वाह री आगरा पुलिस! जो एफआईआर हाईकोर्ट ने रद्द कर दी थी, हरीपर्वत थाने ने उसी में चार्जशीट लगा दी

आगरा की हरीपर्वत थाना पुलिस ने हाईकोर्ट द्वारा निरस्त एफआईआर में भी फरवरी 2025 में चार्जशीट दाखिल कर दी। मामला पारिवारिक संपत्ति विवाद का था, जिसमें मीडिएशन के बाद हाईकोर्ट ने नवंबर 2024 में एफआईआर खत्म कर दी थी। अब सीजेएम ने पुलिस से आख्या तलब की है और एसीपी के पर्यवेक्षण पर भी सवाल खड़े किए गए हैं।

Aug 9, 2025 - 12:13
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वाह री आगरा पुलिस! जो एफआईआर हाईकोर्ट ने रद्द कर दी थी, हरीपर्वत थाने ने उसी में चार्जशीट लगा दी

- सीजेएम कोर्ट से संबंधित लोगों के पास समन पहुंचने पर हुए विवेचनाधिकारी के कारनामे की जानकारी, अधिवक्ता अरुण दीक्षित ने किया खुलासा

आगरा। आगरा पुलिस खुद को हाईकोर्ट से भी ऊपर मानने लगी है। शायद इसीलिए आगरा पुलिस ने हाईकोर्ट के आदेश को भी नहीं माना। हरीपर्वत थाना पुलिस ने ऐसा किया है। धोखाधड़ी सहित अन्य धाराओं में दर्ज एक एफआईआर को हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया था। इसके बावजूद हरीपर्वत थाना पुलिस ने इस केस में चार्जशीट लगा दी है। जिन लोगों के खिलाफ चार्जशीट लगी  थी, उनके वारंट जारी होने के बाद पुलिस के कारनामे की जानकारी हुई। जब हाईकोर्ट के आदेश का मामला सीजेएम के संज्ञान में आया तो नाराजगी जताते हुए अब पुलिस से आख्या तलब की है।

ऐसा पहली मर्तबा नहीं हुआ है। इससे पहले भी हरीपर्वत थाना पुलिस का एक कारनामा सामने आ चुका है। एक मृत  व्यक्ति के बयान दर्ज दिखाकर उसके खिलाफ पुलिस ने चार्जशीट लगा दी थी। तब सीजेएम के आदेश पर पुलिस कर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था।

अंकित धीर निवासी दयालबाग का अपनी बुआओं के साथ संपत्ति को लेकर पारिवारिक विवाद था। कोर्ट के आदेश पर उनकी  बुआओं, फूफ़ाओं और उनके बच्चों सहित 10 लोगों के खिलाफ हरीपर्वत थाने में धोखाधड़ी सहित कई अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ था। मामले में हाईकोर्ट में मीडिएशन होने के बाद दोनों पक्षों में समझौता हो गया था। इसके बाद हाईकोर्ट ने तीन नवंबर 2024 को हरीपर्वत थाने में दर्ज एफआईआर निरस्त कर दी थी।

19 सितंबर को इसकी कॉपी भी थाने में उपलब्ध करा दी गई। इसके बावजूद हरीपर्वत थाना पुलिस ने फरवरी 2025 में चार्जशीट लगाकर स्थानीय कोर्ट में दाखिल कर दी। चार्जशीट में सभी 10 लोगों के नाम शामिल हैं। हाल ही में इन लोगों के घर पर जब कोर्ट से सम्मन पहुंचा तो उन्होंने अपने अधिवक्ता डॉक्टर अरुण कुमार दीक्षित से संपर्क किया।

डॉक्टर अरुण कुमार दीक्षित ने पता किया तो पता चला पुलिस ने चार्जशीट लगा दी है, जबकि हाई कोर्ट से एफआईआर को निरस्त कर दिया गया था। उन्होंने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के पुलिस की इस चार्जशीट पर आपत्ति दर्ज कराई और दलील दी कि आगरा पुलिस का यही हाल है। अगर उसे पैसे नहीं दो तो वह लोगों को फंसा देती है। अधिवक्ता दीक्षित ने कहा कि दरोगा ने पैसे मांगे थे उसे पैसे नहीं दिए गये थे। इसीलिए उसने चार्जशीट लगा दी। उसने हाई कोर्ट के भी आदेश को नहीं माना।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट भी विवेचनाधिकारी का यह कारनामा देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि हाई कोर्ट द्वारा एफआईआर को निरस्त किए जाने के बावजूद चार्जशीट लगा दी गई। सीजेएम ने अब हरीपर्वत पुलिस से इस पर आख्या मांगी है।

एसीपी ने क्या पर्यवेक्षण किया?

किसी भी विवेचना में दरोगा के द्वारा चार्जशीट या एफआर लगाए जाने के बाद इंस्पेक्टर के पास पर्चे सीन होने के लिए जाते हैं। इसके बाद वह उसे पेशी में एसीपी के पास भेज देते हैं। एसीपी उसे पढ़ने के बाद कोर्ट में पेश करने के लिए ओके करते हैं। मतलब कि चार्जशीट का पर्यवेक्षण एसीपी की जिम्मेदारी है। अधिवक्ता दीक्षित ने कोर्ट में सवाल उठाया कि आखिर एसीपी ने इस मामले में क्या पर्यवेक्षण किया? अधिवक्ता डॉ. दीक्षित का कहना है कि वह हाई कोर्ट में पुलिस के अधिकारियों को भी पार्टी बनाएंगे जिससे भविष्य में वह किसी और के साथ ऐसा ना करें और हाईकोर्ट के आदेश को गंभीरता से लें।

SP_Singh AURGURU Editor