सिंधु जल संधि खत्म, पाकिस्तान में हड़कंप की स्थिति, शहबाज शरीफ और असीम मुनीर बड़े संकट में
सिंधु जल संधि के स्थगित होने से पाकिस्तान में पानी का संकट पैदा हो गया है। कृषि क्षेत्रों में इसका असर साफ देखा जा रहा है। पाकिस्तान के कई सूबों में किसानों के पास चावल की खेती के लिए सिंचाई का पानी उपलब्ध नहीं है। इस कारण खाद्य संकट की आशंका जताई जा रही है।
इस्लामाबाद। भारत ने पहलगाम हमले के जवाब में सिंधु जल संधि (IWT) को पिछले एक साल से स्थगित किया हुआ है। इसका असर पाकिस्तान पर अब साफ नजर आने लगा है। पाकिस्तान के अन्न उत्पादक क्षेत्रों में सिंचाई की पानी की भारी कमी महसूस की जा रही है। हालात इतने गंभीर हैं कि अगर सिंधु जल संधि को दोबारा एक्टिव नहीं किया जाता है तो पाकिस्तान में सूखा पड़ सकता है। इसका सीधा असर खाद्य सुरक्षा पर होगा, जो पाकिस्तान के लिए पहले से ही चिंता का विषय है। अब पाकिस्तान सरकार पर आतंकवाद को पालने-पोसने या अवाम को पानी से महरूम रखने में किसी एक को चुनने का दबाव है।
इसकी सबसे ज्यादा मार खैबर पख्तूनख्वा और सिंध सूबे में पड़ती दिख रही है। इन इलाकों में गेहूं की फसल की कटाई के बाद अब चावल के उत्पादन पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। पाकिस्तान के अधिकतर चावल उत्पादक क्षेत्र सिंधु जल संधि की नदियों से मिलने वाले पानी पर निर्भर हैं। चावल की खेती पूरी तरह से पानी की लगातार और बिना किसी रुकावट के आपूर्ति पर निर्भर करती है। ऐसे में अगर पानी नहीं मिलता है तो फसल उत्पादन पर संकट आ सकता है। इससे पाकिस्तान में खेती-बाड़ी, पशुधन, मधुमक्खी पालन और खाद्य सुरक्षा के भविष्य को लेकर डर पैदा हो गया है।
विश्व बैंक के सहयोग से 1960 में हस्ताक्षरित सिंधु जल संधि को दशकों के राजनीतिक तनाव और युद्धों के बावजूद, पाकिस्तान और भारत के बीच सबसे मजबूत समझौतों में से एक माना जाता रहा है।
यह संधि सिंधु बेसिन के पानी के बंटवारे और प्रबंधन को नियंत्रित करती है, जो पूरे पाकिस्तान में खेती-बाड़ी, पीने के पानी, पनबिजली और उद्योगों के लिए जीवन रेखा का काम करता है। सिंधु जल समझौता 19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुआ था।
खैबर पख्तूनख्वा के कृषि अनुसंधान के पूर्व महानिदेशक डॉ अब्दुल रऊफ ने कहा कि चावल की खेती पहले से ही जलवायु परिवर्तन और बढ़ती लागत जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे में सिंधु जल संधि के निलंबन के कारण पैदा हुई पानी की अनिश्चितता ने, खासकर चावल और तरबूज उगाने वाले किसानों के मन में डर पैदा कर दिया है। उन्होंने इस संधि को पाकिस्तान की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ बताया, और चेतावनी दी कि पानी के बहाव में कोई भी लंबे समय तक रुकावट पानी पर निर्भर फसलों—खासकर खैबर पख्तूनख्वा और पंजाब प्रांतों में चावल, आम, खरबूजे और तरबूज—पर बुरा असर डाल सकती है।
डॉ रऊफ ने कहा, "पानी दुनिया भर में इंसानों और खेती-बाड़ी के लिए जीवनरेखा है। पाकिस्तान हर साल लगभग 7.5 मिलियन टन चावल पैदा करता है और दुनिया के प्रमुख चावल उत्पादक देशों में 10वें स्थान पर है।" उन्होंने कहा कि सिंचाई के पानी में किसी भी तरह की कमी का चावल उत्पादन और उसके निर्यात पर गंभीर असर पड़ सकता है, और चेतावनी दी कि इसके बुरे नतीजे सीमाओं के पार भी फैल सकते हैं।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर भारत के सिंधु जल संधि के निलंबन से परेशान हैं। उनके कहने पर पाकिस्तान यह मामला अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय में लेकर गया है, लेकिन भारत ने इसकी भूमिका को ही खारिज कर दिया है। इससे पाकिस्तान को यह समझ नहीं आ रहा है कि वह भारत पर सिंधु जल संधि को फिर से लागू करने के लिए किस तरह से दबाव डालें। इस चक्कर में पाकिस्तान के हुक्मरान भारत को जंग की धमकी दे रहे हैं। हालांकि, भारत पर पाकिस्तान की इन धमकियों का कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है।