राम कथा में गूंजा जीवन का संदेश, विपरीत परिस्थितियों में भी नीति और भगवान से प्रीति न छोड़ें-स्वामी रामस्वरूपाचार्य
आगरा के पीएस गार्डन में आयोजित श्री राम कथा में श्री कामदगिरि पीठाधीश्वर श्रीमद् जगतगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामस्वरूपाचार्य महाराज ने श्रीराम के वनगमन और केवट प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन करते हुए जीवन, परिवार और राष्ट्र निर्माण से जुड़े महत्वपूर्ण संदेश दिए। उन्होंने कहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी नीति और भगवान से प्रीति नहीं छोड़नी चाहिए। दंपतियों को एक-दूसरे का साथ निभाने, माता-पिता को बच्चों की प्रतिभा को प्रोत्साहित करने और समाज को नैतिक मूल्यों पर चलने का संदेश दिया। कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु और संत-महात्मा उपस्थित रहे।
केवट प्रसंग और वनगमन कथा के माध्यम से दिया परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण का संदेश, बच्चों के संस्कार और दंपतियों के परस्पर साथ पर विशेष जोर
आगरा। चित्रकूट धाम बने कथा स्थल पीएस गार्डन में आयोजित श्री राम कथा के दौरान गुरुवार को भक्ति, नीति और जीवन मूल्यों का अद्भुत संगम देखने को मिला। व्यासपीठ पर विराजमान श्री कामदगिरि पीठाधीश्वर श्रीमद् जगतगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामस्वरूपाचार्य महाराज ने श्रीराम, सीताजी और लक्ष्मण के वनगमन तथा केवट प्रसंग का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया। कथा के दौरान श्रद्धालु भक्ति रस में सराबोर होकर भावविभोर हो उठे।
स्वामी रामस्वरूपाचार्य महाराज ने कहा कि “विवाद को संवाद में बदलने का प्रयास ही रामत्व है।” उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम ने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अनुकूलता का साम्राज्य स्थापित किया। यही कारण है कि उन्होंने अयोध्या का राजवैभव त्यागकर वनगमन स्वीकार किया। श्रीराम का जीवन त्याग, मर्यादा, नीति और लोककल्याण का अद्भुत उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि सियाराम का कोई निजी सुख-दुख नहीं होता, बल्कि भक्तों का सुख-दुख ही उनका सुख-दुख होता है। भगवान से कुछ मांगना ही है तो भरत और केवट की तरह मांगना चाहिए। माता-पिता और भगवान से मांगने की बजाय उनके चरणों की सेवा करनी चाहिए।
मोह छोड़कर कर्तव्य और नैतिक मूल्यों की रक्षा करें
स्वामी जी ने श्रीराम के वनगमन प्रसंग को वर्तमान जीवन से जोड़ते हुए कहा कि यदि मनुष्य मोह-माया में फंसकर अपने कर्तव्य से दूर हो जाता है, तो वह जीवन में विफल हो जाता है और अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता। उन्होंने कहा कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए मोह का त्याग कर नैतिक मूल्यों की रक्षा करनी चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि केवल विचार या समर्थन ही नहीं, बल्कि सद्विचारों का क्रियान्वयन भी आवश्यक है।
दंपतियों को दिया साथ निभाने का संदेश
कथा के दौरान स्वामी जी ने केवट प्रसंग का दोहा- “पिय हिय की सिय जान निहारी, मनि मुदरी मन मुदित उतारी, कहेउ कृपा लेहि उतराई, केवट चरण गहे अकुलाई...”
