होली के रंग-भंग के संगः ब्रज की फागुनी रंगत में होली, रसिया, भांग और लोकउत्सव की अनंत परंपरा: लोकसंगीत, लोकनृत्य, आस्था और आनंद का सांस्कृतिक संगम

ब्रजभूमि में फागुन-चैत्र मास के दौरान मनाए जाने वाले होली उत्सव सांस्कृतिक भव्यता निराली है। होली, रसिया, लोकनृत्य, गीत-संगीत और लठामार परंपराएं जनमानस के उल्लास का माध्यम बनती हैं। भांग को ब्रज में धार्मिक आस्था और प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है, जिसका संबंध शिव, बलराम और कुबेर से है। ऐतिहासिक प्रसंगों और कुषाणकालीन मूर्तियों के उदाहरण बताते हैं कि मथुरा में उत्सव और मादक पेय की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।

Mar 1, 2026 - 12:27
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होली के रंग-भंग के संगः ब्रज की फागुनी रंगत में होली, रसिया, भांग और लोकउत्सव की अनंत परंपरा: लोकसंगीत, लोकनृत्य, आस्था और आनंद का सांस्कृतिक संगम

-चोब सिंह वर्मा, आईएएस (सेवानिवृत्त)-

बसंत के बाद सर्दी कम होती जाती है और गर्मी का एहसास बढ़ने लगता है। बसंत के दिन ही होलिका स्थापित कर दी जाती है। "सात यार और नौ त्योहारों" वाली ब्रज भूमि में फागुन/चैत्र मास में तो मेलों का वैभव चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाता है। फागुन में पूरे महीने ही रंग-गुलाल के उत्सव, जगह-जगह हुड़दंग, लठामार होली व हुरंगे जनमानस का अनुरंजन करते हैं। रात-रात भर गीत-संगीत और लोकनृत्य की थिरकनें लोगों का भरपूर मनोरंजन करती रहती हैं। मिश्री से भी ज्यादा मीठे कथानक भरे रसिया रस की गागर हैं। जो भी इस रस-गगरी का पान करता है, तृप्त हो जाता है। रसियाओं के भी दंगल होते हैं। रात-रात भर श्रोता इसका रसास्वादन करते हैं।

होली संगीत लोकमानस के मनोरंजन का संगीतमय तमाशा है जो अनंत काल से अनुरंजन करता चला आ रहा है। ब्रज में इस उत्सवी दौर में होली के रंग घुमड़ने लगते हैं। हुरियारों के मन चंचल होने लगते हैं। आम जन को भांग ठंडाई जैसे लोकप्रिय पेय आकर्षित करने लगते हैं। भांग में विजय-प्रदायिनी शक्ति होने की मान्यता के कारण इसे विजया भी कहा जाता है। भगवान शिव और बलराम को प्रिय होने के कारण भांग को एक मादक द्रव्य के रूप में न मानकर इसे ब्रज में प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। 

भंग की भीनी-भीनी तरंगों में हुरियारों के अंग-प्रत्यंग आनन्द की अनुभूति करने लगते है। भांग में सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण तीनों का समन्वय है। व्रज में विशेषतः मयुरा नगर के चौचों में भांग का इतना प्रचलन है कि भांग और चीचे एक-दूसरे के पर्याय बन गये है। यह भी सत्य है कि भांग का नाम मुंह पर आते ही, कान में सुनते ही या आंखों से देखते ही एक मस्ती और मादकता सी छा जाती है।

कुषाण काल में उच्च वर्ग और उत्सवप्रिय लोगों द्वारा पर्वों और विशेष आयोजनों में सोमरस (मदिरा) का सेवन किया जाता था। आज उसी परंपरा का स्थान होली के अवसर पर भांग ने ले लिया है। भांग के गुणीजनों के लिए भांग तैयार करना एक शास्त्रीय अनुष्ठान के समान है। भांग का भोग लगाते समय अनेक प्रकार से भांग के यशोगान किये जाते हैं-

"आकाशे चन्द्रिका देवी, पाताले भुवनेश्वरी। मृत्यु लोके विजया देवी, सर्वसिद्ध प्रदायिनी।।"

मथुरा के चौबों या चतुर्वेदियों को भांग वहुत प्रिय है। जिस प्रकार ग्वाले अपने पशु चराने के लिए खाली खेत देखकर और चंगाली अपना प्रिय भोजन भात देखकर प्रसन्न हो जाते हैं, उसी प्रकार भांग देखकर चौथे उछल पड़ते हैं तथा उनका तन-मन धन राजी हो जाता है-

"ऊजर देखि के गूजर नाचे, भात देख वंगाली।

भांग देखि के चीचे उछरे, तन-मन-धन सौ राजी।।"

आर्य समाज के प्रसिद्ध विद्वान स्वामी श्रद्धानन्द के पिता मथुरा में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी थे। उस समय सोटा, मोटा, छोटा और लंगोटा नामक चार चौबों की यह ख्याति थी कि वे चारों मिलकर एक मन मिठाई आदि खा लेते थे। यह सुनकर श्रद्वानन्द जी के पिता ने उन्हें भोजन के लिए अपने घर पर आमन्त्रित किया। वे चारों एक-एक छटांक भांग पीकर उनके घर आये और यहां सवा-सवा छटांक भांग और पी। इसके बाद लगभग 11 बजे भोजन तैयार हुआ। उन्हें आसन पर बैठाया गया।

