मोदी कैबिनेट के बड़े फैसले, गेहूं-चना समेत छह फसलों की बढ़ी एमएसपी, दिल्ली में ट्रैफिक सुधार होगा
केंद्र सरकार ने रबी की फसल को लेकर 2027-28 के लिए एमएसपी तय किया गया है। सरकार ने गेंहूं, जौ, चना, सरसों, कुसुम और मसूर का एमएसपी बढ़ाया है। दिल्ली के ट्रैफिक में सुधार को लेकर भी सरकार ने फैसला लिया है।
नई दिल्ली। यूनियन कैबिनेट की बैठक में मोदी सरकार ने कई अहम फैसले लिए गए हैं, जिसके तहत रबी की फसल को लेकर 2027-28 के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया गया है। सरकार ने गेंहूं, जौ, चना, सरसों, कुसुम और मसूर का एमएसपी बढ़ाया है। गेंहू का एमएसपी 2610 प्रति क्विंटल, चना का 5928 प्रति क्विंटल, जौ 2286 प्रति क्विंटल, मसूर 7390 रुपये प्रति क्विंटल, सरसों 6613 रुपये प्रति क्विंटल, कुसुम का 7215 रुपये प्रति क्विंटल तय हुआ है।
एमएसपी में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी कुसुम के लिए 675 रुपये प्रति क्विंटल की गई है। इसके बाद रेपसीड और सरसों के लिए 413 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी हुई है। मसूर के लिए 390 रुपये प्रति क्विंटल, जौ का 136 रुपये प्रति क्विंटल, चना का 83 रुपये प्रति क्विंटल और गेहूं के लिए 25 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई है।
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, 'अखिल भारतीय औसत उत्पादन लागत पर अनुमानित मार्जिन गेहूं के लिए 106 फीसदी है, इसके बाद रेपसीड और सरसों के लिए 96 फीसदी, मसूर के लिए 92 फीसदी, चना के लिए 59 फीसदी, जौ के लिए 58 फीसदी, और कुसुम के लिए 50 फीसदी है। रबी फसलों के MSP में इस बढ़ोतरी से किसानों को अच्छी कीमत मिलेगी और फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिलेगा।'
उन्होंने बताया, 'हाल के कुछ सालों में सरकार ने इन फसलों के लिए अधिक एमएसपी देकर अनाज (जैसे गेहूं-चावल) के अलावा अन्य फसलों जैसे दालों और तिलहन की खेती को बढ़ावा दिया है। 2014-15 से 2025-26 के दौरान गेहूं की खरीद बढ़कर 3715 लाख मीट्रिक टन हो गई है, जबकि 2004-05 से 2013-14 के दौरान यह 2254 एलएमटी थी। 2014-15 से 2025-26 के दौरान 6 रबी फसलों की खरीद बढ़कर 3921 एलएमटी हो गई है, जबकि 2004-05 से 2013-14 के दौरान यह 2302 एलएमटी थी।'
अश्विनी वैष्णव ने कहा ने कहा, '2014-15 से 2025-26 के दौरान गेहूं उगाने वाले किसानों को दी गई MSP राशि बढ़कर 7.31 लाख करोड़ रुपये हो गई है, जबकि 2004-05 से 2013-14 के दौरान यह 2.56 लाख करोड़ रुपये थी। 2004-05 से 2013-14 के दौरान रबी की 6 फसलों के किसानों को दिए गए एमएसपी का कुल मूल्य 2.65 लाख करोड़ रुपये था, जो 2014-15 से 2025-26 के दौरान बढ़कर 8.36 लाख करोड़ रुपये हो गया है।
इसके अलावा दिल्ली के ट्रैफिक में सुधार के लिए इंटेलीजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम लाने का फैसला किया गया। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक, 1529 ट्रैफिस सिग्नल अभी फिक्स मैनुअल पर काम करते हैं, लेकिन आईटीएमएस के बाद ये सिंग्नल ट्रैफिक के हिसाब से सिग्नल का टाइम खुद एडजेस्ट कर सकेंगे। इसको तीन फेस में लागू किया जाएगा. इसे अलग-अलग कॉरिडोर में अलग-अलग समय पर लागू किया जाएगा, जिस पर 1790 करोड़ रुपया का खर्च किया जाएगा।
