कब सीखेंगे सफाई सबकी ज़िम्मेदारी हैः आगरा के हालात बदले हैं, पर मंज़िल अभी दूर है

आगरा ने बीते वर्षों में स्वच्छता के क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार किया है। कूड़े के पहाड़ हटे, यमुना किनारे बेहतर हुए और शहर को 5-स्टार गार्बेज फ्री दर्जा मिला। लेकिन पुरानी बस्तियों की गंदगी, कचरे का सही पृथक्करण, यमुना प्रदूषण और लोगों की उदासीनता अब भी बड़ी चुनौतियां हैं। स्थायी स्वच्छता के लिए सरकार के साथ जनता की जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है।

Apr 20, 2026 - 17:17
 0
कब सीखेंगे सफाई सबकी ज़िम्मेदारी हैः आगरा के हालात बदले हैं, पर मंज़िल अभी दूर है

-बृज खंडेलवाल-Bottom of Form

कभी आगरा में कदम रखते ही नाक सिकुड़ जाती थी। हवा में बदबू का एक ऐसा साया था जो हर गली, हर मोड़ पर पीछा करता था। नालियाँ जैसे सड़ांध की दास्तान सुनाती थीं। बड़े नाले- मंटोला और भैरों,  नदी में खुलते हैं और यमुना, जो कभी शाही वैभव का आईना थी, एक बीमार, सुस्त दरिया में तब्दील हो चुकी है। कुछ वर्षों पहले तक कूड़े के पहाड़ शहर की तकदीर पर तंज कसते खड़े रहते थे। लगता था, यह गंदगी कभी नहीं हटेगी। शहर जैसे अपने ही बोझ तले दबा हुआ था।

आज वही आगरा कुछ और दिखता है। हवा में एक अजीब-सी साफ़गोई है। सड़कें पहले की अपेक्षा साफ़ दिखती हैं। कुबेरपुर का कूड़ाघर, जो कभी शहर की शर्म था, अब सुधरा दिखता है,  कूड़े से खाद बनने लगी है। यमुना किनारा रोड पर भैंसों के विचरण पर प्रभावी रोक ने भी मदद की है। आगरा नगर निगम ने इस क्षेत्र में सराहनीय कार्य किया है। लेकिन यह बदलाव यूं ही नहीं आया,  यह एक लंबे संघर्ष की कहानी है, जिसे स्वच्छ भारत मिशन ने आकार दिया।

आगरा कोई मामूली शहर नहीं। यह दुनिया का एक अव्वल पर्यटन स्थल है, जहां हर साल लाखों सैलानी आते हैं। करीब 44 लाख की आबादी वाला यह शहर दोहरी ज़िम्मेदारी उठाता है; एक तरफ अपने बाशिंदों के लिए साफ़ रहना, दूसरी तरफ दुनिया के सामने अपनी सूरत पेश करना।

साल 2014 से 2019 तक की शुरुआत इज़्ज़त से जुड़ी थी। घर-घर शौचालय बने, मोहल्लों में सामुदायिक शौचालय खड़े हुए और खुले में शौच की मजबूरी धीरे-धीरे कम हुई। 2019 तक आगरा ने खुद को खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिया। यह एक बड़ी कामयाबी थी, मगर मंज़िल नहीं। एक वक्त था जब यमुना आरती स्थल के सामने ही लोग खुलेआम निपटते थे; अब सफाई कर्मी सतर्क रहते हैं।

