मोबाइल की गिरफ्त में बचपन: अफीम-शराब से भी ज्यादा घातक है यह नशा, स्क्रीन की चमक में धुंधला रहा स्वास्थ्य, संस्कार और भविष्य- नागरी प्रचारिणी सभा की गोष्ठी में उठी गंभीर चेतावनी

आगरा। तेजी से बदलती डिजिटल दुनिया में मोबाइल फोन बच्चों के जीवन का अनिवार्य हिस्सा बनता जा रहा है, लेकिन इसके बढ़ते उपयोग ने उनके मानसिक स्वास्थ्य, आंखों की रोशनी, नींद, एकाग्रता और सामाजिक व्यवहार पर गंभीर प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। यही कारण है कि विशेषज्ञ अब मोबाइल को बचपन के लिए सबसे बड़ा खतरा मान रहे हैं। इसी गंभीर विषय ‘मोबाइल और बचपन का भविष्य’ पर शहर की प्रतिष्ठित संस्था नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा एक विचार गोष्ठी आयोजित की गई, जिसमें शिक्षाविदों, चिकित्सकों और बुद्धिजीवियों ने मोबाइल की लत को बच्चों के भविष्य के लिए बड़ी चुनौती बताया।

Mar 15, 2026 - 21:07
Mar 15, 2026 - 21:08
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मोबाइल की गिरफ्त में बचपन: अफीम-शराब से भी ज्यादा घातक है यह नशा, स्क्रीन की चमक में धुंधला रहा स्वास्थ्य, संस्कार और भविष्य- नागरी प्रचारिणी सभा की गोष्ठी में उठी गंभीर चेतावनी
नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा सोमवार को सभा भवन में ‘मोबाइल और बचपन का भविष्य’ विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में मौजूद अतिथि और वक्तागण।

मोबाइल अफीम, भांग और शराब के नशे से भी अधिक घातक: महेश चंद्र शर्मा

गोष्ठी के मुख्य वक्ता एवं मुख्य अतिथि महेश चंद्र शर्मा (चेयरमैन आगरा पब्लिक स्कूल) ने कहा कि आज के समय में मोबाइल ऐसा नशा बन चुका है जो अफीम, भांग और शराब से भी ज्यादा घातक साबित हो रहा है। उन्होंने कहा कि मोबाइल का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है और इसके रेडिएशन का सीधा असर बच्चों की आंखों पर पड़ रहा है। लगातार स्क्रीन देखने से नजर कमजोर हो रही है और कम उम्र में ही बच्चों को चश्मा लगाना पड़ रहा है।

एल्गोरिद्म के जरिए बढ़ाया जा रहा है मोबाइल का नशा: डॉ. अनुपम शर्मा

गोष्ठी के विशिष्ट वक्ता और लोटस हॊस्पिटल के निदेशक एवं चेयरमैन डॉ. अनुपम शर्मा ने कहा कि मोबाइल केवल एक उपकरण नहीं बल्कि एक ऐसी प्रणाली है जो एल्गोरिद्म के जरिए लोगों को अपनी ओर खींचती है। यह पूरी तरह से एक बिजनेस मॉडल है, जिसमें लोगों को लगातार स्क्रीन से जोड़े रखने के लिए कंटेंट डिजाइन किया जाता है। इसे रोका नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि यह हमारी संस्कृति को भी प्रभावित कर रहा है और बच्चों में मोबाइल एडिक्शन तेजी से बढ़ रहा है।

परिवार में अनुशासन से ही रोकी जा सकती है लत

कार्यक्रम की विशिष्ट वक्ता सुमन सुराना ने बताया कि उनके घर में डाइनिंग टेबल पर जाने से पहले सभी सदस्यों को अपने मोबाइल एक टोकरी में जमा कराने पड़ते हैं। उन्होंने कहा कि यदि परिवार स्तर पर अनुशासन बनाया जाए तो बच्चों में मोबाइल की लत को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

स्क्रीन टाइम से प्रभावित हो रहा मानसिक स्वास्थ्य

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सभा के सभापति डॉ. खुशीराम शर्मा ने कहा कि मोबाइल और बचपन का भविष्य आज गहराई से एक-दूसरे से जुड़ गया है। अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों की याददाश्त, मानसिक स्वास्थ्य और नींद को प्रभावित कर रहा है। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते समाज और अभिभावकों ने इस विषय पर गंभीरता नहीं दिखाई तो आने वाली पीढ़ी पर इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।

सरस्वती वंदना से हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ

कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. ब्रज विहारी लाल वर्मा विरजू द्वारा सरस्वती वंदना से हुई। सभा के उपसभापति एवं कार्यक्रम संयोजक डॉ. विनोद माहेश्वरी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए गोष्ठी के उद्देश्य पर प्रकाश डाला।

अनेक विद्वानों ने रखे विचार

गोष्ठी में टोनी फास्टर, डॉ. रमा वर्मा, डॉ. विजय तिवारी, रामेंद्र शर्मा ‘रवि’, प्रो. अनुराग पालीवाल, डॉ. सुषमा सिंह, रमेश पंडित, डॉ. आभा चतुर्वेदी, श्रीमती प्रतिभा जिंदल, संजय गुप्त, शरद गुप्त, महेश धाकड़, मनीष वर्मा, राम प्रकाश पाल, गिरधारी लाल, डॉ. सुनील दुबे, डॉ. देवी सिंह नरवार, राजीव सक्सेना, शीलेंद्र कुमार, अनिल शर्मा, प्रभुदत्त उपाध्याय, अनिल जैन, शेषपाल, राहुल चतुर्वेदी, नंद नंदन गर्ग और उमा शंकर पाराशर सहित अनेक वक्ताओं ने भी अपने विचार व्यक्त किए और बच्चों को मोबाइल के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता पर बल दिया।

कार्यक्रम के अंत में सभा के मंत्री प्रो. चंद्रशेखर शर्मा ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।

SP_Singh AURGURU Editor