72 एकड़ का पालीवाल पार्क, छह महीने से ठहरा काम, न बोर्ड न जवाब: क्या राजकीय उद्यान यूं ही पक्का होता रहेगा?

आगरा के हृदय में स्थित पालीवाल पार्क में पिछले छह महीनों से चल रहे सिविल वर्क को लेकर न प्रशासन बोल रहा है, न जिम्मेदार विभाग सामने आ रहा है। 72 एकड़ में फैले इस ऐतिहासिक राजकीय उद्यान में पक्का निर्माण जारी है, लेकिन न तो किसी सूचना बोर्ड पर परियोजना का विवरण है, न ठेकेदार का नाम, न लागत और न ही निर्माण अवधि का कोई उल्लेख है। राजकीय उद्यान विकास समिति, आगरा मंडल की चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

Mar 5, 2026 - 12:03
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72 एकड़ का पालीवाल पार्क, छह महीने से ठहरा काम, न बोर्ड न जवाब: क्या राजकीय उद्यान यूं ही पक्का होता रहेगा?
पालीवाल पार्क में पिछले छह महीने से चल रहे सिविल वर्क की कुछ तस्वीरें, जिसके बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है।

आगरा। पालीवाल पार्क, जिसे आगरा का ग्रीन लंग कहा जाता है, वहां पिछले करीब छह महीनों से सिविल वर्क जारी है। लेकिन आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि किस विभाग के आदेश पर निर्माण हो रहा है, ठेकेदार कौन है, कुल अनुमानित लागत कितनी है, और कब तक काम पूरा होना है, इनमें से कोई भी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

यहां बता दें कि भारत सरकार और राज्य सरकार के सभी सार्वजनिक कार्यों में सूचना बोर्ड (प्रोजेक्ट इनफॊरमेशन बोर्ड) लगाना अनिवार्य है, जिसमें निम्न विवरण स्पष्ट रूप से लिखा होना चाहिए- निर्माण कराने वाला विभाग, कार्य का उद्देश्य और स्वरूप, ठेकेदार / एजेंसी का नाम, स्वीकृत लागत कार्य प्रारंभ और समाप्ति की तिथि आदि। पालीवाल पार्क में हो रहे सिविल वर्क में इनमें से कुछ भी मौजूद नहीं है।

सबसे बड़ा सवाल: 72 एकड़ में कितना पक्का निर्माण वैध है?

शहर में लम्बे समय से पर्यावरण संरक्षण के लिए सक्रिय ईको क्लब के संचालक प्रदीप खंडेलवाल कहते हैं, पर्यावरण नियमों और एनजीटी के दिशा-निर्देशों के अनुसार, किसी भी राजकीय उद्यान / ग्रीन ज़ोन में सीमित प्रतिशत (आमतौर पर 5–10% से अधिक नहीं) में ही पक्का निर्माण अनुमन्य होता है। लेकिन पालीवाल पार्क में हो रहा कार्य देखकर यह आशंका बढ़ रही है कि निर्माण का प्रतिशत निर्धारित सीमा से अधिक तो नहीं जा रहा?

राजकीय उद्यान विकास समिति पूरी तरह निष्क्रिय?

इस पूरे मामले में राजकीय उद्यान विकास समिति, आगरा मंडल की भूमिका सबसे अधिक सवालों के घेरे में है। समिति ने भी अब तक इस मामले में कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया है। न ही किसी तरह की प्रेस विज्ञप्ति जारी की और न ही सूचना बोर्ड लगाने का निर्देश दिया गया। यह निष्क्रियता प्रशासनिक लापरवाही है या जानबूझकर पारदर्शिता से बचने का प्रयास, यह स्पष्ट होना चाहिए।

एनजीटी और जनहित कार्यकर्ता आगे आएं

इस पृष्ठभूमि में अच्छा हो कि एनजीटी में जनहित याचिकाएं दायर करने वाले पर्यावरण कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं और सामाजिक संगठनों को इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लें। प्रदीप खंडेलवाल पीड़ा जताते हुए कहते हैं, यह मामला केवल एक पार्क का नहीं, बल्कि शहर के पर्यावरण, सार्वजनिक संपत्ति और भावी पीढ़ियों के अधिकार का है।

SP_Singh AURGURU Editor