मीनाक्षी नटराजन की याचिका सुप्रीम कोर्ट से खारिज, अदालत ने कहा, हमें चुनाव प्रक्रिया में दखल देने का अधिकार नहीं
राज्यसभा चुनाव में मीनाक्षी नटराजन का पर्चा खारिज होने के खिलाफ कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। सुनवाई के दौरान जब जस्टिस प्रशांत मिश्रा ने वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी से पूछा कि क्या इतिहास में कभी अदालत ने नामांकन खारिज होने के बाद रिटर्निंग ऑफिसर के आदेश को पलटा है तो सिंघवी के पास कोई उदाहरण या जवाब नहीं था। इस मिसाल के अभाव में सिंघवी बुरी तरह फंस गए और कोर्ट ने दखल देने से इनकार कर दिया।
नई दिल्ली। जब अपने घर में आग लगी हो तो पड़ोसी के घर में झांका नहीं करते। पता नहीं ये बात कांग्रेस कब समझेगी। अब तो कानोकान नहीं डंके की चोट पर क्लियर हो चुका है कि राज्यसभा चुनाव के लिए मीनाक्षी नटराजन का पर्चा कैसे खारिज हुआ। भाजपा को साजिश करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। जिस मध्य प्रदेश में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, जीतू पटवारी, उमंग सिंघार.. सबके अपने-अपने ग्रुप हों, वहां टांग अड़ाने का खेल होना ही था। इशारों में तो कैलाश विजयवर्गीय ने भी बता दिया कि कांग्रेस वालों ने ही बताया था कि मीनाक्षी नटराजन ने अपने हलफनामे में उस केस का जिक्र नहीं किया है, जो तेलंगाना में फाइल हुई है। फिर भाजपा मौका छोड़ने वाली पार्टी है नहीं। लिहाजा नुकसान तो हो गया।
परचा खारिज करना कानून के मुताबिक था या नहीं. तो, अब ये भी क्लियर हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले पर कोई भी टिप्पणी करने से मना कर दिया। मीनाक्षी के धाकड़ वकील अभिषेक मनु सिंघवी से जस्टिस प्रशांत मिश्रा ने कहा कि आप रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दीजिए। हमें संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत चुनाव प्रक्रिया में दखल देने का अधिकार नहीं है. और न ही अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट ऐसा कर सकती है। सुनवाई के दौरान एक मौका ऐसा भी आया जब लगा कि कोर्ट दखल देने के मूड में है। कोर्ट ने अभिषेक मनु सिंघवी से पूछा कि क्या इतिहास में कभी रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने बदला है। अगर कोई भी उदाहरण हो तो बताएं। यहां सिंघवी के पास कोई जवाब नहीं था।
अनुच्छेद 32 के तहत नागरिकों को ये अधिकार है कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में सीधे सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकें। इसके तहत सुप्रीम कोर्ट को पांच तरह के रिट जारी करने का अधिकार है।
1. बंदी प्रत्यक्षीकरण – अवैध रूप से हिरासत में लिए गए व्यक्ति को कोर्ट के सामने पेश करना।
2. परमादेश – किसी सार्वजनिक अधिकारी या संस्था को कानून कर्तव्य का पालन करने का आदेश।
3. निषेध – निचली अदालतों को अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने से रोकना।
4. उत्प्रेषण – निचली अदालत के अवैध आदेश को रद्द करने या मामले को उच्च न्यायलय में स्थानांतरित करने के लिए।
5. अधिकार पृच्छा – किसी सार्वजनिक पद पर अवैध रूप से कब्जा करने वाले व्यक्ति से ये पूछना कि वो किस अधिकार से उस पद पर है।
अनुच्छेद – 226-भारत के सभी उच्च न्यायालयों को नागरिकों के मौलिक अधिकारों और अन्य कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष रिट और निर्देश जारी करने की विस्तृत शक्ति प्रदान करता है। सुप्रीम कोर्ट वाले सारे पांच अधिकार हाई कोर्ट्स को भी हैं, लेकिनह इसका दायरा थोड़ा बड़ा है। ये मौलिक अधिकारों के अलावा भी किसी मुद्दे पर रिट जारी कर सकता है।
अभिषेक मनु सिंघवी की दलील भी इन चार चीजों के इर्द गिर्द घूमी
1. जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (33A) – उम्मीदवार को उन आपराधिक मामलों की जानकारी देनी होती है, जिनमें उसके खिलाफ ऐसे अपराध का आरोप हो जिसकी सजा दो वर्ष या उससे अधिक हो और किसी सक्षम अदालत द्वारा आरोप तय किए जा चुके हों। सिंघवी की दलील थी कि इस कानून के तहत उनके मुवक्किल के खिलाफ ऐसा कुछ भी नहीं है।
2. भारतीय दंड संहिता 223 – इसके तहत किसी भी शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले आरोप को सुनवाई का अवसर देना चाहिए. लेकिन भोपाल के रिटर्निंग ऑफिसर ने ऐसा नहीं किया। मीनाक्षी अपना पक्ष नहीं रख पाईं।
3. निजी शिकायत – मीनाक्षी के खिलाफ किसी प्राइवेट व्यक्ति ने शिकायत की है। अदालत ने उसका संज्ञान भी नहीं लिया है। जस्टिस प्रशांत मिश्रा ने कहा कि कोर्ट ने नोटिस जारी किया है। इस पर सिंघवी ने दलील दी कि नोटिस का मतलब ये नहीं है कि आरोप तय हो गए हैं।
4. रिटर्निंग ऑफिसर की गलती – सिंघवी ने कहा कि कल यानी 11 जून को उन्होंने कोर्ट के सामने ये मुद्दा उठाया। आज सुनवाई होनी थी. उससे पहले ही अफसर ने अपना फैसला सुना दिया। ये शासन प्रशासन की विफलता है।
यहीं पर सिंघवी फंस गए। कोर्ट ने कहा कि राज्यसभा छोड़िए, किसी भी चुनाव में नामांकन खारिज होने के बाद अदालत ने रिटर्निंग अफसर के आदेश को पलटा हो तो या हस्तक्षेप किया हो तो बताइए। सिंघवी कोई भी ऐसी मिसाल पेश नहीं कर सके। अंत में कोर्ट ने मामला खारिज करते हुए कहा कि आप चाहें तो हाई कोर्ट जा सकते हैं।