तब स्वामी श्रद्धानन्द जी द्वारा अपनी आत्मकथा में वर्णित उल्लेख के अनुसार- "पहले डेढ़-डेढ़ सेर लच्छेदार मलाई अन्दर गई। आखें खुलीं और भांग शुरू हुई। दो-दो सेर पेड़े। उन पर भाजी-पकौड़ी आदि के साथ तीस-तीस पूरियों की तह, फिर खुरचन। फिर उतनी ही पूरियों की तह। फिर हलवा और अन्त में मलाई की पूर्णाहुति। हाथ धुलाकर हथेलियों पर एक-एक रूपया दक्षिणा रखी गई और चौबों को प्रणाम किया।" स्वामी श्रद्धानन्द जी लिखते हैं कि इसके बाद उन्होंने 1-1 छटांक भांग और ली और जब वह शाम को विश्राम घाट पर पहुंचे तब उन्होंने देखा कि वे चारों चौबे भंग के रगड़े में सब भोजन भस्म कर कुस्ती लड़ रहे हैं और इस प्रतीक्षा में थे कि कोई "लडुआ खिलाने वाला जिजमान" मिल जाये।

भांग छानने के स्थल के पास प्रतिष्ठित देवता को भांग का प्रथम भोग लगाया जाता है। धन-देवता कुबेर, यक्ष, शिव और बलराम को भांग चढ़ाना अनिवार्य सा होता है।

हज़ारों वर्षों से मथुरा अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण विभिन्न संस्कृतियों और सभ्यताओं का एक प्रमुख केंद्र और संगम स्थल रहा है। प्रसिद्ध सिल्क रोड की एक महत्वपूर्ण शाखा सड़क गुजरात के भरूच और दक्षिण भारत के महाबलीपुरम को जोड़ती हुई मथुरा से होकर गुजरती थी। इस मार्ग का उपयोग अंतरराष्ट्रीय व्यापारी और व्यवसायी किया करते थे।

ईस्वी प्रथम शताब्दी में जब कुषाणों ने पूर्व की ओर अपने साम्राज्य का विस्तार किया, तब मथुरा को उनकी दूसरी राजधानी बनाया गया। इसी कारण यूनानी और गांधार कला का प्रभाव मथुरा कला पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

मादक पेय या भांग का सेवन विशेष अवसरों पर ब्रज में हजारों वर्ष से चला आ रहा है। ईसा की पहली शताब्दी में जब मंथुरा कुषाणों की दूसरी राजधानी वन गई थी तो वैक्ट्रियन ग्रीक कला का प्रभाव मथुरा के शिल्पकारों पर पड़ गया था। मूर्तियां व कलाकृतियां समसामयिक समाज की प्रतिविम्ब होती है। कुषाण काल में आज से दो हजार वर्ष पहले मथुरा के मूर्तिकारों द्वारा नीचे प्रदर्शित मूर्तियां गढ़ी गईं। एक मूर्ति में बैठे विशाल तोंद वाले कुबेर को विदेशी वेश-भूषा वाले स्त्री पुरुष मादक द्रव्य परोस रहे हैं।

वे इतना पी लेते हैं कि इन्हें संभालना पड़ता है. जैसा कि मूर्ति का पृष्ठ भाग इसे प्रदर्शित करता है। इस मूर्ति को कर्नल स्टेसी ने 1835 में मथुरा में खोज निकाला था जो कलकत्ता म्यूजियम में प्रदर्शित है। दूसरी इसी तरह की मूर्ति 1873-74 के अपने विंटर दूर में तत्कालीन मथुरा जिलाधिकारी एफ. एस. ब्राउस ने पालीखेड़ा गांव में खोज निकाली थी, जो मथुरा के म्यूजियम में प्रदर्शित है।

ऐसा लगता है कि उत्सवधर्मी मथुरावासी युगों से कला का और विशेष उत्सवों का अपने मनोरंजन हेतु उपयोग करते रहे हैं। कुछ और मूर्तियां जो कुषाण युग की ही निर्मित हैं, नीचे प्रदर्शित हैं, जिनमें यक्ष और यक्षणियां मादक पदार्थ ले रहे हैं-

----मूर्तियों की इमेज-------

विगत 5000 वर्षों में अनेक संस्कृतियों एवं सभ्यताओं का उद्भव तथा पराभव हुआ, किंतु ब्रज में श्री कृष्ण के प्रति भक्ति-भावना शाश्वत बनी रही है। वह काव्य, संगीत, नृत्य, अभिनय, चित्रकला आदि ललित कलाओं के भी प्रणेता थे, इसलिए उनकी क्रीड़ा व लीला भूमि में रंग, उमंग और तरंग के मधुरीम पर्व होली में रसिया, फाग व माधुर्यमय रसचोले हर्षोन्मत्त कर देते हैं। होली के मौसम की ही कुछ मादकता है या होली के रंग की रंगीनी, होली के लोक गीतों का लावण्य है या राधा-माधव की राग-माधुरी, यथार्थ यह है कि होली में उन्माद और मस्ती का वातावरण ब्रज में स्वाभाविक रूप से छा जाता है। व्रज में रंग-गुलाल के साथ ग्रामीण अंचलों में धूल की, पानी की, कीचड़ की और गोबर की भी होली होती है।

रंगों में स्त्री-पुरुषों के दल आमने-सामने खड़े हो जाते हैं और साखी गाते हैं। साखी-गीतों में पुरुष प्रश्न करते हैं और स्त्रियां गाते हुये उत्तर देती हैं। नंदगांव व बरसाने में रंग-बिरंगे परिधान में सजी-धजी स्त्रियां दनादन-दनादन लाठियां बरसाती हैं और हुरियारे चमड़े की ढालों पर उनके वार रोकते हैं। कहावत है कि तीन लोक से मथुरा न्यारी। अनंत काल से चली आ रही ब्रज की यह लोक परम्पराएं व उत्सव ब्रज की संस्कृति की जीवंतता के प्रमाण हैं।

(लेखक ब्रज की धरोहर के अध्येता व प्रस्तोता हैं) 

SP_Singh AURGURU Editor