तमिलनाडु में अंततः ध्वस्त हो ही गया द्रविड़ किला, सीएम स्टालिन की हार और एक्टर विजय की पार्टी टीवीके के उभार से राज्य में बदलती राजनीति का नया अध्याय
तमिलनाडु के विधान सभा चुनाव परिणाम द्रविड़ राजनीति के लंबे वर्चस्व को तोड़ते दिख रहे हैं। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की खुद अपनी सीट से हार और एक्टर विजय की नई पार्टी टीवीके का उभार यह संकेत दे रहा है कि राज्य के मतदाता अब नए विकल्प की ओर बढ़ चुके हैं। आने वाले समय में राज्य की राजनीति दो दलों से निकलकर बहुध्रुवीय स्वरूप ले सकती है, जहां गठबंधन और नए समीकरण निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
-एसपी सिंह-
तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय तक दो ध्रुवों- द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईडीएमके) के इर्द-गिर्द घूमती रही है। इस व्यवस्था को द्रविड़ मॉडल कहा जाता रहा, जहां दशकों से सत्ता का संतुलन इन्हीं दो दलों के बीच बदलता रहा। लेकिन ताजा चुनावी परिदृश्य में यह पूरा ढांचा ध्वस्त होता नजर आ रहा है।
मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का कोलाथुर सीट से हार जाना सिर्फ व्यक्तिगत पराजय नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संदेश का संकेत है। यह हार उस समय आई जब उनकी सरकार पिछले पांच वर्षों से सत्ता में थी और खुद को द्रविड़ मॉडल के सफल उदाहरण के रूप में पेश कर रही थी। डीएमके 72 सीटों पर सिमट गई है। हालांकि वह दूसरी बड़ी पार्टी बनी है।
इस चुनाव में एक बड़ा विमर्श सनातन को लेकर भी उभरा। उदयनिधि स्टालिन के वे बयान, जिसमें उन्होंने सनातन की तुलना डेंगू और मलेरिया से की, ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ी। अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या इस तरह के बयान तमिलनाडु की जनता को नागवार गुजरे और उन्होंने वोट के जरिए प्रतिक्रिया दी। यह पूरी तरह एकमात्र कारण नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह जरूर है कि इसने चुनावी माहौल को प्रभावित किया और विपक्ष को एक मजबूत नैरेटिव दिया।
इसी बीच सबसे बड़ा राजनीतिक भूचाल एक्टर विजय के रूप में सामने आया। उनकी नवगठित पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) का उभार तमिलनाडु की राजनीति में तीसरे विकल्प की भूख को उजागर करता है। नवगठित टीवीके ने अपने बूते पर 234 में से 108 सीटें जीतकर न केवल व्यापक जनसमर्थन हासिल किया बल्कि पारंपरिक दलों को पीछे छोड़ दिया। साफ संकेत है कि मतदाता अब पुराने समीकरणों से बाहर निकलकर नए चेहरे और नई राजनीति को मौका देने के मूड में थे।
एआईडीएमके की महज 54 सीटों की सीमित सफलता भी यही दिखाती है कि केवल एंटी-इंकंबेंसी के भरोसे सत्ता हासिल करना अब आसान नहीं रहा। भाजपा के साथ गठबंधन के बावजूद अपेक्षित प्रदर्शन न कर पाना इस बात की ओर इशारा करता है कि तमिलनाडु में राजनीति की रणनीति को स्थानीय संवेदनाओं के साथ संतुलित करना अभी भी चुनौती बना हुआ है।
सबसे दिलचस्प स्थिति अब सरकार गठन को लेकर बनती है। टीवीके 105 सीटें लेकर सबसे बड़ी पार्टी तो बनी है, लेकिन बहुमत से 13 सीटें पीछे है, तो उसे समर्थन की जरूरत होगी। ऐसे में विकल्प दो ही हैं- या तो वह डीएमके के साथ समझौता करे या एआईडीएमके के साथ। दोनों ही स्थितियों में राजनीति का नया समीकरण बनेगा। अगर विजय किसी एक के साथ जाते हैं, तो वह किंगमेकर नहीं बल्कि किंग की भूमिका में ही रहेंगे।
राजनीति किस दिशा में जाएगी?
तमिलनाडु अब एक त्रिकोणीय राजनीति की ओर बढ़ता नजर आ रहा है, जहां, द्रविड़ दलों का वर्चस्व चुनौती में है। राज्य में नई पीढ़ी का नेतृत्व उभर रहा है। मुद्दों की राजनीति, पहचान और भावनाओं से टकरा रही है
यह बदलाव स्थायी होगा या अस्थायी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि नया नेतृत्व कितनी जल्दी खुद को शासन और संगठन दोनों में साबित करता है।