जब लक्ष्मी को मुफ़्त टिकट मिला तो उसकी दुनिया चल पड़ी, योगी जी को भी यूपी में लागू करनी चाहिए शक्ति स्कीम

कल दोपहर, महिलाओं से लगभग पूरी सी भरी बस के बाहर मैं पांच मिनिट से खड़ा था, तभी कंडक्टर आया और इशारा किया घुसो। मैं झिझक रहा था, पूरी बस महिलाओं से भरी हुई थी, सिर्फ मैं अकेला पुरुष, लेडीज स्पेशल बस तो नहीं!! कंडक्टर ने एक लड़की को उठाकर मुझे सीट पर बैठाया, अटपटा लगा, लेकिन सीनियर सिटीजन के प्रति सम्मान देखकर मुझे अच्छा लगा। बगल की सीट पर बैठी महिला ने बातचीत में बताया कि ज्यादातर सरकारी बसों में आजकल महिलाएं ही अधिक संख्या में दिखेंगी। बाद में इस बदलाव पर जानकारी इक्कठी करने के दौरान मुझे पता लगा कि कर्नाटक सरकार की महिलाओं के लिए फ्री बस सर्विस योजना ने माहौल बिल्कुल बदल दिया है।

Jan 31, 2026 - 11:59
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जब लक्ष्मी को मुफ़्त टिकट मिला तो उसकी दुनिया चल पड़ी, योगी जी को भी यूपी में लागू करनी चाहिए शक्ति स्कीम

-बृज खंडेलवाल-

हर सुबह साढ़े छह बजे, लक्ष्मी अपने छोटे से घर का दरवाज़ा खोलती है। मैसूरु के पास एक शांत से उपनगरीय गांव में रहने वाली लक्ष्मी एक निजी स्कूल में सहायक के रूप में काम करती है। एक हाथ में टिफ़िन, दूसरे में पुराना सा बैग। दो साल पहले तक उसकी सबसे बड़ी परेशानी काम नहीं थी, बल्कि बस का किराया था। कभी पैदल चल लेती, कभी किसी से उधार मांगती, और कई बार किराया न होने पर काम पर जाना ही छोड़ देती। फिर शक्ति योजना आई, और लक्ष्मी की ज़िंदगी धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ने लगी।

11 जून 2023 को शुरू हुई कर्नाटक सरकार की शक्ति योजना ने एक बहुत सादा, मगर असरदार कदम उठाया, महिलाओं और ट्रांसजेंडर लोगों के लिए सरकारी बसों में मुफ़्त सफ़र। न लंबी लाइन, न फ़ॉर्म, न झंझट। बस आधार या कोई पहचान पत्र दिखाइए, ज़ीरो टिकट लीजिए और चल पड़िए।

लक्ष्मी के लिए वह टिकट सिर्फ़ काग़ज़ नहीं था, वह सुकून और आज़ादी का परमिशन था। गांव से शहर तक, फ़ैक्ट्री से कॉलेज तक, शक्ति योजना ने कर्नाटक की आवाजाही की तस्वीर बदल दी। दो साल में ही 500 करोड़ से ज़्यादा मुफ़्त टिकट जारी हो चुके हैं। ये महज़ आंकड़े नहीं हैं, ये करोड़ों औरतों की चलती-फिरती दास्तानें हैं।

पहले छह महीनों में ही 62 लाख से ज़्यादा महिलाओं ने इस योजना का फ़ायदा उठाया। 2025 तक बेंगलुरु की कई मुख्य बस लाइनों पर 60 प्रतिशत यात्री महिलाएं हो गईं। बसें, जो कभी मर्दों की दुनिया मानी जाती थीं, अब बातों, हंसी, साड़ियों, बैग और ख़्वाबों से भर गईं।

