी देखा गया है, हालांकि यह राजनीतिक आकलन है, पार्टी की आधिकारिक वजह नहीं।

सपा-कांग्रेस के बीच असली खींचतान कहां है?

फिलहाल दोनों दलों की रणनीति में अंतर साफ दिखाई दे रहा है। कांग्रेस सीटों की संख्या और सीट-बंटवारे को जल्द अंतिम रूप देने पर जोर दे रही है, जबकि सपा पहले यह देखना चाहती है कि कांग्रेस किन सीटों पर मजबूत संगठन और जिताऊ उम्मीदवार के साथ मैदान में उतर सकती है। दोनों दलों की ओर से अपने-अपने सर्वे और संभावित उम्मीदवारों पर काम किए जाने की भी खबरें हैं।

इस लिहाज से आने वाला अक्टूबर दोनों दलों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। एक ओर कांग्रेस अपनी मांग को 150 सीट के स्पष्ट आंकड़े के साथ बातचीत की मेज पर रखना चाहती है, वहीं सपा सीटों का फैसला जीत की संभावना और स्थानीय समीकरणों के आधार पर कराने पर जोर दे रही है। अभी तक सार्वजनिक रूप से दोनों दल गठबंधन को लेकर सकारात्मक संकेत दे रहे हैं, इसलिए मौजूदा विवाद को सीटों पर मोलभाव और दबाव की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

SP_Singh AURGURU Editor