असम में तीसरी बार बीजेपी का परचम: हेमंत बिस्वा सरमा की रणनीति, हिंदुत्व का असर और कांग्रेस के गढ़ का लगातार पतन
असम में भाजपा की लगातार तीसरी जीत ने यह साबित कर दिया है कि मजबूत नेतृत्व, स्पष्ट हिंदुत्व एजेंडा और संगठनात्मक पकड़ चुनावी सफलता की कुंजी बन चुके हैं। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व, संगठन के साथ ही हेमंत बिस्वा सरमा इस जीत के केंद्रीय चेहरा बनकर उभरे हैं, जबकि कांग्रेस की लगातार तीसरी हार यह संकेत देती है कि राज्य में उसकी स्थिति तेजी से कमजोर होती जा रही है।
-एसपी सिंह-
असम की राजनीति ने एक बार फिर साफ संकेत दे दिया है कि सत्ता अब केवल संगठन या परंपरा के भरोसे नहीं, बल्कि नैरेटिव, नेतृत्व और जमीन से जुड़ी रणनीति के दम पर तय होती है। असम विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की लगातार तीसरी जीत और 101 सीटों का आंकड़ा सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व की मजबूत स्थापना है। इस जीत के केंद्र में सबसे बड़ा चेहरा हेमंत बिस्वा सरमा का रहा, जिन्होंने चुनाव को पूरी तरह अपने नेतृत्व और मुद्दों के इर्द-गिर्द खड़ा कर दिया।
इस चुनाव की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि भाजपा ने बिना किसी झिझक के हिंदुत्व और पहचान की राजनीति को अपना मुख्य एजेंडा बनाया। अवैध घुसपैठ, जनसंख्या संतुलन, सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों को जिस तरह से उभारा गया, उसने मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को सीधे प्रभावित किया। भाजपा ने इसे सिर्फ वैचारिक मुद्दा नहीं रहने दिया, बल्कि इसे सुरक्षा, संस्कृति और भविष्य से जोड़कर पेश किया। यही रणनीति उसे निर्णायक बढ़त दिलाने में कामयाब रही।
वहीं, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए यह चुनाव लगातार तीसरी हार का कड़वा सच लेकर आया। कांग्रेस को पिछले चुनाव के बराबर सीटें भी नहीं मिल सकीं। वह 21 सीटों पर सिमट गई। कभी असम कांग्रेस का अभेद्य गढ़ माना जाता था, लेकिन अब हालात ऐसे हो गए हैं कि उसकी स्थिति धीरे-धीरे उत्तर प्रदेश और बिहार जैसी होती नजर आ रही है, जहां वह लंबे समय से सत्ता से दूर और संगठनात्मक रूप से कमजोर है। असम में कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी उसका स्पष्ट नेतृत्व का अभाव और बिखरी रणनीति रही। जहां भाजपा एक चेहरा और एक स्पष्ट एजेंडा लेकर मैदान में उतरी, वहीं कांग्रेस कई मुद्दों और कई चेहरों के बीच उलझी रही।
कांग्रेस ने मतदान से ठीक तीन-चार दिन पहले जिस तरह मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा की पत्नी को लेकर तीन विदेशी पासपोर्ट और विदेश में हजारों करोड़ की कंपनी होने जैसे गंभीर आरोप लगाए, वह दांव उल्टा पड़ गया। मतदान से पहले ही यह स्पष्ट हो गया कि ये दावे तथ्यों पर खरे नहीं उतरते और पूरी तरह निराधार थे। परिणामस्वरूप, इस मुद्दे को प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए उछालने वाले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रवक्ता अब कथित धोखाधड़ी और साजिश के मुकदमे में घिर गए हैं, जिससे पार्टी की साख को भी झटका लगा है।
हेमंत बिस्वा सरमा की राजनीतिक शैली इस जीत की रीढ़ साबित हुई। उन्होंने खुद को सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि एक आक्रामक और निर्णायक नेता के रूप में स्थापित किया। चाहे वह प्रशासनिक फैसले हों, कानून-व्यवस्था पर सख्ती हो या चुनावी भाषण, हर स्तर पर उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि राज्य में मजबूत नेतृत्व मौजूद है। यही वजह रही कि चुनाव धीरे-धीरे भाजपा बनाम बाकी से बदलकर सरमा बनाम विपक्ष बन गया, जिसमें विपक्ष कमजोर पड़ता चला गया।
इसके अलावा, भाजपा की संगठनात्मक ताकत और बूथ स्तर तक की पकड़ ने भी अहम भूमिका निभाई। पार्टी ने चुनाव को सिर्फ रैलियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि माइक्रो मैनेजमेंट के जरिए हर क्षेत्र और हर वर्ग तक अपनी पहुंच बनाई। इसके मुकाबले कांग्रेस का कैडर उतना सक्रिय और प्रभावी नहीं दिखा, जिसका सीधा असर नतीजों में नजर आया।
इस जीत का एक बड़ा राजनीतिक संदेश यह भी है कि पूर्वोत्तर भारत में भाजपा अब अस्थायी शक्ति नहीं, बल्कि स्थायी राजनीतिक ताकत बन चुकी है। असम जैसे बड़े राज्य में लगातार तीसरी जीत यह साबित करती है कि पार्टी ने यहां सिर्फ चुनाव नहीं जीता, बल्कि मतदाताओं का भरोसा भी मजबूत किया है।
हालांकि, यह भी सच है कि किसी भी दल के लिए लगातार जीत के बाद सबसे बड़ी चुनौती उसे बनाए रखने की होती है। भाजपा के सामने अब विकास, रोजगार और क्षेत्रीय असंतुलन जैसे मुद्दों पर बेहतर प्रदर्शन करने की जिम्मेदारी और बढ़ जाएगी। वहीं कांग्रेस के लिए यह समय आत्ममंथन का है। उसे यह तय करना होगा कि वह पुराने ढर्रे पर चलेगी या खुद को नए सिरे से खड़ा करेगी।
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