सेल्फी, रील और लाइक्स की भूख ने युवाओं को बना दिया है 'सेल्फी रिपब्लिक’ का शिकार'
डेली यमुना किनारे, आरती स्थल के पास लड्डू गोपाल की विशाल मूर्ति के इर्द गिर्द, तमाम लोग सेल्फी लेते हैं, अजीब डांस करते हुए रील बनाते हैं। रोड पर कोई गिर जाए तो पहले वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं, बाद में हाल चल पूछते हैं। मैं और मेरा मोबाइल फोन, बस, और कुछ नहीं!
-बृज खंडेलवाल-
दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई देती है। चार लड़के मुस्कराते हुए मोबाइल कैमरे की तरफ देखते हैं। एक लड़का हाथ और आगे बढ़ाता है ताकि “परफेक्ट सेल्फी” आ सके। अगले ही पल तेज रफ्तार ट्रेन उन्हें कुचल देती है। उनकी तस्वीर कभी सोशल मीडिया तक नहीं पहुंचती।
भारत में सेल्फी का जुनून अब सिर्फ एक मासूम शौक नहीं रहा। यह एक खतरनाक सामाजिक बीमारी बन चुका है। रेलवे ट्रैक, नदी किनारे, पहाड़, झरने, पानी की टंकियां, चलती ट्रेनें, सब अब “रील” और “वायरल वीडियो” के मंच बन गए हैं। लाइक्स और व्यूज़ की भूख ने युवाओं को मौत से खेलना सिखा दिया है।
भारत को अब दुनिया की “सेल्फी रिपब्लिक” कहा जाने लगा है। कुछ लोग इसे “किलफी” संस्कृति भी कहते हैं, यानी ऐसी सेल्फी जो जान ले ले।
घटनाएं दिल दहला देती हैं। 2015 में मथुरा के पास तीन कॉलेज छात्र ताजमहल जाते समय रेलवे ट्रैक पर रुक गए। उन्हें पीछे आती ट्रेन के साथ एक “डेरिंग सेल्फी” चाहिए थी। ट्रेन नहीं रुकी। उनकी जिंदगी रुक गई।
2017 में दिल्ली में दो किशोर रेलवे ट्रैक पर सेल्फी लेते हुए ट्रेन की चपेट में आ गए। उन्हें लगा कि आखिरी पल में हट जाएंगे। मगर मौत ज्यादा तेज निकली।
2019 में पानीपत में तीन युवक एक ट्रेन से बचने के लिए दूसरे ट्रैक पर कूद गए। वहां दूसरी ट्रेन आ रही थी। तीनों की मौके पर मौत हो गई।
कानपुर में 2016 में सात छात्र गंगा में डूब गए। एक लड़का बांध के किनारे सेल्फी लेते समय फिसल गया। बाकी दोस्त उसे बचाने कूद पड़े। कोई वापस नहीं लौटा।
हाल ही में उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर में पांच किशोर वायरल रील बनाने के लिए पानी की ऊंची टंकी पर चढ़ गए। उतरते समय जंग लगी सीढ़ी टूट गई। एक की मौत हो गई, कई गंभीर घायल हुए।
फिर भी लोग नहीं संभल रहे। आखिर क्यों? मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह डिजिटल दौर की नई बीमारी है। सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म (तरीके) सनसनी, खतरा और ड्रामा पसंद करते हैं। जितना खतरनाक वीडियो, उतने ज्यादा व्यूज़। मोबाइल स्क्रीन पर मिलने वाला हर “लाइक” दिमाग को छोटी सी खुशी देता है। धीरे धीरे यही आदत नशा बन जाती है।
आज का युवा सिर्फ जिंदगी नहीं जी रहा, वह हर पल “परफॉर्म” कर रहा है। हर किसी को वायरल होना है। हर कोई इंटरनेट का सितारा बनना चाहता है।
दोस्त भी उकसाते हैं। “भाई, ये रील फाड़ देगी।” “थोड़ा और आगे जा।” “ट्रेन के पास खड़े हो, मजा आएगा।” बस, यहीं हादसा जन्म लेता है।
सबसे दुखद बात यह है कि संवेदनाएं भी कमजोर पड़ रही हैं। सड़क हादसों में घायल लोगों की मदद करने के बजाय लोग वीडियो बनाते हैं। बाढ़, आग, अंतिम संस्कार, अस्पताल, यहां तक कि मौत के पास भी लोग सेल्फी लेते नजर आते हैं।
दुनिया अब दर्द को भी “कंटेंट” बना रही है। पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं: "यह सिर्फ भारत की समस्या नहीं है। अमेरिका में लोग खाई और पहाड़ों से गिरकर मरे हैं। रूस में सरकार को “सेफ सेल्फी कैंपेन” चलाना पड़ा क्योंकि लोग हथियारों और चलती गाड़ियों के साथ तस्वीरें लेते हुए मर रहे थे। स्पेन और ऑस्ट्रेलिया में भी समुद्र किनारे और चट्टानों पर सेल्फी लेते हुए कई पर्यटकों की मौत हुई। मगर भारत की हालत ज्यादा गंभीर है।"
एक अरब से ज्यादा मोबाइल फोन। सस्ता इंटरनेट। युवा आबादी। सोशल मीडिया की अंधी दौड़। और कमजोर कानून व्यवस्था। यह मिश्रण बेहद खतरनाक है।
सरकार ने कई जगह “नो सेल्फी ज़ोन” बनाए हैं। रेलवे स्टेशन और झरनों के पास चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं। पुलिस जागरूकता अभियान चलाती है। मगर असर बहुत कम दिखता है। सिर्फ बोर्ड लगाने से नशा नहीं रुकता।
असल सवाल कहीं ज्यादा गहरा है। क्या आज का इंसान “अनदेखा” होने से डरने लगा है? क्या हर खुशी, हर सफर, हर दुख, हर खाना, हर पल दुनिया को दिखाना जरूरी हो गया है?
अब जिंदगी जीने से ज्यादा उसे पोस्ट करना जरूरी लगता है। मोबाइल कैमरा नया आईना बन चुका है। लोग खुद को दूसरों की नजर से देखने लगे हैं। और इस “सेल्फी रिपब्लिक” की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि लोग जिंदगी रिकॉर्ड करते करते जिंदगी खो रहे हैं।
कोई भी सेल्फी इतनी जरूरी नहीं कि उसके बदले जनाज़ा उठे। कोई भी सेल्फी इतनी खूबसूरत नहीं कि उसकी कीमत एक मौत हो। फिल्टर चेहरे बदल सकता है। कब्र नहीं।