पंजाब चुनाव की तैयारी तेज, चारों दल मैदान में; राजा वड़िंग के इस्तीफे से कांग्रेस की रणनीति पर असर?, आप का घर-घर संपर्क, भाजपा की नशामुक्ति यात्रा, अकाली दल की ‘पंजाब बचाओ’ रैलियां, कांग्रेस के सामने नए नेतृत्व के साथ अभियान की चुनौती
चंडीगढ़। पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच कांग्रेस में प्रदेश नेतृत्व का बदलाव चुनावी रणनीति के लिहाज से अहम घटनाक्रम बन गया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने पद से इस्तीफा दे दिया है। यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब कांग्रेस अक्टूबर से व्यापक राज्यव्यापी अभियान शुरू करने की तैयारी कर रही थी। अब पार्टी के सामने नए प्रदेश अध्यक्ष का चयन करने के साथ संगठन में चल रही गुटबाजी को थामने और चुनावी अभियान को गति देने की चुनौती है।
वड़िंग का इस्तीफा अचानक हुआ घटनाक्रम नहीं है। पिछले कई महीनों से पंजाब कांग्रेस में वड़िंग और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थकों के बीच नेतृत्व को लेकर खींचतान चल रही थी। जुलाई में कांग्रेस हाईकमान ने वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखते हुए चन्नी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाकर दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की थी। इसके बावजूद चन्नी समर्थक नेताओं की ओर से वड़िंग को हटाने की मांग सामने आती रही।
जुलाई-अगस्त के दौरान कांग्रेस के ‘हर बूथ कांग्रेस मजबूत’ अभियान में भी दोनों खेमों की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा सार्वजनिक दिखाई दी। कई कार्यक्रमों में चन्नी समर्थकों के नारे और वड़िंग समर्थकों की सक्रियता चर्चा में रही। इससे संगठन को चुनावी मुद्दों पर केंद्रित रखने के बजाय अंदरूनी मतभेदों को संभालने की अतिरिक्त चुनौती सामने आई।
अब वड़िंग के इस्तीफे के बाद कांग्रेस की चुनावी तैयारी का पहला सवाल नए प्रदेश अध्यक्ष को लेकर है। पार्टी में विजय इंदर सिंगला, परगट सिंह, सुखजिंदर सिंह रंधावा और कुछ अन्य वरिष्ठ नेताओं के नाम चर्चा में हैं। रिपोर्टों के मुताबिक हाईकमान ऐसे नेता की तलाश में है जो वड़िंग और चन्नी दोनों खेमों को साथ लेकर चुनावी मैदान में उतर सके।
अक्टूबर के अभियान पर असर
कांग्रेस के लिए नेतृत्व परिवर्तन का सबसे सीधा असर उसके अक्टूबर में प्रस्तावित राज्यव्यापी अभियान पर पड़ सकता है। नया प्रदेश अध्यक्ष आने के बाद संगठनात्मक जिम्मेदारियों, जिला स्तर के समीकरणों और चुनावी कार्यक्रमों में कुछ बदलाव की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि, पार्टी के पास पहले से तैयार संगठनात्मक ढांचा और चुनावी समितियां मौजूद हैं, इसलिए अभियान पूरी तरह नए सिरे से शुरू करने की स्थिति नहीं है।
कांग्रेस ने सितंबर में सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाया था। पायलट ने प्रदेश के विभिन्न नेताओं और संगठन के पदाधिकारियों से बातचीत के बाद पार्टी नेतृत्व को संगठन की स्थिति पर रिपोर्ट दी। इसके बाद नेतृत्व परिवर्तन का फैसला सामने आया। कांग्रेस के भीतर इसे 2027 के चुनाव से पहले संगठनात्मक पुनर्गठन की प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है।
क्या वड़िंग पहले की तरह कांग्रेस के लिए काम करेंगे