आगरा की असली जंग तो कूड़े के साथ थी। कुबेरपुर इसका सबसे बड़ा ज़ख्म था ,  करीब 19 लाख मीट्रिक टन कूड़ा वहाँ सालों से सड़ रहा था। बायोमाइनिंग और बायोरेमेडिएशन के ज़रिए उस ज़मीन को वापस हासिल किया गया। आज वहीं दस एकड़ में मियावाकी जंगल लहलहा रहा है। पास ही प्रोसेसिंग प्लांट लगे हैं। यानी जो कचरा कभी मुसीबत था, वही अब उपयोगी उत्पाद बन रहा है। हर वार्ड में डोर-टू-डोर संग्रह शुरू हुआ। बड़े मटेरियल रिकवरी सेंटर रोज़ सैकड़ों टन कचरा छाँटते हैं। सीवर और ट्रीटमेंट प्लांट के लिए "वन सिटी, वन ऑपरेटर" मॉडल लागू हुआ।

आँकड़े भी गवाही देते हैं। 2024-25 के स्वच्छ सर्वेक्षण में आगरा ने 12,500 में से 11,532 अंक हासिल किए और शहर को 5-स्टार गार्बेज फ्री का दर्जा मिला।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। चमकती सड़कों से हटकर जब पुराने शहर की तंग गलियों में जाते हैं, तो तस्वीर धुंधली हो जाती है। कागज़ों में भले 100% कचरा अलग-अलग करने का दावा हो, हकीकत में गीला-सूखा कचरा अक्सर एक साथ ही फेंका जाता है। यमुना अब भी चुपचाप सब देख रही है ; गंदा पानी आज भी उसमें गिरता है। किनारे साफ़ हैं, मगर दरिया अब भी बीमार है। सार्वजनिक शौचालयों की हालत कई जगह ठीक नहीं। झुग्गी बस्तियों में सफाई का इंतज़ाम डगमगाता है। सफाई कर्मचारियों को अक्सर सुरक्षा के पूरे साधन नहीं मिलते और वेतन में देरी भी एक आम शिकायत है।

सबसे बड़ा मसला शायद व्यवस्था नहीं, लोगों का रवैया है। सफाई को आज भी अधिकांश लोग सरकारी काम समझते हैं, अपना नहीं। घर के अंदर चमक-दमक, मगर कचरा चुपचाप बाहर सड़क पर सरका देना ;  यह दोहरी सोच अब भी ज़िंदा है। यह उदासीनता, यह बेपरवाही पूरी मेहनत पर पानी फेर देती है।

यह तस्वीर सिर्फ आगरा की नहीं, पूरे देश की झलक है। 2014 के बाद देश में कचरा प्रोसेसिंग 16% से बढ़कर 80% से ऊपर पहुँची ;  यह छोटी उपलब्धि नहीं। मगर 2021 से 2026 की दूसरी पारी थोड़ी मुश्किल दिख रही है। पूरे देश में कचरे का सही पृथक्करण अभी भी 60% से नीचे है। बजट कटौती की बात इस मिशन की रफ्तार पर सवाल खड़ा करती है।

आगे का रास्ता साफ़ है, मगर आसान नहीं। अब ज़रूरत बड़े अभियानों की नहीं, रोज़ की आदतों की है। सफाई कर्मचारियों को इज़्ज़त, सुरक्षा और समय पर वेतन मिले तो व्यवस्था मज़बूत होगी। फंडिंग ऐसी हो जिसमें परिणामों को अहमियत मिले, केवल संख्या को नहीं। सबसे अहम :  सफाई सरकार का काम नहीं, लोगों की आदत बने।

आगरा ने साबित किया है कि बदलाव मुमकिन है, मगर असली इम्तिहान अब है। 2014 का आगरा और आज का आगरा ;  फ़र्क तो दिखता है। मगर आज का आगरा और एक पूरी तरह स्वस्थ, टिकाऊ शहर ;  इस फासले को पाटना अभी बाकी है। शहर एक दिन में साफ़ नहीं होता; यह रोज़ के छोटे-छोटे कर्म से चमकता है। अगर यह सिलसिला टूटा तो बदबू फिर लौट आएगी ;  और इस बार ज़िम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं, उस हर हाथ की होगी जिसने कचरा फेंका और मुँह फेर लिया।Bottom of Form

SP_Singh AURGURU Editor