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, 'एनसीआर क्षेत्र काफी फैल गया है और शहरीकरण की इस तेज़ रफ्तार के साथ दिल्ली एक मेगासिटी बन गई है। दिल्ली के ट्रैफ़िक को ठीक से व्यवस्थित करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। आईटीएमएस योजना का मकसद इन सभी हिस्सों को एक साथ जोड़ना है ताकि पूरा नेटवर्क एक एकीकृत, तालमेल वाले और इंटेलिजेंट ट्रैफ़िक मैनेजमेंट सिस्टम के तौर पर काम करे। अभी दिल्ली के 1,529 ट्रैफिक सिग्नल तय समय पर काम करते हैं। उदाहरण के लिए, अगर कोई सिग्नल 30 या 35 सेकंड के लिए सेट है तो वह पूरे समय के लिए लाल ही रहता है, चाहे एक तरफ ट्रैफिक ज्यादा हो और दूसरी तरफ कम।
उन्होंने बताया, 'सिस्टम ऐसा होना चाहिए जो हालात के हिसाब से खुद को ढाल सके और इंटेलिजेंट हो. यानी रियल-टाइम ट्रैफिक की स्थिति के आधार पर सिग्नल का समय बदल सके. जहां ट्रैफिक बढ़ रहा हो वहां लाल बत्ती का समय कम कर दें और जहां सड़क खाली हो, वहां उसे बढ़ा दें। दिल्ली जैसे मेगासिटी के लिए इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम बहुत जरूरी है और दिल्ली पुलिस इस दिशा में बहुत अच्छा काम कर रही है। इसे फेज-1, फेज-2 और फेज-3 में लागू किया जाएगा, जिसमें एक-एक करके खास कॉरिडोर को शामिल किया जाएगा।'
कैबिनेट ने बैटरी एनर्जी स्टोरेज के साथ रिन्यूएबल एनर्जी को पहुंचाने के लिए 1.86 लाख करोड़ रुपये की ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर फेज III योजना को भी मंजूरी दी है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया, 'क्लीन एनर्जी को लेकर एक बड़ा फैसला लिया गया है। देश की मौजूदा बिजली उत्पादन क्षमता 500 गीगावाट से ज्यादा है, जिसमें से 52% हिस्सा पहले से ही रिन्यूएबल एनर्जी सोर्स से आता है। ग्रिड को इस तरह से डिजाइन करना होगा कि वह इन उतार-चढ़ाव से जुड़े लोड को संभाल सके। इस बदलाव को संभालना एक बड़ी चुनौती है।'
उन्होंने बताया, 'जिन देशों ने रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में काफी तरक्की की है, उन्होंने ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी बहुत ध्यान दिया है। उदाहरण के लिए, लद्दाख और राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में देश की रिन्यूएबल एनर्जी की जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा पूरा करने की बहुत क्षमता है। इन इलाकों से बिजली बाहर भेजने के लिए सही इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना बहुत जरूरी है इसीलिए इस प्रोजेक्ट का मुख्य मकसद रिन्यूएबल एनर्जी तक आसान और तेज पहुंच बनाना है- यानी ग्रिड को 'स्मार्ट' बनाना। इसमें रिन्यूएबल एनर्जी में होने वाले उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखकर ग्रिड को डिजाइन करना, इन उतार-चढ़ाव को संभालने के लिए नए तरीके अपनाना और मौजूदा ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करना शामिल है।
केंद्रीय मंत्री ने बताया, 'हमारा लक्ष्य 2030 तक नॉन-फॉसिल फ्यूल सोर्स से 500 गीगावाट बिजली हासिल करना है। हम पहले ही नॉन-फॉसिल फ्यूल सोर्स से लगभग 270 गीगावाट की क्षमता तक पहुंच चुके हैं और मौजूदा विकास की रफ्तार को देखते हुए हम निश्चित रूप से 2030 तक 500 गीगावाट का लक्ष्य हासिल कर लेंगे। इसके अलावा, 2035-36 तक 786 गीगावाट की क्षमता हासिल करने की योजना है। इन लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए। रिन्यूएबल एनर्जी के लिए पर्याप्त ट्रांसमिशन और बिजली बाहर भेजने की क्षमता सुनिश्चित करना बहुत जरूरी है। इसकेलिए 1,86,000 करोड़ रुपये का एक प्रोग्राम तैयार किया गया है।