आगरा पुलिस ने किया इंसानियत का कत्ल, सीमा विवाद के चक्कर में नाले में पड़ा रहा शव, सेवा-सुरक्षा और संवेदना का स्लोगन क्या सिर्फ दिखावा?
फ्रीगंज के नीम दरवाजा क्षेत्र में नवजात बच्ची के शव को कुत्तों द्वारा नोचे जाने की रूह कंपा देने वाली घटना के बाद भी सिस्टम की संवेदनहीनता जस की तस है। दो घंटे तक चले इंसानियत के इस कत्ल पर अब तक कोई जवाबदेही तय नहीं हुईऔर यही इस मामले को और ज्यादा शर्मनाक बना देता है।
-गौरव प्रताप सिंह-
आगरा। रविवार को सामने आई वह भयावह तस्वीर अभी लोगों के ज़हन से उतरी भी नहीं थी कि अब इस पूरे मामले में पुलिस की खामोशी ने एक और सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आगरा पुलिस के लिए एक नवजात की लाश भी महज ‘केस’ भर है?
फ्रीगंज के नीम दरवाजा, रेलवे पुल के पास सूखे नाले में मिली नवजात बच्ची की लाश को लेकर जो लापरवाही सामने आई, वह किसी एक दिन की चूक नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की सोच को उजागर करती है। दो घंटे तक कोतवाली और छत्ता थाने की पुलिस सीमा विवाद में उलझी रही। शव नाले में ही पड़ा रहा। यह दृश्य अब भी इलाके के लोगों को झकझोर रहा है।
सीमा विवाद ने ली संवेदना की बलि
घटना के दिन छत्ता और कोतवाली थाना पुलिस मौके पर मौजूद थी, लेकिन दोनों ही थाने जिम्मेदारी लेने से बचते रहे। मुद्दा यह नहीं था कि एक नवजात की मौत हुई है। मुद्दा यह था कि शव किस थाने के खाते में जाएगा। यह वही मानसिकता है जिसने इंसानियत को दो घंटे तक नाले में पड़ा रहने दिया।
घटना के बाद भी वही ढर्रा
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी अमानवीय घटना के बाद भी आखिर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? अभी तक किसी पुलिसकर्मी जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की गई। डीसीपी सिटी सैयद अली अब्बास कहते हैं कि दो थानों के बीच सीमा विवाद की बात गलत है जबकि कोतवाली के प्रभारी स्वीकार चुके हैं कि घटनास्थल की सही जानकारी न होने के कारण थाना छत्ता को सूचना दी गई थी। साफ है कि दो थानों के बीच घटनास्थल को लेकर विवाद था।
क्या यह माना जाए कि दो घंटे तक शव को नाले में पड़े रहने देना कोई गलती नहीं थी? या फिर यह लापरवाही सिस्टम के लिए सामान्य हो चुकी है?
जनता के ज़ख्म ताज़ा, गुस्सा बरकरार
स्थानीय लोगों का गुस्सा अब भी ठंडा नहीं पड़ा है। लोगों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो आम आदमी की जान और सम्मान की कोई कीमत नहीं बचेगी। अगर पुलिस ऐसे ही सीमा विवादों में उलझती रही, तो कल किसी के साथ भी ऐसा हो सकता है, एक स्थानीय निवासी ने तीखे शब्दों में कहा।
स्लोगन फिर सवालों के घेरे में
सेवा, सुरक्षा और संवेदना- यह नारा एक बार फिर कटघरे में है। घटना के बाद उम्मीद थी कि पुलिस अपनी गलती स्वीकार कर सख्त कदम उठाएगी, लेकिन हुआ उल्टा चुप्पी साध ली गई।
जवाबदेही कब तय होगी?
अब सवाल सिर्फ उस दिन की लापरवाही का नहीं है, बल्कि उस चुप्पी का है जो उसके बाद छाई हुई है। क्या जिम्मेदारों को बचाया जा रहा है? क्या इस मामले को भी वक्त के साथ दबा दिया जाएगा? जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाएं सिर्फ खबर बनती रहेंगी और इंसानियत हर बार हारती रहेगी।