बरेली में 25 साल बाद दिखी दुर्लभ हेडेड कैनरी-फ्लाइकैचर, वन विभाग में खुशी की लहर
-आरके सिंह-
बरेली। बरेली जिले में 25 वर्षों बाद एक बेहद दुर्लभ और आकर्षक पक्षी हेडेड कैनरी-फ्लाइकैचर दिखाई देने से वन विभाग और पक्षी प्रेमियों में उत्साह की लहर दौड़ गई। मुख्य वन संरक्षक आवास पर इस अनोखी पक्षी प्रजाति के दिखाई देने की सूचना मिलते ही पक्षी प्रेमियों और वन अधिकारियों का जमावड़ा लग गया। इस दुर्लभ पक्षी को देखकर मुख्य वन संरक्षक पीपी सिंह बेहद उत्साहित नजर आए और उन्होंने कुछ ही सेकेंड में उसकी तस्वीर अपने कैमरे में कैद कर ली।
मुख्य वन संरक्षक पीपी सिंह ने इस उल्लेखनीय उपलब्धि की जानकारी विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को दी। उन्होंने बताया कि बरेली में करीब 25 साल बाद हेडेड कैनरी-फ्लाइकैचर देखी गई है। उन्होंने पक्षी को उसकी विशिष्ट आवाज से पहचाना। इसकी आवाज पतली और मधुर “सी-सी-सी” जैसी होती है, जो जंगलों में लगातार सुनाई देती है और आसानी से पहचानी जा सकती है।
मुख्य वन संरक्षक आवास पर इस पक्षी के दिखाई देने की खबर मिलने पर बड़ी संख्या में पक्षी प्रेमी, पर्यावरणविद और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोग जानकारी लेने मौके पर पहुंचे। वन विभाग अब इसके संरक्षण और निगरानी को लेकर गंभीरता से कार्य कर रहा है।
बरेली के विधायक एवं राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) वन एवं पर्यावरण डॉ. अरुण कुमार सक्सेना ने भी इस दुर्लभ पक्षी के दिखाई देने पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि सरकार वन्यजीव और पक्षी संरक्षण को लेकर पूरी तरह गंभीर है और जैव विविधता को बचाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
पी.पी. सिंह ने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईसीयूएन) के अनुसार हेडेड कैनरी-फ्लाइकैचर वर्तमान में कम चिंता वाली श्रेणी में शामिल है, यानी फिलहाल इसके विलुप्त होने का बड़ा खतरा नहीं माना गया है। बावजूद इसके इसके प्राकृतिक आवास और पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रयास बेहद जरूरी हैं।
उन्होंने बताया कि यह पक्षी लगभग 10 से 11 सेंटीमीटर लंबा होता है। इसका सिर स्लेटी या धूसर रंग का दिखाई देता है, जबकि शरीर चमकीले पीले रंग का होता है। आंखों के चारों ओर हल्का सफेद घेरा और छोटी नुकीली चोंच इसकी खास पहचान है। यह बेहद चंचल और फुर्तीला पक्षी माना जाता है, जो पेड़ों की ऊपरी शाखाओं पर रहना पसंद करता है और उड़ते हुए छोटे कीड़ों को पकड़ने में माहिर होता है।
मुख्य वन संरक्षक ने बताया कि यह पक्षी मुख्य रूप से घने जंगलों, पहाड़ी वन क्षेत्रों, बांस के जंगलों और नदी किनारे के पेड़ों में पाया जाता है। भारत में यह उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पूर्वोत्तर भारत और दक्षिण भारत के वन क्षेत्रों में अधिक देखा जाता है। इसके अलावा श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया में भी इसका विचरण होता है।
इसका मुख्य भोजन छोटे उड़ने वाले कीट, मक्खियां, मच्छर, पतंगे और अन्य छोटे कीड़े होते हैं। यह हवा में उड़कर कीड़ों का शिकार करता है, इसलिए इसे फ्लाइकैचर कहा जाता है। प्रजनन के दौरान यह पेड़ों की शाखाओं पर काई और रेशों से घोंसला बनाता है। मादा सामान्यतः दो से तीन अंडे देती है और दोनों पक्षी मिलकर बच्चों की देखभाल करते हैं।
वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि बरेली में इस दुर्लभ पक्षी का दिखाई देना पर्यावरण और जैव विविधता के लिहाज से सकारात्मक संकेत है।