पशुपालन विभाग के 25 लाख के कथित घोटाले पर बनी कमेटी छह माह में भी पूरी नहीं कर पाई जांच, शिकायतकर्ता को भी नहीं मिला सुनवाई का मौका
आगरा। पशुपालन विभाग के भीतर कथित 25 लाख रुपये के घोटाले की जांच को लेकर गंभीर सवाल उठाये जा रहे हैं। डिप्लोमा वैटनेरियन एसोसिएशन यूपी के अध्यक्ष डॉ. सतीश चन्द शर्मा ने शासन-प्रशासन से दोबारा हस्तक्षेप की मांग की है। उनका आरोप है कि मण्डलायुक्त आगरा द्वारा एडीएम के नेतृत्व में जांच टीम गठित करने के स्पष्ट आदेश दिये जाने के बावजूद जांच प्रक्रिया प्रभावित की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता को आज तक अपना पक्ष रखने का अवसर तक नहीं दिया गया।
डॉ. शर्मा ने इस बारे में जांच समिति के अध्यक्ष एडीएम (न्यायिक) को लिखे एक पत्र में आरोप लगाया है कि 25 सितम्बर 2025 को शासन, प्रशासन, सांसदों, विधायकों और मीडिया के संज्ञान में लाये जाने के बाद इस मामले पर मण्डलायुक्त आगरा ने अपने कार्यालय पत्रांक 4143/P.A. दिनांक 04 अक्टूबर 2025 के माध्यम से जिलाधिकारी आगरा को एडीएम की अध्यक्षता में जांच टीम गठित करने तथा उसमें लेखा सेवा के क्लास-2 अधिकारी को शामिल करने के निर्देश दिये थे। इसके बाद जांच कमेटी बनी और जांच शुरू भी हुई, लेकिन लगभग छह माह बीत जाने के बाद भी शिकायतकर्ता को न तो बुलाया गया और न ही उसके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों एवं साक्ष्यों का परीक्षण किया गया।
जांच को अंधेरे में चलाया जा रहा
डॉ. शर्मा का आरोप है कि विभागीय अधिकारियों ने पूरे मामले को मैनेज करने का प्रयास किया। शिकायतकर्ता के अनुसार जिन अधिकारियों पर घोटाले के आरोप हैं, उन्हीं के प्रभाव में जांच को दबाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कहा कि यह मामला निराश्रित गौवंश के धन से जुड़ा है और शासन की जीरो टॉलरेंस नीति पर सीधा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
संघ ने आरोप लगाया कि आहरण-वितरण अधिकारी डॉ. जयन्त यादव, डॉ. डी.के. पाण्डे, सहायक लेखाकार, केन्द्रीय भण्डार सदर भट्टी के कन्सायनी/भण्डार नायक तथा कैशियर सहित कई कर्मचारी इस कथित गबन में शामिल हैं।
अपर निदेशक पर भी सवाल
शिकायत में अपर निदेशक (पशुपालन) आगरा मण्डल डॉ. देवेन्द्र पाल सिंह पर भी गंभीर आरोप लगाये गये हैं। संघ का कहना है कि जब उनके संज्ञान में 25 लाख रुपये के गबन का मामला आया तो उन्होंने अपनी आंतरिक जांच में डॉ. जयन्त यादव द्वारा अनियमितता किये जाने की बात स्वीकार की, लेकिन न तो शासन को अवगत कराया गया और न ही किसी प्रकार की वैधानिक कार्रवाई की गयी।
क्रय समिति बनी ही नहीं, फिर कैसे हुई खरीद?
शिकायत में सबसे बड़ा सवाल 25 लाख रुपये की कथित खरीद प्रक्रिया पर उठाया गया है। आरोप है कि शासनादेश के अनुसार क्रय समिति का गठन ही नहीं किया गया, जबकि नियमों के अनुसार जिलाधिकारी या सीडीओ द्वारा नामित क्लास-2 अधिकारी और लेखा सेवा अधिकारी की मौजूदगी अनिवार्य थी।
शिकायतकर्ता के अनुसार केन्द्रीय भण्डार सदर भट्टी में खरीदे गये सामान का न तो भौतिक सत्यापन कराया गया और न ही स्टॉक रजिस्टर पर जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा संवीक्षण अंकित किया गया। यही नहीं, 15 दिन के भीतर पशु चिकित्सालयों और केन्द्रों पर सामग्री वितरण का कोई प्रमाण भी उपलब्ध नहीं कराया गया।
दो दिन में खरीद, भुगतान और सप्लाई पर उठे सवाल
डॊ. शर्मा ने इसे भ्रष्टाचार का ज्वलंत प्रमाण बताते हुए सवाल उठाया कि क्या सरकारी खरीद, सप्लाई, भुगतान और वितरण जैसी पूरी प्रक्रिया मात्र दो दिन में पूरी होना संभव है? शिकायत में कहा गया कि सितंबर 2024 में डॉ. जयन्त यादव द्वारा खंडित डीएससी के माध्यम से 25 लाख की खरीद दिखाई गयी, जिसे बाद में डॉ. डी.के. पाण्डे ने भी स्वीकार किया।
आरोप है कि बिल संख्या 0822950201 से 0822950225 तक की खरीद कोषागार रिकन्सीलेशन सीट और कैश बुक में सत्यापित करते हुए हस्ताक्षरित की गयी, जिससे संबंधित अधिकारियों की संलिप्तता प्रमाणित होती है। शिकायतकर्ता ने सवाल उठाया कि यदि अधिकारी दोषी नहीं थे तो उन्होंने शासन को सूचना क्यों नहीं दी और प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं करायी?
आईजीआरएस शिकायतों में भी लीपापोती के आरोप
संघ ने जिलाधिकारी की 4 मई 2026 की समीक्षा बैठक का उल्लेख करते हुए कहा कि सीवीओ डॉ. डी.के. पाण्डे को चार में से तीन मामलों में असंतुष्ट फीडबैक मिला, लेकिन शिकायतों का बिंदुवार निस्तारण नहीं किया गया। आरोप है कि बिना मौके पर जांच किये और बिना शिकायतकर्ता से संपर्क किये फर्जी रिपोर्ट सिस्टम में अपलोड कर दी गयी।
डॉ. सतीश चन्द शर्मा ने मांग की है कि जांच प्रक्रिया को पूर्ण पारदर्शिता के साथ कराया जाये, शिकायतकर्ता को साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाये और पूरे प्रकरण की बिंदुवार निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाये।