एआई समिट में अर्द्धनग्न विरोध का पूरा समर्थन: कैडर के साथ खड़ी कांग्रेस, लेकिन किस कीमत पर?
नई दिल्ली के एआई समिट के दौरान अपने युवा कार्यकर्ताओं के अर्द्धनग्न प्रदर्शन का समर्थन कर कांग्रेस ने यह दिखा रही है कि कि वह विरोध के स्पेस को प्राथमिकता दे रही है, लेकिन यह रुख उसकी राजनीतिक परिपक्वता, गठबंधन तालमेल और शहरी-मध्यमवर्गीय व युवा मतदाताओं के बीच विश्वसनीयता पर जोखिम भी बढ़ा सकता है, यानि भावनात्मक ऊर्जा बनाम दीर्घकालिक भरोसे की सीधी टक्कर।
-एसपी सिंह-
नई दिल्ली में हाल ही में सम्पन्न एआई समिट के दौरान कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया अर्द्धनग्न प्रदर्शन और उसके बाद कांग्रेस का अपने कार्यकर्ताओं के साथ सार्वजनिक रूप से खड़ा होना, मौजूदा भारतीय राजनीति में प्रतीकात्मक विरोध बनाम राजनीतिक परिपक्वता की बहस को फिर से केंद्र में ले आया है। इस पूरे घटनाक्रम को अगर भावनात्मक प्रतिक्रिया से अलग रखकर देखा जाए, तो यह कांग्रेस की रणनीतिक दुविधा को उजागर करता है, जहां एक ओर पार्टी खुद को संघर्षशील विपक्ष के रूप में स्थापित करना चाहती है, वहीं दूसरी ओर वह अपनी विश्वसनीयता और गंभीरता को लेकर पहले से ही सवालों से घिरी हुई है।
इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी की आलोचना अपेक्षित थी, लेकिन ज्यादा चौंकाने वाला यह रहा कि इंडिया ब्लॉक के भीतर कांग्रेस के सहयोगी दलों ने भी इस मुद्दे पर कांग्रेस से दूरी बना ली। इसके बावजूद कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं के कृत्य का समर्थन कर रही है, जो यह संकेत देता है कि पार्टी फिलहाल नैतिक अनुशासन से ज्यादा प्रोटेस्ट स्पेस को प्राथमिकता दे रही है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो कांग्रेस का यह स्टैंड एक तरह से डिफेंसिव अटैक है। पार्टी जानती है कि वह सत्ता से बाहर रहते हुए लगातार यह आरोप झेल रही है कि वह कमजोर, भ्रमित और निर्णय लेने में अक्षम विपक्ष है। ऐसे में कार्यकर्ताओं के समर्थन में खड़ा होने से तो यही संदेश मिलता है कि कांग्रेस अपने जमीनी कैडर को अकेला नहीं छोड़ेगी, भले ही विरोध का तरीका विवादास्पद क्यों न हो। यह फैसला अंदरूनी तौर पर संगठन को यह भरोसा दिलाने की कोशिश है कि पार्टी नेतृत्व युवा जोश को दबाने के पक्ष में नहीं है।
लेकिन यही बिंदु कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा जोखिम भी बन रहा है। राजनीति केवल विरोध दर्ज कराने का नाम नहीं है, बल्कि यह भी दिखाने की प्रक्रिया है कि आप सत्ता के विकल्प के रूप में कितने गंभीर और जिम्मेदार हैं। अर्द्धनग्न प्रदर्शन जैसे प्रतीकात्मक और अतिनाटकीय तरीकों का समर्थन करने से कांग्रेस उस मध्यमवर्गीय और शहरी मतदाता वर्ग को असहज कर सकती है, जो पहले ही पार्टी की निर्णय क्षमता और नेतृत्व को लेकर संशय में है। सहयोगी दलों की आलोचना यह भी दिखाती है कि इस तरह के कदम विपक्षी गठबंधन के भीतर समन्वय और साझा राजनीतिक नैतिकता को कमजोर कर सकते हैं।
युवा वोट बैंक के संदर्भ में यह मुद्दा ज्यादा जटिल है। भारतीय युवा मतदाता एकसमान नहीं हैं। एक वर्ग ऐसा है जो बेरोज़गारी, परीक्षा प्रणाली, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भविष्य की अनिश्चितता से नाराज़ है। इस वर्ग के लिए ऐसा प्रदर्शन और उस पर पार्टी का समर्थन, यह संकेत दे सकता है कि कांग्रेस कंफर्ट ज़ोन की राजनीति नहीं कर रही और असहज सवाल उठाने से नहीं डरती। खासकर वे युवा जो खुद को सिस्टम से हाशिये पर महसूस करते हैं, उन्हें यह रुख एक तरह का भावनात्मक प्रतिनिधित्व लग सकता है।
वहीं दूसरी ओर, एक बड़ा युवा वर्ग ऐसा भी है जो अवसर, स्थिरता और व्यावहारिक समाधान चाहता है। उसके लिए इस तरह के प्रदर्शन मुद्दों की गंभीरता को कमज़ोर करते हैं और राजनीति को तमाशे में बदलते प्रतीत होते हैं। इस वर्ग में कांग्रेस का स्टैंड यह धारणा मजबूत कर सकता है कि पार्टी के पास ठोस नीतिगत रोडमैप की कमी है और वह प्रतीकों के सहारे ध्यान खींचने की कोशिश कर रही है।
कुल मिलाकर, यह घटनाक्रम कांग्रेस को युवा वोट बैंक में ध्रुवीकृत करता है। कुछ युवाओं के बीच भावनात्मक जुड़ाव बढ़ता है, लेकिन उससे कहीं बड़ी संख्या में युवा उससे दूर भी हो सकते हैं। दीर्घकालिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस इस तरह के विरोध को आगे चलकर स्पष्ट राजनीतिक एजेंडा, नीतिगत प्रस्ताव और अनुशासित आंदोलन से जोड़ पाती है या नहीं। यदि पार्टी इसे सिर्फ एक भावनात्मक क्षण मानकर आगे बढ़ जाती है, तो यह प्रकरण धीरे-धीरे उसकी विश्वसनीयता पर बोझ बन सकता है। लेकिन अगर वह युवा असंतोष को संस्थागत और रचनात्मक राजनीतिक दिशा देने में सफल होती है, तो यही ऊर्जा भविष्य में उसके लिए अवसर भी बन सकती है।
कुल मिलाकर यह स्टैंड कांग्रेस को तुरंत कोई बड़ा चुनावी लाभ नहीं देता, बल्कि जोखिम ज्यादा पैदा कर रहा है। युवा वोट बैंक में यह उसे नए समर्थक भी दिला सकता है और नए संदेह भी और यही इस पूरे प्रकरण का सबसे अहम राजनीतिक सबक है।