मदर्स डे पर उजागर हुआ मुस्कुराहट के पीछे छिपा दर्द: सीएससीडी के सर्वे में महिलाओं की मानसिक पीड़ा की चिंताजनक तस्वीर आई सामने, समाज ही नहीं, परिवार भी बेपरवाह
आगरा। मातृ दिवस के अवसर पर सेंटर फॉर सेल्फ एंड करियर डेवलपमेंट (सीएससीडी) द्वारा महिलाओं की मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक समस्याओं को लेकर किया गया सर्वे समाज के सामने एक बेहद संवेदनशील और चिंताजनक तस्वीर लेकर आया है। इस सर्वे में शहर की विभिन्न आयु वर्ग की दस महिलाओं से बातचीत के बाद यह सच्चाई सामने आई कि समाज हो या परिवार, महिलाएं आज भी भावनात्मक उपेक्षा, मानसिक दबाव और असुरक्षा के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं।
सीएससीडी के डायरेक्टर डॉ. नवीन गुप्ता ने बताया कि यह अध्ययन महिलाओं की मानसिक स्थिति, सामाजिक अपेक्षाओं और भावनात्मक संघर्षों को समझने के उद्देश्य से किया गया। इस सर्वे में सीएससीडी की इंटर्न मेहविश ने सहयोग किया। डॉ. नवीन गुप्ता ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य समग्र कल्याण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन महिलाओं की मानसिक समस्याएं अक्सर अनसुनी और अनदेखी रह जाती हैं।
उन्होंने बताया कि किशोरावस्था से लेकर वयस्कता तक महिलाएं सामाजिक, भावनात्मक, हार्मोनल और व्यक्तिगत चुनौतियों से गुजरती हैं, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालती हैं। महिलाओं से एक साथ बेटी, बहन, पत्नी, बहू, मां और पेशेवर जैसी अनेक भूमिकाएं निभाने की अपेक्षा की जाती है। लगातार रिश्तों, सामाजिक दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियों और करियर के बीच संतुलन बनाने का दबाव उन्हें मानसिक रूप से थका देता है।
किशोरावस्था में मानसिक संघर्ष
सर्वे में सामने आया कि किशोरावस्था में प्रवेश करते ही लड़कियों के शरीर, भावनाओं और सोच में बड़े बदलाव आते हैं। इस दौरान कई किशोरियां अपने शरीर को लेकर असुरक्षित महसूस करती हैं। सोशल मीडिया के प्रभाव से खुद को दूसरों से कम आंकने लगती हैं। पढ़ाई और करियर का दबाव, परिवार की रोक-टोक, समाज का डर, अकेलापन, घबराहट और अत्यधिक सोचने जैसी समस्याएं उन्हें मानसिक रूप से प्रभावित करती हैं।
सर्वे में किशोरियों ने यह भी कहा कि समाज उन्हें समझने के बजाय जज (परखता) करता है। यदि वे रोती हैं तो उन्हें अत्यधिक भावुक कहा जाता है और यदि अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाती हैं तो उन्हें एटीट्यूड वाली कहकर आंका जाता है। उनके पहनावे, दोस्ती और जीवनशैली तक पर टिप्पणी की जाती है। यदि वे अपने करियर और आत्मनिर्भरता पर ध्यान देती हैं तो समाज उन्हें स्वार्थी या लापरवाह तक कह देता है।
कामकाजी महिलाओं पर दोहरी जिम्मेदारियों का दबाव
डॉ. नवीन गुप्ता बताते हैं, आज की कामकाजी महिलाओं को घर और ऑफिस दोनों की जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं। कॉर्पोरेट जीवन में उन्हें काम के दबाव, समय सीमा, बार-बार खुद को साबित करने की मजबूरी, लिंग भेद, नौकरी की असुरक्षा, शादी और करियर के बीच संतुलन, कार्यस्थल पर उत्पीड़न और विषाक्त वातावरण जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।
सर्वे में यह भी सामने आया कि कई महिलाओं को कार्यस्थल पर बदमाशी, रूढ़िवादिता और उत्पीड़न झेलना पड़ता है। महिलाओं द्वारा किए गए छोटे प्रयासों की भी अक्सर सराहना नहीं होती। बाहर से मजबूत दिखने वाली कई महिलाएं भीतर से तनाव, चिंता, अवसाद और भावनात्मक थकावट से जूझ रही हैं। कई बार वे इतनी थक जाती हैं कि खुद के लिए समय तक नहीं बचता।
गृहिणियों का अनदेखा मानसिक संघर्ष
सर्वे में गृहिणियों की स्थिति को भी बेहद संवेदनशील बताया गया। रिपोर्ट के अनुसार लोग अक्सर मान लेते हैं कि गृहिणियां केवल घर संभालती हैं, जबकि उनकी जिम्मेदारियां कभी समाप्त नहीं होतीं। एक गृहिणी पूरे परिवार की जरूरतों का ध्यान रखते हुए अपनी इच्छाओं को पीछे छोड़ देती है।
आर्थिक रूप से निर्भर होने के कारण कई बार वह खुद को कमजोर महसूस करती है। लगातार काम करने के बावजूद उसे “तुम करती ही क्या हो” जैसे शब्द सुनने पड़ते हैं। भावनात्मक समर्थन और सराहना की कमी धीरे-धीरे उनके आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। कई गृहिणियां अपने दर्द, थकान और भावनात्मक संघर्ष को चुपचाप सहती रहती हैं।
पीसीओडी-पीसीओएस से बढ़ रही मानसिक परेशानियां
सर्वे में यह भी सामने आया कि आज की युवा लड़कियां पीसीओडी और पीसीओएस जैसी समस्याओं से तेजी से प्रभावित हो रही हैं। इन बीमारियों के कारण हार्मोनल असंतुलन, मूड स्विंग, तनाव, चिंता, बॉडी शेमिंग और आत्मविश्वास में कमी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। कई लड़कियां शादी और गर्भावस्था को लेकर डर और असुरक्षा महसूस करती हैं। गर्भधारण न कर पाने की चिंता उन्हें भावनात्मक रूप से तोड़ देती है।
डॉ. नवीन गुप्ता ने कहा कि इस सर्वे का सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि समाज को महिलाओं के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है। हर महिला सम्मान, भावनात्मक समर्थन, सराहना, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सुरक्षित वातावरण की हकदार है। मानसिक स्वास्थ्य को भी शारीरिक स्वास्थ्य जितना ही महत्व दिया जाना चाहिए।