राज्यों की सत्ता से लाल झंडा गायब: केरल में हार के बाद पहली बार देश के किसी राज्य में वाम मोर्चे की सरकार नहीं
देश में वामपंथ का पूरी तरह अंत तो नहीं हुआ है, लेकिन राज्य सरकारों के स्तर पर उसकी पकड़ ऐतिहासिक रूप से कमजोर हो गई है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के बाद अगर केरलम में भी वाम मोर्चा सत्ता से बाहर हो गया है। देश में ऐसा पहली बार होगा जब किसी भी राज्य में वाम सरकार नहीं बचेगी। यह स्थिति विचारधारा के खत्म होने का तो नहीं, लेकिन जनता द्वारा नकारे जाने की ओर स्पष्ट इशारा अवश्य कर रही है।
-एसपी सिंह-
देश की राजनीति में वामपंथ की स्थिति को लेकर आज जो सबसे तीखा सवाल उठ रहा है, वह यह है कि राज्य सरकारों के स्तर पर इस विचारधारा का अंत हो चुका है। पहले बंगाल और फिर त्रिपुरा के बाद अब केरलम में भी लेफ्ट फ्रंट सत्ता गंवा चुका है। केरलम में उसे कांग्रेस गठबंधन ने सत्ता से बेदखल कर दिया है। इस प्रकार लेफ्ट फ्रंट का आखिरी किला भी ढह गया है। आज़ादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब देश के किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार मौजूद नहीं होगी। यही तथ्य इस पूरे विमर्श को बेहद गंभीर बना रहा है।
एक दौर था जब पश्चिम बंगाल में लेफ्ट फ्रंट ने ने 34 वर्षों तक लगातार शासन किया और वामपंथ को एक स्थायी राजनीतिक मॉडल के रूप में स्थापित किया। उसी तरह त्रिपुरा में भी वाम दलों ने लंबे समय तक सत्ता संभाली और अपने संगठनात्मक ढांचे को जमीनी स्तर तक फैलाया। समय के साथ इन दोनों राज्यों में वाम मोर्चे की सत्ता का पतन हुआ। बंगाल में 2011 और त्रिपुरा में 2018 के बाद वामपंथ सत्ता से बाहर हो गया। इसके बाद केरलम इकलौता ऐसा राज्य बचा था जहां उसकी सरकार बनी हुई थी। इस बार के चुनाव में यह किला भी ढह गया है। केरलम से भी वामपंथ का राज्य की सत्ता से पूर्णतः बाहर होना इस विचारधारा के लिए बहुत बड़ा झटका है।
देश के किसी भी राज्य में अब लेफ्ट फ्रंट की सरकार नहीं बची है। हालांकि इसे वामपंथ की विचारधारा का अंत नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह उसकी सत्ता पर पकड़ का कमजोर होना है। सीपीएम और सीपीआई जैसे दल आज भी सक्रिय हैं। उनका कैडर आज भी कई राज्यों में जमीनी स्तर पर मौजूद है, और वे संसद से लेकर सड़कों तक अपनी भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन राज्य सरकारों के स्तर पर उनकी अनुपस्थिति यह संकेत जरूर देती है कि वे अब जनादेश को सत्ता में बदलने की क्षमता खोते जा रहे हैं।
वाम विचारधारा की गिरावट के पीछे कई परतें हैं। लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद जो एंटी-इनकंबेंसी पैदा होती है, वह 2011 में बंगाल और 2018 में त्रिपुरा दोनों में साफ दिखी। इसके अलावा, बदलते सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों, जैसे पहचान की राजनीति, कल्याणकारी योजनाओं की प्रतिस्पर्धा और आक्रामक चुनावी रणनीतियों के सामने वाम दल अपनी पारंपरिक वर्ग-आधारित राजनीति को उतनी प्रभावी ढंग से ढाल नहीं पाए। नई पीढ़ी के मतदाताओं के बीच भी उनकी अपील पहले जैसी नहीं रही, क्योंकि रोजगार, उद्यमिता और तकनीक जैसे मुद्दों पर उनका नैरेटिव सीमित नजर आता है।
राज्य सरकारों से वामपंथ का बाहर होना केवल चुनावी हार भर नहीं है, बल्कि इसका असर नीति निर्माण पर भी पड़ेगा। वाम सरकारें खास तौर पर श्रमिक अधिकारों के क्षेत्र में एक अलग मॉडल पेश करती रही हैं। उनकी अनुपस्थिति में राज्यों की नीतियों में एक वैचारिक ध्रुव कम हो जाएगा, जिससे राजनीतिक बहस का संतुलन भी प्रभावित हो सकता है। साथ ही, विपक्ष की राजनीति में भी एक खालीपन पैदा होगा, जिसे अन्य दल भरने की कोशिश करेंगे।
फिर भी, इस पूरे परिदृश्य को अंतिम निष्कर्ष के रूप में देखना जल्दबाज़ी होगी। भारतीय राजनीति में उतार-चढ़ाव हमेशा से रहे हैं, और कई बार जो ताकतें हाशिए पर चली जाती हैं, वे नए स्वरूप में वापसी भी करती हैं। वामपंथ के सामने भी चुनौती अब स्पष्ट है- उसे अपनी रणनीति, नेतृत्व और मुद्दों को नए दौर के अनुरूप ढालना होगा, तभी वह राज्य सत्ता में दोबारा जगह बना पाने के बारे में सोच पाएंगी।
कुल मिलाकर केरलम में भी वामपंथ का सत्ता से बाहर होना निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक क्षण है। एक ऐसा क्षण जब राज्य सरकारों के नक्शे से लाल झंडा पूरी तरह गायब दिखेगा। इसे एक ऐसे दौर की शुरुआत के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा, जहां यह देखना यह दिलचस्प होगा कि वामपंथी अपने अस्तित्व और प्रासंगिकता को फिर से परिभाषित कर पाते हैं या नहीं।