श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बंगाल में कमल का प्रचंड उदयः 15 साल की ममता सत्ता ढही, ध्रुवीकरण और जनाक्रोश के बीच हुआ भाजपा का जबर्दस्त उभार, सटीक रणनीति, केंद्रीय बलों की सख्ती और संगठनात्मक ताकत से रचा जा सका इतिहास

बंगाल में भाजपा की प्रचंड जीत ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी, कानून-व्यवस्था पर सवाल, धार्मिक ध्रुवीकरण और मजबूत संगठनात्मक रणनीति का परिणाम है। इस चुनाव ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह बदलते हुए एक नए राजनीतिक दौर की शुरुआत के संकेत दिए हैं।

May 4, 2026 - 19:59
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श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बंगाल में कमल का प्रचंड उदयः 15 साल की ममता सत्ता ढही, ध्रुवीकरण और जनाक्रोश के बीच हुआ भाजपा का जबर्दस्त उभार, सटीक रणनीति, केंद्रीय बलों की सख्ती और संगठनात्मक ताकत से रचा जा सका इतिहास

-एसपी सिंह-

पश्चिम बंगाल की राजनीति ने इस बार ऐसा करवट ली है, जिसकी गूंज सिर्फ कोलकाता तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति तक साफ सुनाई दे रही है। पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड विजय केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि इसने लंबे समय से स्थापित ममता बनर्जी के राजनीतिक ढांचे के ध्वस्त होने का संकेत है। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के 15 वर्षों के शासन का अंत इस बात का प्रतीक बन गया है कि बंगाल के लोग निर्णायक बदलाव चाहते थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंगाल में भाजपा की जीत पर अपनी प्रतिक्रिया इस तरह दी है- बंगाल में कमल खिल ही गया। पीएम मोदी ने यह भी कहा कि इस जीत को देखने के लिए पार्टी की न जाने कितनी पीढ़ियां खप गईं। पीएम मोदी सही ही कह रहे हैं क्योंकि पार्टी के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राज्य में ही कमल नहीं खिल पा रहा था।

इस जीत को समझने के लिए सबसे पहले उस एंटी-इनकंबेंसी को समझना होगा, जो धीरे-धीरे जनाक्रोश में बदल गई। ममता बनर्जी की छवि एक समय संघर्षशील नेता की थी, लेकिन समय के साथ वही छवि सत्ता केंद्रित होती चली गई। स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार, कट मनी, और पार्टी कार्यकर्ताओं की कथित दबंगई जैसे मुद्दों ने आम जनता में असंतोष पैदा किया। कई क्षेत्रों में यह धारणा मजबूत हुई कि प्रशासनिक तंत्र निष्पक्ष नहीं रहा और राजनीतिक संरक्षण के तहत काम हो रहा है।

दूसरा बड़ा कारण कानून-व्यवस्था और चुनावी हिंसा को लेकर बनी धारणा रही। पिछले चुनावों में सामने आई घटनाओं, मतदाताओं को डराने, बूथ कब्जाने और विपक्षी कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमलों ने इस बार मतदाताओं को अधिक सतर्क और आक्रोशित किया। यही वजह रही कि जब कड़े सुरक्षा इंतजाम हुए, तो लोगों ने खुलकर मतदान किया और सत्ता के खिलाफ अपना गुस्सा व्यक्त कर ममता बनर्जी को सिंहासन से उतार दिया।

बंगाल में इस चुनाव का तीसरा और सबसे निर्णायक पहलू रहा ध्रुवीकरण का फैक्टर। भाजपा ने चुनाव को केवल विकास बनाम विकास नहीं रहने दिया, बल्कि इसे पहचान, सुरक्षा और सांस्कृतिक विमर्श से जोड़ दिया। अवैध घुसपैठ, जनसंख्या संतुलन और धार्मिक पहचान जैसे मुद्दों को जिस आक्रामकता से उठाया गया, उसने हिंदू मतदाताओं के बड़े हिस्से को एकजुट किया। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों ने भी ध्रुवीकरण को और तेज किया। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि मुस्लिम वोटों के लिए कुछ भी करने की जिद ही ममता बनर्जी को ले डूबे। इस चुनाव में धार्मिक आधार पर वोटिंग पैटर्न ने चुनाव को एकतरफा बना दिया।

भाजपा की प्रचंड विजय का चौथा महत्वपूर्ण कारण भाजपा की संगठनात्मक रणनीति रही। पीएम नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी ने बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क खड़ा किया। राष्ट्रीय महासचिव सुनील बंसल की जमीनी रणनीति, भूपेंद्र यादव का प्रबंधन और कार्यकर्ताओं की आक्रामक मेहनत ने भाजपा को उस स्तर तक पहुंचा दिया, जहां वह हर सीट पर प्रभावी मुकाबला कर सकी।

इसके अलावा, चुनाव आयोग की सख्ती और केंद्रीय बलों की भारी तैनाती ने भी इस बार ममता बनर्जी के कार्यकर्ताओं को खेला नहीं करने दिया। लगभग 2.70 लाख केंद्रीय बलों की मौजूदगी ने यह सुनिश्चित किया कि मतदाता बिना डर के वोट डाल सकें। इससे वह साइलेंट वोटर सामने आया, जो पहले दबाव और डर के साये में मतदान नहीं कर पाता था।

ममता बनर्जी के लिए एक और झटका उनकी रणनीतिक आक्रामकता भी बनी। चुनाव आयोग से टकराव, एसआईआर जैसे मुद्दों पर न्यायालयों तक जाना, इन सबने उनके समर्थकों को तो जोड़ा, लेकिन एक बड़े वर्ग को यह संदेश भी गया कि ममता बनर्जी सरकार घुसपैठियों को बंगाल में बनाये रखने की पैरोकारी कर रही हैं। कदाचित इससे बंगाल के लोगों को लगा कि घुसपैठिये बने रहे तो राज्य में तेजी से डेमोग्राफी चेंज होगा और उनका अपने ही राज्य में रहना मुश्किल हो जाएगा।

इतिहास के नजरिए से देखें तो बंगाल में सत्ता परिवर्तन कोई नई बात नहीं है। कांग्रेस से सत्ता छीनकर लेफ्ट फ्रंट ने 34 साल राज किया, फिर 2011 में ममता बनर्जी ने उसे हटाया, और अब भाजपा ने 15 साल पुरानी ममता बनर्जी की सत्ता को उखाड़ फेंका। लेकिन इस बार बदलाव सिर्फ सरकार का नहीं, बल्कि राजनीतिक धुरी के बदलने का संकेत है।

कुल मिलाकर भाजपा की जीत केवल उसकी रणनीति का परिणाम नहीं, बल्कि ममता सरकार के खिलाफ जमा हुए असंतोष, ध्रुवीकरण, मजबूत संगठन और चुनावी प्रबंधन का संयुक्त असर है। आने वाले समय में बंगाल की राजनीति राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय संघर्ष के नए दौर में प्रवेश करती दिखेगी।

SP_Singh AURGURU Editor