का उल्लेख करते हुए आज के दंपतियों को विशेष संदेश दिया। उन्होंने कहा कि विपरीत परिस्थितियों में पति को पत्नी का और पत्नी को पति का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। जीवन की कठिन घड़ियों में परस्पर विश्वास, सहयोग और समर्पण ही परिवार को मजबूत बनाता है।
गरीबी में भी केवट ने नहीं छोड़ी नीति और प्रभु प्रेम
स्वामी रामस्वरूपाचार्य महाराज ने कहा कि केवट ने गरीबी भोगी, लेकिन नीति नहीं छोड़ी और भगवान से प्रीति भी नहीं छोड़ी। आज के समय में अक्सर लोग कठिन परिस्थितियों में भगवान से दूर हो जाते हैं, रूठ जाते हैं, लेकिन केवट का चरित्र सिखाता है कि कैसी भी परिस्थिति हो, नीति और भगवान के चरणों से प्रीति कभी नहीं छोड़नी चाहिए।
उन्होंने कहा कि सुदामा जी ने भी अभावों के बावजूद नीति और प्रेम का दामन नहीं छोड़ा। वास्तविक पूंजी धन-संपत्ति नहीं, बल्कि भक्ति का खजाना है। इसे प्राप्त करना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
दशरथ और केवट के प्रेम का अंतर भी समझाया
स्वामी जी ने कहा कि प्रेम के साथ नीति का होना आवश्यक है। उन्होंने दशरथ और केवट के प्रेम का उदाहरण देते हुए बताया कि महाराज दशरथ श्रीराम को अयोध्या में ही रोकना चाहते थे, जबकि केवट केवल प्रभु के चरणामृत का पान करना चाहता था। उन्होंने कहा कि बंधनयुक्त प्रेम में कुंठा होती है, जबकि निष्काम प्रेम में समर्पण और भक्ति होती है। यही कारण है कि भगवान श्रीराम ने केवट के प्रेम को अधिक महत्व दिया। उन्होंने इस प्रसंग को आधुनिक पारिवारिक जीवन से जोड़ते हुए कहा कि आज कई माता-पिता अपने बच्चों को घर से बाहर नहीं जाने देना चाहते, जिससे उनके विकास में बाधा आती है।
बच्चे राष्ट्र के भविष्य और कर्णधार हैं
स्वामी रामस्वरूपाचार्य महाराज ने कहा कि बच्चे ही राष्ट्र का भविष्य और कर्णधार हैं। यदि किसी भी व्यवस्था, नीति या निर्णय से बच्चों का आत्मबल कमजोर होता है, तो निश्चित रूप से राष्ट्र भी कमजोर होगा। उन्होंने कहा कि बच्चों की प्रतिभाओं को कुचलने के बजाय उन्हें प्रोत्साहन देना चाहिए। यदि बच्चों में उदासीनता आ गई, तो इसके परिणाम समाज और राष्ट्र दोनों के लिए गंभीर होंगे।
उन्होंने कहा कि धर्म और राष्ट्र दोनों बच्चों के हाथ में हैं, इसलिए उनका सुंदर संस्कारों से श्रृंगार करना अत्यंत आवश्यक है। बच्चों को सकारात्मक वातावरण, नैतिक शिक्षा और प्रोत्साहन देकर ही मजबूत समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण किया जा सकता है।
इनकी रही प्रमुख उपस्थिति
इस अवसर पर मुख्य रूप से महामंडलेश्वर स्वामी श्री यति नरसिंहानंद गिरी जी महाराज, महामंडलेश्वर श्री रामदास जी महाराज (ददरोआ धाम), आयोजन समिति के अध्यक्ष राम सेवक शर्मा (जय भोले), महामंत्री धर्मेंद्र त्यागी, मुख्य यजमान शैलेंद्र विथरिया, हाकिम सिंह त्यागी, रणवीर सोलंकी, पं. किशोर लवानिया, दीनदयाल मित्तल, ऋषि उपाध्याय, डॉ. उदिता त्यागी (गाजियाबाद), श्रीनिवास विथरिया, राजू शर्मा, सुशील बत्रा, विष्णु बिहारी त्यागी, अशोक मित्तल, आचार्य राहुल, रामवीर सिंह चाहर, अशोक फौजदार, महावीर त्यागी, सौरभ शर्मा, सतेंद्र पराशर, जितेंद्र प्रधान, राजेंद्र बरुआ, भगवान दास, राकेश मंगल, रविंद्र सिंह, मुरारी लाल त्यागी, सोम मित्तल, किशन यादव, ऋषि विथरिया, डॉ. अनिल शर्मा सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।