फतेहपुर सीकरी में सूफ़ियाना रंग, हज़रत शेख सलीम चिश्ती के 456वें उर्स में उमड़ा आस्था का सैलाब

फतेहपुर सीकरी स्थित दरगाह हज़रत शेख सलीम चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह के 456वें सालाना उर्स मुबारक में कुल की रस्म के दौरान आस्था, सूफ़ियाना परंपरा और गंगा-जमुनी तहज़ीब का अद्भुत नज़ारा देखने को मिला। रात 3:30 बजे सज्जादानशीन पीरज़ादा अरशद फरीदी चिश्ती ने दरगाह शरीफ पर हाज़िरी देकर कुल की रस्म अदा की। देश-विदेश से आए ज़ायरीन ने अमन, भाईचारे और खुशहाली की दुआ की। भारी भीड़ के बीच पुलिस ने विशेष सुरक्षा व्यवस्था की। उर्स के तहत 24 और 25 मार्च को “रंग-ए-सूफ़ियाना” कार्यक्रम और भव्य अखिल भारतीय मुशायरा आयोजित होगा।

Mar 19, 2026 - 20:46
 0
फतेहपुर सीकरी में सूफ़ियाना रंग, हज़रत शेख सलीम चिश्ती के 456वें उर्स में उमड़ा आस्था का सैलाब
कुल की रस्म में शामिल सज्जादानशीन पीरज़ादा अरशद फरीदी व अन्य। चिश्ती

कुल की रस्म में रात 3:30 बजे सज्जादानशीन पीरज़ादा अरशद फरीदी चिश्ती ने दी हाज़िरी, देश-दुनिया की अमन-खुशहाली के लिए हुई विशेष दुआ; 24-25 मार्च को होगा ‘रंग-ए-सूफ़ियाना’ और अखिल भारतीय मुशायरा

आगरा/ फतेहपुर सीकरी। विश्व प्रसिद्ध दरगाह हज़रत शेख सलीम चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह के 456वें सालाना उर्स मुबारक के अवसर पर फतेहपुर सीकरी एक बार फिर सूफ़ियाना रूहानियत, आस्था और गंगा-जमुनी तहज़ीब के रंग में रंगा दिखाई दिया। कुल की आध्यात्मिक और भावपूर्ण रस्म के दौरान दरगाह शरीफ पर अकीदतमंदों का ऐसा विशाल और मनमोहक जनसैलाब उमड़ा, जिसने इस ऐतिहासिक उर्स को और भी खास बना दिया।

देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेशों से भी बड़ी संख्या में ज़ायरीन दरगाह शरीफ पहुंचे और हज़रत के आस्ताने पर हाज़िरी देकर अपनी अकीदत पेश की। इस दौरान दरगाह परिसर में हर ओर दुआ, अकीदत, तबर्रुक और सूफ़ियाना माहौल की अनूठी छटा देखने को मिली।

रात 3:30 बजे अदा हुई कुल की मुबारक रस्म

उर्स मुबारक के सबसे अहम पड़ावों में शामिल कुल की रस्म रात करीब 3:30 बजे अदा की गई। सज्जादानशीन पीरज़ादा अरशद फरीदी चिश्ती ने दरगाह शरीफ पर हाज़िरी देकर पूरी अकीदत और परंपरागत तरीके से कुल की मुबारक रस्म अदा की। इस पवित्र मौके पर दरगाह परिसर में मौजूद अकीदतमंदों ने पूरी श्रद्धा के साथ इस आध्यात्मिक क्षण का साक्षी बनना अपने लिए सौभाग्य माना। कुल की रस्म के दौरान विशेष तबर्रुकात वितरित किए गए। साथ ही देश, समाज और पूरी दुनिया में अमन, स्थिरता, भाईचारे और खुशहाली के लिए सामूहिक दुआएँ की गईं।

कुल के छींटों के लिए उमड़ा उत्साह, दिखी गहरी आस्था

कुल की रस्म के दौरान अकीदतमंदों में कुल के छींटों को पाने की गहरी उत्सुकता देखने को मिली। श्रद्धालु इस पवित्र अवसर को अपनी रूहानी नज़दीकी का माध्यम मानते हुए पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ दरगाह परिसर में डटे रहे। दरगाह में उमड़ी भारी भीड़ के चलते माहौल पूरी तरह रूहानियत से सराबोर रहा। कुल की रस्म के दौरान हर ओर “या हज़रत” की सदाएँ, दुआओं की गूंज और अकीदतमंदों की भावनात्मक भागीदारी ने इस आयोजन को अत्यंत भव्य और यादगार बना दिया।

भारी भीड़ के बीच पुलिस का विशेष सुरक्षा घेरा

श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए पुलिस प्रशासन को विशेष सुरक्षा इंतज़ाम करने पड़े। कुल की रस्म पूरी होने के बाद सज्जादानशीन पीरज़ादा अरशद फरीदी चिश्ती को दरगाह शरीफ से उनके हुजरे तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए पुलिस ने उन्हें विशेष सुरक्षा घेरे में लिया। प्रशासन की सक्रियता और सुरक्षा प्रबंधों के चलते पूरा कार्यक्रम शांतिपूर्ण और व्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ।

सूफ़ी संतों का संदेश पूरी दुनिया के लिए है-पीरज़ादा अरशद फरीदी चिश्ती

इस अवसर पर अपने संबोधन में पीरज़ादा अरशद फरीदी चिश्ती ने कहा कि सूफ़ी संतों का संदेश किसी एक वर्ग, समाज या धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी इंसानियत के लिए है। उन्होंने कहा कि सूफ़ी परंपरा प्रेम, सहिष्णुता, भाईचारे और मानवता की बुनियाद पर खड़ी है। हज़रत शेख सलीम चिश्ती के आस्ताने पर हर धर्म, हर वर्ग और हर समुदाय के लोग बिना किसी भेदभाव के हाज़िरी देते हैं। यही इस दरगाह की सबसे बड़ी पहचान और सूफ़ी संदेश की जीवंत मिसाल है। उन्होंने इस संदेश को और अधिक व्यापक रूप से समाज तक पहुंचाने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

रईस मियाँ की सरपरस्ती में जारी है 456वाँ सालाना उर्स

उल्लेखनीय है कि हज़रत शेख सलीम चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह का 456वाँ सालाना उर्स मुबारक सज्जादानशीन पीरज़ादा अयाज़ुद्दीन चिश्ती उर्फ़ रईस मियाँ की सरपरस्ती में पूरे अदब, एहतराम और अकीदत के साथ जारी है। उर्स के दौरान दरगाह शरीफ में न सिर्फ धार्मिक रस्में अदा की जा रही हैं, बल्कि सूफ़ियाना संस्कृति, साहित्य और सामाजिक सद्भाव को भी विशेष रूप से रेखांकित किया जा रहा है।

24 और 25 मार्च को होगा दो दिवसीय ‘रंग-ए-सूफ़ियाना’ कार्यक्रम

उर्स मुबारक के सिलसिले में 24 और 25 मार्च को दरगाह शरीफ में दो दिवसीय “रंग-ए-सूफ़ियाना” कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इस कार्यक्रम में सांसद राजकुमार चाहर मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता पीरज़ादा रईस मियाँ चिश्ती करेंगे, जबकि स्वागत संबोधन पीरज़ादा अरशद फरीदी चिश्ती द्वारा प्रस्तुत किया जाएगा। यह आयोजन सूफ़ी विचारधारा, साहित्य, आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक विरासत को एक मंच पर प्रस्तुत करेगा।

देश की नामचीन साहित्यिक और बौद्धिक हस्तियां होंगी शामिल

“रंग-ए-सूफ़ियाना” कार्यक्रम में देश की कई प्रतिष्ठित साहित्यिक और बौद्धिक हस्तियाँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगी। इनमें प्रमुख रूप से राना शफवी, रिनी सिंह, गुलाम रसूल देहलवी, सैयद साहिल आगा, सादिया अलीम, डॉ. नीता पांडे जैसी विशिष्ट हस्तियां  शामिल होंगी। इनकी मौजूदगी कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्तर पर एक विशिष्ट पहचान देगी।

25 मार्च की रात सजेगा भव्य अखिल भारतीय मुशायरा

उर्स मुबारक के सांस्कृतिक आयोजनों में सबसे आकर्षक कार्यक्रमों में से एक भव्य अखिल भारतीय मुशायरा होगा, जो 25 मार्च की रात 9:30 बजे आयोजित किया जाएगा। इस मुशायरे में देश के कई नामचीन शायर और कवि अपने कलाम से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करेंगे। इनमें शामिल हैं वसीम राशिद, मोईन शादाब, तहसीन मुनव्वर, उमर अज़हर, अलंकरत श्रीवास्तव, अभिषेक तिवारी, शारिक मलिक, डॉ. इंदु गुप्ता, मीनाक्षी, बिस्मिल फतेहपुरी। यह मुशायरा सूफ़ियाना अदब, शायरी और सांस्कृतिक संवाद का भव्य मंच बनेगा।

ग़ुस्ल शरीफ से हुआ था उर्स का औपचारिक शुभारंभ

उर्स मुबारक का औपचारिक शुभारंभ 20 रमज़ान को मजार-ए-अक़दस के ग़ुस्ल शरीफ से हुआ था। इसके बाद अकीदतमंदों को पवित्र तबर्रुकात की ज़ियारत कराई गई। इस विशेष अवसर पर श्रद्धालुओं को हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के कदम मुबारक, मूए मुबारक (दाढ़ी के बाल), हज़रत ग़ौस-ए-आज़म रहमतुल्लाह अलैह का ख़रक़ा मुबारक (चोगा), हज़रत बाबा फरीदुद्दीन गंज-ए-शकर रहमतुल्लाह अलैह का पटका शरीफ, हज़रत शेख सलीम चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की कलाह मुबारक की पवित्र तबर्रुकात की ज़ियारत कराई गई।  पवित्र तबर्रुकात की ज़ियारत सज्जादा नशीन पीरज़ादा अरशद फरीदी चिश्ती के हाथों कराई गई, जिसे श्रद्धालुओं ने अत्यंत भाव-विभोर होकर ग्रहण किया। फ़ातेहा के साथ होगा उर्स का समापन हज़रत बाबा फरीद गंज-ए-शकर रहमतुल्लाह अलैह के फ़ातेहा के साथ किया जाएगा। इस तरह यह उर्स न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह सूफ़ी परंपरा, सांस्कृतिक विरासत, साहित्यिक चेतना और सामाजिक सौहार्द का भी अद्भुत संगम बनकर सामने आया है।