05 मई को जयंती पर विशेषः नारी सशक्तिकरण के प्रेरक और स्वाधीनता संग्राम के निर्भीक सेनानी थे सेठ अचल सिंह: पांच बार संसद में किया आगरा का प्रतिनिधित्व
सेठ अचल सिंह स्वाधीनता सेनानी और स्वाधीन भारत में पांच बार सांसद आगरा के सांसद रहे। 05 मई 1895 को जन्मे अचल सिंह ने कई आंदोलनों का नेतृत्व किया और अनेक बार जेल यात्राएं कीं। उनकी पत्नी भगवती देवी जैन भी नारी सशक्तिकरण की प्रबल समर्थक थीं और उन्होंने अपने आभूषण दान कर आगरा में 1941 में बालिका विद्यालय की स्थापना करवाई, जो आगे चलकर डिग्री कॉलेज बना।
आगरा। स्वाधीन भारत में पांच बार सांसद रहे सेठ अचल सिंह स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख सेनानी थे। वे और उनकी पत्नी भगवती देवी नारी सशक्तिकरण के पक्षधर थे। उन्होंने आगरा में पहला बालिका विद्यालय शुरू किया था, जो आज भगवती देवी जैन डिग्री कालेज तक अपना य़श फैला रहा है।
रोशन मोहल्ला में 05 मई 1895 को जन्मे सेठ अचल सिंह ने स्वाधीनता के कई आंदोलनों का नेतृत्व आगरा में किया था। अनेक बार जेल यात्राएं कीं। उनकी धर्मपत्नी भगवती देवी जैन भी इन आंदोलनों में सहयोगी रहीं, बल्कि पर्दा प्रथा की विरोधी थीं। उन्होंने महिलाओँ को शिक्षित करने के लिए अपनी संचित राशि और आभूषण, जो करीब ढाई लाख रुपये के थे, सेठ जी को दिए और कहा कि बालिका विद्यालय का स्थापित किया जाए। 29 जनवरी 1941 को कन्या विद्यालय की स्थापना हुई। शुरुआत प्राइमरी स्कूल से हुई। उसके बाद जुलाई 1949 में यह विद्यालय जूनियर हाईस्कूल और 1954 में इंटर कालेज हो गया। उसके बाद यह कन्या महाविद्यालय के रूप में गौरव बढ़ा रहा है।
सेठ अचल सिंह कांग्रेस ऐसे नेता थे, जिनकी आजादी से पहले और आजादी के बाद भी शीर्ष नेताओं से करीबी रही। उन स्वाधीनता सेनानियों में प्रमुख थे, जिन्हें पं.मोतीलाल नेहरू ने स्वयं कांग्रेस की सदस्यता दी थी।
सन् 1927 में जब पूरे देश में साइमन कमीशन के विरोध में आंदोलन हुए तो इन्होंने आगरा में इसका विरोध किया। सन् 1930 में
सत्याग्रह करते हुए पहली बार गिरफ्तार किए गए। इसमें इन्हें छह मास जेल में रहना पड़ा था, लेकिन उनकी सक्रियता और तेज हो गई। सन् 1940 में गांधी जी के आह्वान पर व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लिया और इसमें इन्हें एक साल की सजा हुई थी।
सन् 1942 राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आह्वान पर पूरे देश में ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ आंदोलन किया गया। इस ‘करो या मरो आंदोलन’ में पूरा देश क्रांतिमय हो गया था। इसमें सेठ अचल सिंह ने विभिन्न स्थानों पर हुए आंदोलनों का नेतृत्व किया और 2 साल 6 महीने जेल की सजा भोगी थी।
सन् 1952 में भी सत्याग्रह करते हुए वे गिरफ्तार हुए, इस बार इन्हें एक साल छह महीने की सजा हुई। सेठजी की खासियत थी कि जेल यात्राओं से वे कभी हताश नहीं होते थे, बल्कि वे वहां अध्ययन और पुस्तकों का लेखन कार्य करते थे। जेल में उन्होंने ‘सफल साधना’ और ‘जेल में मेरा जैनाभ्यास’, दो पुस्तकें लिखीं थीं।
इसके अलावा ओसवाल उद्धारक, पशु सेवक, सिंहनाद, सेवक आदि समाचार पत्रों का संपादन किया।
दरेसी पर ‘अचल भवन’ आज भी सेठजी की स्मृतियों को ताजा करता है। सेठजी का निधन 20 दिसंबर 1983 को हो गया था।
नैतिकता का दिया संदेश
सेठ अचल सिंह ने नैतिकता का स्वयं पालन किया और जीवन भर इसकी प्रेरणा वे सभी को देते रहे। उनकी इसी प्रेरणा से अचल ट्रस्ट द्वारा शहर के नैतिक सदाचारी व्यकित्वों को प्रतिवर्ष सम्मानित किया जाता रहा है।

-राजीव अग्रवाल, मंत्री-अचल ट्रस्ट, आगरा
मथुरा रिफाइनरी सेठ जी की देन
सेठ अचल सिंह की इच्छा थी कि ऱिफाइनरी आगरा में स्थापित हो, लेकिन ताजमहल को प्रदूषण से बचाने के उद्देश्य से यहां इस प्रकार के कोई उद्य़ोग या फैक्ट्री नहीं लग सकती थी। इसलिए उन्होंने प्रबल पैरवी करते हुए इसको मथुरा में स्थापित कराया था। दक्षिण भारतीय नेता अपने प्रदेश में इसको स्थापित करना चाहते थे, लेकिन सेठजी के मजबूत प्रयासों से यह संभव नहीं हो सका।

-मनोज बोहरा, सेठजी के प्रपौत्र एवं सदस्य-उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी।Bottom of Form
-प्रस्तुति-आदर्श नंदन गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार