देश भर में प्रदूषण की मार के लिए उद्योगों को कठघरे में खड़ा करना कितना न्यायसंगत?
देश के महानगर लगातार बढ़ते प्रदूषण से जूझ रहे हैं, लेकिन इसके लिए केवल उद्योगों और वाहनों को जिम्मेदार ठहराना समस्या का अधूरा विश्लेषण है। प्रदूषण की जड़ तेजी से बढ़ती जनसंख्या है, क्योंकि आबादी बढ़ने के साथ उत्पादन, परिवहन, ऊर्जा खपत और संसाधनों की मांग भी बढ़ती जाती है। साथ ही एसी, फ्रिज, बिजली उत्पादन और आधुनिक जीवनशैली भी प्रदूषण बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं। केवल उद्योगों पर प्रतिबंध लगाने से समाधान संभव नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिए जनसंख्या नियंत्रण, स्वच्छ ऊर्जा और संतुलित नीतियों पर गंभीरता से काम करना आवश्यक है।
देश के प्रमुख महानगर वर्षों से प्रदूषण की मार झेल रहे हैं, लेकिन विडंबना यह है कि प्रदूषण के लिए सबसे अधिक उद्योगों को ही कठघरे में खड़ा किया जा रहा है, जबकि वास्तविक कारणों की ओर देखने से लगातार बचा जा रहा है। दिल्ली, लखनऊ, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु, अहमदाबाद, जयपुर और आगरा जैसे शहर प्रदूषण से कराह रहे हैं। इस समस्या को लेकर देश का सर्वोच्च न्यायालय गंभीर है। अनेक जनहित याचिकाओं पर सुनवाई हो चुकी है और कई मामले अभी विचाराधीन हैं। पर्यावरणविद भी लगातार बढ़ते प्रदूषण को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए नई नीतियों और सख्त नियमों की मांग करते रहे हैं।
यदि आगरा की बात करें तो यहां प्रदूषण नियंत्रण को लेकर केंद्रीय एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड लगातार सक्रिय हैं। ताजमहल को प्रदूषण से बचाने के लिए 1990 के दशक में ताज ट्रेपेजियम जोन (TTZ) का गठन किया गया। आगरा में नए उद्योगों पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं और कई क्षेत्रों को ऑरेंज तथा रेड जोन घोषित किया जा चुका है। पुराने उद्योगों पर भी प्रदूषण नियंत्रण के लिए लगातार दबाव बनाया जाता है।
यह सच है कि दोपहिया, चारपहिया और वाणिज्यिक वाहनों की बढ़ती संख्या प्रदूषण का बड़ा कारण है। लेकिन यह भी समझना होगा कि वाहनों की संख्या आखिर क्यों बढ़ रही है। इसका मूल कारण है लगातार बढ़ती जनसंख्या। आबादी बढ़ने के साथ मांग बढ़ती है, मांग बढ़ती है तो उत्पादन बढ़ता है, उत्पादन बढ़ता है तो उद्योग बढ़ते हैं और फिर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सड़कों पर वाणिज्यिक वाहनों की संख्या भी बढ़ती जाती है।
जब उद्योग बढ़ेंगे तो रोजगार बढ़ेगा। रोजगार बढ़ेगा तो लोगों की आवाजाही बढ़ेगी और वाहनों की संख्या भी बढ़ेगी। ऐसे में केवल उद्योगों और वाहनों को प्रदूषण के लिए दोषी ठहराना क्या उचित है?
कोरोना लॉकडाउन इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा। मार्च से मई 2020 के बीच जब सड़कों पर वाहन लगभग बंद थे और उद्योग भी ठप पड़े थे, तब वातावरण में प्रदूषण का स्तर बेहद कम हो गया था। उस दौरान अप्रैल-मई की गर्मी तक का प्रभाव सामान्य वर्षों की तुलना में कम महसूस हुआ। लोग एसी चलाना तक भूल गए थे। इससे साफ है कि प्रदूषण कई स्तरों पर काम करता है।
लेकिन क्या केवल उद्योग और वाहन ही इसके लिए जिम्मेदार हैं? घरों में इस्तेमाल होने वाले एसी, फ्रिज, गैस चूल्हे और कोल्ड स्टोरेज में उपयोग होने वाली गैसें- जैसे आर-32 और आर-410ए हाइड्रोफ्लोरो कार्बन भी पर्यावरण और ओजोन परत को नुकसान पहुंचा रही हैं। इसके अतिरिक्त बिजली की खपत और बिजली आपूर्ति तंत्र से निकलने वाली ऊष्मा भी पर्यावरण को प्रभावित करती है।
फिर भी सबसे बड़ा प्रश्न वहीं खड़ा होता है- बढ़ती जनसंख्या। दुखद यह है कि पर्यावरणविदों और न्यायिक मंचों पर जनसंख्या नियंत्रण को लेकर शायद ही कभी गंभीर बहस दिखाई देती है। 140 करोड़ की आबादी वाले देश में हर दिन करोड़ों लोगों की जरूरतें पूरी करने के लिए उत्पादन, परिवहन और ऊर्जा खपत बढ़ना स्वाभाविक है।
गांवों से लेकर महानगरों तक रोजमर्रा की वस्तुओं की मांग बनी रहती है। उन वस्तुओं की आपूर्ति के लिए हजारों-लाखों वाहन हर दिन सड़कों पर दौड़ते हैं। यदि उद्योगों पर अत्यधिक प्रतिबंध लगाए जाएंगे तो आपूर्ति प्रभावित होगी, महंगाई बढ़ेगी और रोजगार संकट गहराएगा।
यह भी स्वीकार करना होगा कि यदि सरकार इलेक्ट्रिक और सोलर ऊर्जा आधारित वाहनों को बढ़ावा नहीं दे रही होती, तो आज प्रदूषण की स्थिति कहीं अधिक भयावह हो सकती थी।
आज हर मंच से यही कहा जाता है कि उद्योग और वाहन प्रदूषण के सबसे बड़े कारण हैं। लेकिन क्या किसी ने अपने निजी वाहन का उपयोग बंद किया? क्या आधुनिक जीवनशैली छोड़ने को कोई तैयार है?
स्पष्ट है कि केवल उद्योगों पर ठीकरा फोड़ने से प्रदूषण की समस्या हल नहीं होगी। वास्तविक समाधान तभी संभव है जब देश जनसंख्या नियंत्रण पर गंभीरता से काम करे। यदि अगले दस वर्षों में जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया जा सके, तभी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में स्थायी परिणाम दिखाई देंगे।
अब समय आ गया है कि पर्यावरणविद, नीति निर्माता और न्यायिक मंच इस मूल प्रश्न पर भी गंभीरता से विचार करें कि आखिर बढ़ती आबादी का पर्यावरण पर कितना व्यापक प्रभाव पड़ रहा है।

-पराग सिंहल