कंगना के ‘गटर जेनरेशन’ बयान पर अदालत में तीखी बहस, वादी के पीड़ित होने के सवाल पर दी गईं दलीलें; फैसला सुरक्षित
आगरा। भाजपा सांसद एवं फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत के ‘गटर जेनरेशन’ बयान को लेकर दायर रिवीजन याचिका पर जिला जज संजय कुमार मलिक की अदालत में एक घंटे से अधिक समय तक बहस हुई। वादी पक्ष ने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें परिवाद को यह कहते हुए निरस्त कर दिया गया था कि कंगना के बयान से वादी न तो पीड़ित है और न ही व्यथित। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जिला जज ने मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया।
राजीव गांधी बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता रमाशंकर शर्मा तथा वरिष्ठ अधिवक्ता सुखबीर सिंह चौहान ने रिवीजन पर बहस करते हुए कहा कि अवर न्यायालय ने परिवाद पर सुनवाई किए बिना ही 3 सितंबर 2026 को उसे निरस्त कर दिया। अधिवक्ताओं ने दलील दी कि कंगना रनौत का बयान केवल किसी एक व्यक्ति से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि प्रदर्शनकारी छात्र-छात्राओं, उनके अभिभावकों के सम्मान और देश की एकता, अखंडता एवं संप्रभुता से जुड़े सवाल भी इसमें शामिल हैं।
राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल के मामलों का दिया हवाला
वादी पक्ष के अधिवक्ताओं ने अपनी दलीलों के समर्थन में राहुल गांधी, पप्पू यादव और अरविंद केजरीवाल सहित अन्य नेताओं के विरुद्ध देश के विभिन्न हिस्सों में दर्ज कराए गए परिवादों और एफआईआर का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि राम मंदिर के चंदे में कथित चोरी के विरोध में राहुल गांधी और पप्पू यादव ने नई दिल्ली में संसद के बाहर प्रदर्शन किया था, लेकिन इस मामले में बनारस में भी परिवाद दर्ज कराया गया।
अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और अन्य नेताओं के बयानों को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों ने शिकायतें दर्ज कराईं। उनके मुताबिक, शिकायत दर्ज कराने वाले कई लोग संबंधित बयानों से सीधे तौर पर प्रभावित नहीं थे और न ही व्यक्तिगत रूप से पीड़ित थे। राहुल गांधी के विरुद्ध देश के विभिन्न स्थानों पर करीब 45 अन्य एफआईआर और परिवाद दर्ज कराए जाने का भी हवाला दिया गया। इसी तरह अरविंद केजरीवाल के विरुद्ध हरियाणा, कर्नाटक सहित अन्य प्रदेशों में दर्ज मामलों का उल्लेख किया गया।
वादी पक्ष ने सवाल उठाया कि जब अन्य मामलों में सीधे तौर पर पीड़ित नहीं होने वाले व्यक्तियों की शिकायतों पर भी कानूनी कार्रवाई हुई है, तो कंगना रनौत के बयान से जुड़े इस मामले में परिवाद को केवल वादी के पीड़ित या व्यथित नहीं होने के आधार पर क्यों निरस्त कर दिया गया। अधिवक्ताओं ने दलील दी कि कानून के इस्तेमाल में अलग-अलग मामलों के लिए अलग मानदंड नहीं अपनाए जाने चाहिए।
वादी के बेटे के शैक्षणिक प्रमाणपत्र भी लगाए
बहस के दौरान अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि परिवादी स्वयं एक छात्र का पिता है। रिवीजन याचिका और बाद पत्र के साथ उसके बेटे ध्रुव शर्मा के शैक्षणिक प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत किए गए हैं। वादी पक्ष के अनुसार, इन दस्तावेजों के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया गया कि बयान का संबंध छात्रों और उनके अभिभावकों के सम्मान तथा उनके भविष्य से है।
अधिवक्ताओं ने आरोप लगाया कि निचली अदालत ने दस्तावेजी साक्ष्यों पर विचार किए बिना ही परिवाद निरस्त कर दिया। उन्होंने इस कार्रवाई को न्यायिक प्रक्रिया में मामले की सुनवाई का अवसर नहीं दिए जाने के रूप में प्रस्तुत किया और इसे एक तरह से मामले की समयपूर्व समाप्ति बताया।
संविधान और कानूनी प्रावधानों का भी उल्लेख
वादी पक्ष ने अपनी बहस में देश की एकता और अखंडता से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों के साथ अपमानजनक टिप्पणियों से संबंधित कानूनी प्रावधानों का भी उल्लेख किया। अधिवक्ताओं ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 और धारा 356 का हवाला देते हुए अपनी दलीलें रखीं। उनका तर्क था कि सार्वजनिक रूप से दिए गए ऐसे बयानों की कानूनी समीक्षा आवश्यक है, जिनके बारे में शिकायतकर्ता का आरोप है कि वे छात्रों और उनके अभिभावकों के सम्मान को प्रभावित करते हैं।
सुनवाई के दौरान जिला जज संजय कुमार मलिक ने वादी पक्ष से कुछ न्यायिक निर्णयों (रूलिंग्स) का संदर्भ भी मांगा। अधिवक्ताओं ने संबंधित रूलिंग्स अदालत में प्रस्तुत कीं। इसके बाद दोनों अधिवक्ताओं की दलीलें सुनने के उपरांत जिला जज ने पत्रावली आदेश के लिए सुरक्षित रख ली।
अब इस मामले में अदालत के फैसले का इंतजार है। रिवीजन पर निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि निचली अदालत द्वारा परिवाद निरस्त किए जाने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर अदालत क्या रुख अपनाती है।