थिरकती साधना बनाम चमकता मंच: फ्यूज़न के दौर में भारतीय नृत्य की आत्मा, बाज़ार और भविष्य का कठिन सवाल

भारतीय शास्त्रीय नृत्य आज परंपरा और प्रयोग के दोराहे पर खड़ा है। सोशल मीडिया और बाज़ार ने इसे लोकप्रिय तो बनाया है, लेकिन साधना, अनुशासन और गहराई पर सवाल भी खड़े किए हैं। फ्यूज़न तभी उड़ान है जब जड़ों से जुड़ा हो, वरना वह सतही प्रदूषण बन जाता है। असली चुनौती चमक और गहराई के बीच संतुलन साधने की है।

Feb 21, 2026 - 12:28
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थिरकती साधना बनाम चमकता मंच: फ्यूज़न के दौर में भारतीय नृत्य की आत्मा, बाज़ार और भविष्य का कठिन सवाल

 -बृज खंडेलवाल-

भारत में नृत्य केवल मनोरंजन नहीं रहा। यह आत्मा की ज़बान रहा है। मंदिरों की देहरी से लेकर राजदरबारों तक, गांव की चौपाल से लेकर बड़े रंगमंच तक, नृत्य ने भाव, राग और रस की परंपरा को ज़िंदा रखा।

भारत नाट्यम की मुद्राएँ हों या कथक की चक्करदार चाल, ओडिसी की त्रिभंगी हो या मणिपुरी की कोमलता, हर शैली में अनुशासन था, साधना थी, एक ख़ामोश समर्पण था।मगर अब मंजर बदल रहा है।

वैश्वीकरण और लोकतंत्रीकरण के इस दौर में कला भी “सबकी” हो गई है। मंच अब घरानों और गुरुकुलों तक सीमित नहीं रहा। सोशल मीडिया ने दरवाज़े खोल दिए हैं। रील्स, रियलिटी शो, यूट्यूब चैनल, हर हाथ में कैमरा है, हर कोई कलाकार है।

पॉप, हिप-हॉप, कंटेम्परेरी और बॉलीवुड की धुनों पर अब शास्त्रीय मुद्राएँ थिरकती हैं। इसे “फ्यूज़न” कहा जा रहा है। रचनात्मकता के नाम पर प्रयोगों की बाढ़ है। सवाल उठता है, यह प्रयोग है या बिगाड़?

उड़ान है या प्रदूषण?

कुछ पुरोधाओं को यह बदलाव रास नहीं आ रहा। उनका कहना है कि शास्त्रीय नृत्य की रूह,  उसकी पवित्रता,  उसकी तहज़ीब, सब कुछ बाज़ार की चमक में धुंधला हो रहा है। अब मक़सद  साधना नहीं, “मास अपील” है। भाव की जगह बाहरी ग्लैमर ने ले ली है।

पहले एक मुद्रा सीखने में सालों का नियमित अभ्यास लगता था। आज कुछ सेकंड की रील में तालियाँ मिल जाती हैं। यह रफ्तार दिलकश  है, मगर कहीं गहराई कम तो नहीं हो रही?

लोकप्रियता बढ़ी है, इसमें शक नहीं। हर गली में डांस स्टूडियो है। बच्चे छोटी उम्र से मंच पर हैं। यह लोकतंत्रीकरण एक हद तक सुखद है। कला अब किसी ख़ास वर्ग की मिल्कियत नहीं। पर इसके साथ एक डर भी है, सतहीपन का।

योग का उदाहरण सामने है। कभी वह ध्यान और आत्म-अनुशासन की साधना था। आज फिटनेस उद्योग का हिस्सा है। बुरा नहीं है, मगर मक़सद  बदल गया। ठीक वैसा ही नृत्य के साथ हो रहा है। देह की चपलता ज़्यादा दिख रही है, मन की तल्लीनता  कम।

तकनीक ने बदलाव को तेज़ कर दिया है। ऑटो-ट्यून, साउंड मिक्सिंग, डिजिटल इफेक्ट्स, संगीत का चेहरा बदल गया। डांस वीडियो में कैमरा एंगल, स्लो मोशन, एडिटिंग, सब मिलकर प्रस्तुति को नया रंग देते हैं। स्टेज की सीमाएँ टूट गईं। इंस्टाग्राम और यूट्यूब नए रंगमंच बन गए हैं।

भाषा का मेल-जोल भी बढ़ा है। हिंदी गानों में अंग्रेज़ी लाइनें, पंजाबी बीट्स पर कथक की घूम, भरतनाट्यम की मुद्राओं में हिप-हॉप का तड़का, यह सिर्फ शब्दों का नहीं, शैलियों का भी मेल, एकता है।

बॉलीवुड ने इस फ्यूज़न को बड़े परदे पर ख़ूबसूरती से चमकाया है। फ़िल्म देवदास के गीत “डोला रे डोला” में माधुरी दीक्षित की कथक की घूमती चक्करें और ऐश्वर्या राय की भरतनाट्यम से प्रेरित मुद्राएं दोस्ती और भावनाओं की गहराई को दिखाती हैं।

इसी तरह फ़िल्म बाजीराव मस्तानी के गीत “पिंगा” में दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा ने लावणी और कथक का जीवंत संगम प्रस्तुत किया। वहीं “मोहे रंग दो लाल” गीत में भाव-रस की गहराई बनी रही।

ये मिसालें बताती हैं, जब फ्यूज़न जड़ों से जुड़ा हो, तो नया सौंदर्य जन्म लेता है। नई पीढ़ी की अपनी रुचि है। उनका अपना अंदाज़ है। वे तेज़ हैं, प्रयोगधर्मी हैं, बेख़ौफ़ हैं। बदलाव हर दौर में हुआ है। कला ने हमेशा समय से गुफ़्तगू की है।

पर परिवर्तन और प्रदूषण के बीच एक नाज़ुक रेखा है। जब मूल तत्व खो जाएँ, जब व्याकरण टूट जाए, तब एहतियात ज़रूरी है।

फ्यूज़न तभी सार्थक है जब उसमें परंपरा के प्रति सम्मान हो, जब रियाज़  की खुशबू बनी रहे। शास्त्रीय नृत्य केवल स्टेप्स का समूह नहीं। वह दर्शन है। कथा है। आध्यात्म है। उसमें शरीर के साथ मन और आत्मा भी नाचते हैं।

अगर फ्यूज़न इस रूह  को साथ लेकर चले, तो यह उड़ान है। अगर उसे पीछे छोड़ दे, तो यह प्रदूषण है। फैसला हमारे हाथ में है। हम चमक चुनते हैं या गहराई। या फिर दोनों का एक ख़ूबसूरत संतुलन।

SP_Singh AURGURU Editor