लक्ष्मी जैसी दिहाड़ी और कम आमदनी वाली महिलाओं के लिए हिसाब सीधा है। वह हर हफ़्ते लगभग 700 रुपये बचा लेती है। पहले यही पैसे किराए में उड़ जाते थे। अब उसी से बेटी की कॉपियां, डॉक्टर की फ़ीस या सब्ज़ी में थोड़ा ज़्यादा साग आ जाता है।

सर्वे बताते हैं कि 80 प्रतिशत महिलाएं हफ़्ते के 500 से 1000 रुपये तक बचा रही हैं। ग़रीब घरों में यह बचत नहीं, इज़्ज़त की ज़िंदगी है।

रिसर्च भी वही कहती है जो महिलाएं महसूस कर रही हैं। 15 ज़िलों में हुए एक सर्वे में शक्ति योजना की 96 प्रतिशत पहुंच पाई गई, कर्नाटक की तमाम योजनाओं में सबसे ज़्यादा।

91 प्रतिशत महिलाओं की माली हालत बेहतर हुई, और लगभग हर पांचवीं महिला को नई या बेहतर नौकरी मिली। चिकमगलूरु और बेंगलुरु अर्बन जैसे इलाक़ों में इसका असर ख़ास तौर पर दिखा।

एक और अध्ययन में करोड़ों बस यात्राओं का विश्लेषण किया गया। नतीजा साफ़ था, महिलाओं की पहुंच बढ़ी। नौकरी, कॉलेज, अस्पताल, बाज़ार, सब आसान हो गया।

80 प्रतिशत से ज़्यादा महिलाओं को इलाज तक पहुंच में सहूलियत मिली। बहुत सी महिलाओं ने पहली बार बिना किसी मर्द पर निर्भर हुए अकेले सफ़र किया।

छोटे शहरों और कस्बों में इसका असर और गहरा है। देवेगौड़ा के हसन जिले की महिला किसान रोज़ 200 रुपये बचा रही हैं। मांड्या की सब्ज़ी बेचने वाली महिलाएं अब मैसूरु के बड़े बाज़ार तक जा पा रही हैं।

तुमकुरु के एक कंडक्टर ने कहा, “अब बसों में सबसे ज़्यादा महिलाएं, गारमेंट मज़दूर, छात्राएं और बुज़ुर्ग मांएं दिखती हैं।”

शक्ति योजना ने समाज के नियम भी चुपचाप बदल दिए हैं। जब महिलाएं समूह में सफ़र करती हैं, तो सुरक्षा बढ़ती है। जब बसों में महिलाएँ ज़्यादा दिखती हैं, तो सड़कों का माहौल बदलता है। माता-पिता बेटियों को दूर के कॉलेज भेजने से कम डरते हैं। रिश्तेदारों से मुलाक़ात बढ़ी है। 80 प्रतिशत से ज़्यादा महिलाएं अब ज़्यादा बार मायके और रिश्तों में आ-जा रही हैं।

हाँ, मुश्किलें अब भी हैं। बसों में भीड़ है, बस स्टॉप दूर हैं। लगभग 85 प्रतिशत महिलाएं इन समस्याओं की शिकायत करती हैं। मगर ये नाकामी की नहीं, कामयाबी की दिक़्क़तें हैं। इसका हल और बसें, बेहतर योजना और लगातार निवेश है।

लक्ष्मी के लिए ये सब नीति और राजनीति की बातें हैं। वह बस इतना जानती है कि अब वह अपनी ज़िंदगी को “किराए के हिसाब” से नहीं मापती। अब वह सपने सोचती है, शायद बेहतर नौकरी, शायद शाम की पढ़ाई, या बस इतना कि किसी मौक़े को हाँ कह सके।

शक्ति योजना यह साबित करती है कि जब महिलाएँ आज़ादी से चलती हैं, तो समाज आगे बढ़ता है। कभी-कभी बदलाव के लिए बड़े नारे नहीं चाहिए होते, बस एक मुफ़्त टिकट और आगे बढ़ने की हिम्मत काफ़ी होती है।

SP_Singh AURGURU Editor