सऊदी अरब यूएई में बढीं तनातनी, दो सुन्नी देशों में वर्चस्व की जंग, शिया ईरान की बल्ले-बल्ले
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच का तनाव बीते साल के आखिर में दुनिया के सामने आया था। यमन में प्रभाव के मुद्दे पर तनाव बढ़ा और अब कई मामलों में दोनों देशों में फिर से तनातनी बढ गई है।
रियाद। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच तनाव की इस समय पूरी दुनिया की नजर है। दोनों देशों में बीते साल यमन में तनातनी शुरू हुई थी, जो ईरान युद्ध शुरू होने के बाद बढ़ गई। इसका चरम हाल ही में देखने को मिला, जब यूएई ने ओपेक से बाहर होने का ऐलान कर दिया। ऐसे में सवाल उठा है कि आखिर दो ताकतवर सुन्नी देशों के प्रमुख, यूएई प्रेसिडेंट शेख मोहम्मद बिन जायद अल-नाहयान और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान आमने-सामने क्यों हैं। इसका पूरे क्षेत्र पर असर हो रहा है और अमेरिका से युद्ध में उलझे ईरान को भी इसका फायदा मिल सकता है। शिया देश ईरान को निश्चित ही अपने दो विरोधियों में टकराव का फायदा मिलेगा।
मिडिल ईस्ट आई ने अपनी रिपोर्ट में यूएई और सऊदी के शाही परिवारों की विचारधारा और विवाद की कहानी बताई है। रिपोर्ट बताती है कि सऊदी अरब ने यूएई के अल-नाहयान परिवार के राजकुमार को 50 के दशक में रिश्वत देने की कोशिश की, ताकि वह एक रेगिस्तानी नखलिस्तान का नियंत्रण छोड़ दे, जहां माना जाता था कि तेल का भंडार है। उसने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और सऊदी अरब ने इस इलाके पर कब्जे के लिए हमला किया।
दिवंगत पत्रकार डेविड होल्डन ने अपनी 1966 की किताब 'फेयरवेल टू अरेबिया' में 1950 के दशक के 'बुराइमी विवाद' का जिक्र किया, जो सऊदी शाही परिवार, ओमान और ट्रूशियल स्टेट्स (जो बाद में यूएई बना) के बीच हुआ था। जिसे सऊदी अरब ने रिश्वत देने की कोशिश की थी, वह जायद बिन सुल्तान अल-नाहयान थे। उनके बेटे मोहम्मद बिन जायद अब सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ तकरार में उलझे हुए हैं।
अमेरिका के पूर्व राजनयिक और राजदूत पैट्रिक थेरोस ने मिडिल ईस्ट आई से कहा कि अगर विचारधारा, परिवार और इतिहास को एक साथ देखें तो सऊदी अरब और यूएई के बीच की इस तकरार को समझा जा सकता है। सऊदी अरब और यूएई आज कई मोर्चों पर एक-दूसरे के आमने-सामने हैं।
राजनयिकों और विश्लेषकों का कहना है कि यूएई-सऊदी के बीच की तकरार काफी हद तक पश्चिम एशिया के भविष्य को तय करेगी। खासकर ऐसे समय में, जब ईरान युद्ध की वजह से इस इलाके में अमेरिका की पकड़ कमजोर पड़ती दिख रही है। इसका असर एशिया, यूरोप और अमेरिका के आम लोगों की जेब पर भी पड़ेगा।
यूएई ने सऊदी अरब के नेतृत्व वाले तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC छोड़ दिया है। इस फैसले के बाद वह हर दिन लाखों बैरल ज्यादा तेल का उत्पादन करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भविष्य में सऊदी अरब के साथ 'कीमतों की जंग' छिड़ने की ज़मीन तैयार हो सकती है। इससे दोनों देशों के बीच दरार और बढ़ेगी।
किंग्स कॉलेज लंदन में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के विशेषज्ञ रॉब गाइस्ट पिनफोल्ड का कहना है कि सऊदी अरब ओपेक और गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल के जरिए अपनी ताकत दिखाना चाहता है। वह खुद को गल्फ का स्वाभाविक नेता मानता है। यूएई छोटा है लेकिन उसे लगता है कि सऊदी अरब के आगे झुकने से वह विश्व मंच पर अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं कर पाएगा।