राजा वड़िंग के इस्तीफे के बाद यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या वे प्रदेश अध्यक्ष नहीं रहने के बावजूद कांग्रेस के चुनाव अभियान में उसी सक्रियता से काम करेंगे। फिलहाल उपलब्ध सार्वजनिक बयान इसका संकेत देते हैं कि उन्होंने पार्टी से दूरी बनाने की बात नहीं कही है। इस्तीफे के बाद वड़िंग ने खुद को पार्टी का अनुशासित सिपाही बताते हुए कहा कि जहां जिम्मेदारी दी जाएगी, वहां काम करेंगे। इसलिए यह कहना अभी उचित नहीं होगा कि वे चुनावी गतिविधियों से अलग हो जाएंगे।
दूसरी ओर, प्रदेश अध्यक्ष का पद छोड़ने के बाद उनकी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होगी, यह नए संगठनात्मक ढांचे और हाईकमान के फैसलों पर निर्भर करेगा। वड़िंग लुधियाना से लोकसभा सांसद हैं और 2022 से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। ऐसे में पार्टी के पास उन्हें चुनावी अभियान, संसदीय राजनीति या किसी क्षेत्र विशेष की जिम्मेदारी में सक्रिय रखने का विकल्प मौजूद है, लेकिन उनकी नई औपचारिक भूमिका अभी स्पष्ट नहीं है।
चन्नी की भूमिका भी होगी महत्वपूर्ण
वड़िंग के हटने के बाद चन्नी की भूमिका पर भी नजर रहेगी। जुलाई में उन्हें कांग्रेस की चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। अब प्रदेश अध्यक्ष बदलने के बाद यह देखना होगा कि नए संगठन में चन्नी को किस तरह की भूमिका मिलती है और क्या उनके समर्थक नेता नए नेतृत्व के साथ तालमेल बैठाते हैं। यही कांग्रेस की एकजुटता की अगली बड़ी परीक्षा होगी।
चारों दलों की अपनी-अपनी चुनावी रणनीति
पंजाब में आम आदमी पार्टी, भाजपा, शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस ने भी चुनावी गतिविधियां तेज कर दी हैं। आम आदमी पार्टी 117 विधानसभा क्षेत्रों में जमीनी फीडबैक जुटाने के साथ घर-घर संपर्क और सरकार के कामकाज को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है।
भाजपा बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने के साथ ‘नशामुक्त पंजाब यात्रा’ के जरिए सभी 117 विधानसभा क्षेत्रों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। 18 सितंबर से शुरू हुई करीब 4000 किलोमीटर की यात्रा का समापन 30 सितंबर को जालंधर में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सभा के साथ हुआ। भाजपा ने फिलहाल सभी 117 सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी की बात कही है। भाजपा और अकाली दल के बीच संभावित गठबंधन को लेकर चर्चाएं जरूर हैं, लेकिन अंतिम तस्वीर अभी सामने नहीं आई है।
अकाली दल ‘पंजाब बचाओ’ रैलियों के जरिए क्षेत्रीय मुद्दों, किसानों और नशे के सवाल को उठा रहा है। महिलाओं को जोड़ने के लिए ‘मावां दियां इंसाफ यात्रा’ भी शुरू की गई है। भाजपा के साथ पुराने गठबंधन की संभावनाओं को लेकर अगस्त में सुखबीर सिंह बादल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात के बाद राजनीतिक चर्चाएं तेज हुई थीं।
कांग्रेस के सामने अब अक्टूबर के अभियान से पहले संगठन को नए नेतृत्व के साथ व्यवस्थित करने की चुनौती है। नशे का मुद्दा चारों प्रमुख दलों की गतिविधियों के केंद्र में है। इसके अलावा शासन का रिकॉर्ड, बेरोजगारी, कृषि, उद्योग, कानून-व्यवस्था, केंद्र-राज्य संबंध और पंजाब की आर्थिक स्थिति भी चुनावी विमर्श में प्रमुख रहेंगे।
पंजाब विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल 16 मार्च 2027 को समाप्त होना है। चुनाव कार्यक्रम अभी घोषित नहीं हुआ है। कांग्रेस के लिए आने वाले महीनों में यह महत्वपूर्ण होगा कि नेतृत्व परिवर्तन के बाद संगठनात्मक विवाद चुनावी अभियान पर हावी होते हैं या नया नेतृत्व पार्टी के अलग-अलग गुटों को एक मंच पर लाकर अभियान को आगे बढ़ाता है।