मनौना धाम में धनतेरस पर श्रमिकों को मिला सम्मान, महंत ओमेंद्र महाराज बोले- श्रमिक समाज की असली रीढ़
-आरके सिंह- बरेली/आंवला। धनतेरस के पर्व पर मनौना धाम में श्रम और श्रमिकों के सम्मान की अनूठी मिसाल देखने को मिली। धाम के निर्माण और व्यवस्थाओं में दिन-रात मेहनत करने वाले श्रमिकों को महंत ओमेंद्र महाराज ने उपहार भेंटकर सम्मानित किया। उन्होंने कहा कि श्रमिक केवल निर्माण कार्य करने वाले लोग नहीं, बल्कि हमारे परिवार का अभिन्न हिस्सा हैं। उनके कठिन परिश्रम से ही भव्य इमारतें और धार्मिक स्थल आकार लेते हैं। श्रमिकों का सम्मान करना समाज का नैतिक दायित्व है।
उत्तर प्रदेश के सुप्रसिद्ध धार्मिक स्थल मनौना धाम में धनतेरस का पर्व सादगी और आत्मीयता के साथ मनाया गया। इस अवसर पर आयोजित सम्मान कार्यक्रम में महंत ओमेंद्र महाराज ने धाम के निर्माण एवं व्यवस्थाओं में लगातार सेवाएं दे रहे श्रमिकों को उपहार देकर उनका उत्साह बढ़ाया। महंत की इस पहल से श्रमिकों में खुशी और आत्मसम्मान का भाव दिखाई दिया।
कार्यक्रम में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए महंत ओमेंद्र महाराज ने कहा कि श्रमिक किसी भी निर्माण कार्य और समाज के विकास की असली रीढ़ होते हैं। श्रमिक हमारे भाई हैं और हम उन्हें अपने परिवार से अलग नहीं मानते। जीवन में दिखाई देने वाला वैभव और भव्यता श्रमिकों के पसीने और अथक मेहनत का परिणाम है। विशाल इमारतों से लेकर भव्य प्रांगणों के निर्माण तक में श्रमिकों का योगदान सबसे महत्वपूर्ण होता है। इसलिए उनका सम्मान करना हमारा परम कर्तव्य है।
उन्होंने श्रमिकों के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि किसी भी संस्थान या धार्मिक स्थल की भव्यता के पीछे उन लोगों की मेहनत होती है, जो दिन-रात अपना पसीना बहाकर उसे आकार देते हैं। उनके परिश्रम और समर्पण के बिना विकास की कल्पना नहीं की जा सकती।
महंत ओमेंद्र महाराज से सम्मान और उपहार पाकर श्रमिकों के चेहरे खिल उठे। मनौना धाम में निरंतर सेवाएं दे रहे श्रमिक केशव ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा कि महंत जी द्वारा इस तरह सम्मानित किए जाने से उन्हें स्वयं पर गर्व महसूस हो रहा है। उनके अनुसार, मनौना धाम में काम करना उनके लिए केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि सेवा करने का अवसर भी है।
धनतेरस जैसे पर्व पर श्रमिकों को सम्मानित करने की इस पहल की क्षेत्र में सराहना हो रही है। आयोजन ने यह संदेश दिया कि त्योहारों की खुशियां तभी सार्थक हैं, जब उन लोगों को भी सम्मान और अपनापन मिले, जिनके परिश्रम से समाज की भव्यता और समृद्धि का निर्माण होता है।