सड़कों पर ‘मौत की रफ्तार’ पर सुप्रीम प्रहार, ट्रैकिंग डिवाइस से लेकर स्पीड गवर्नर तक सरकारों को कड़े आदेश

सर्वोच्च न्यायालय ने देश में बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं और हर वर्ष होने वाली लगभग 1.80 लाख मौतों पर गंभीर चिंता जताते हुए केंद्र व राज्य सरकारों को सार्वजनिक वाहनों में वाहन ट्रैकिंग डिवाइस (वीएलटीडी) और पैनिक बटन अनिवार्य रूप से लगाने, सभी परिवहन वाहनों में स्पीड गवर्नर सुनिश्चित करने तथा छह वर्षों से लंबित राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड (एनआरएसबी) का गठन तीन माह में पूरा करने के निर्देश दिए हैं।

May 14, 2026 - 09:43
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सड़कों पर ‘मौत की रफ्तार’ पर सुप्रीम प्रहार, ट्रैकिंग डिवाइस से लेकर स्पीड गवर्नर तक सरकारों को कड़े आदेश

आगरा/नई दिल्ली। भारत की सड़कों पर हर वर्ष होने वाली लगभग 1.80 लाख मौतों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने बेहद कड़ा हस्तक्षेप करते हुए केंद्र एवं राज्य सरकारों को स्पष्ट संदेश दिया है कि अब सड़क सुरक्षा के नियम केवल फाइलों में नहीं चलेंगे, बल्कि जमीन पर लागू होंगे। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने 13 मई 2026 को हुई महत्वपूर्ण सुनवाई में सार्वजनिक वाहनों में वाहन ट्रैकिंग डिवाइस (वीएलटीडी), पैनिक बटन, स्पीड गवर्नर और राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड के गठन को लेकर कई बाध्यकारी निर्देश जारी किए।

न्यायालय ने साफ कहा कि सड़क सुरक्षा कोई सरकारी औपचारिकता नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन के अधिकार से जुड़ा प्रश्न है। करीब एक घंटे से अधिक चली सुनवाई में अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता के.सी. जैन स्वयं उपस्थित हुए, जबकि न्यायालय द्वारा नियुक्त न्यायमित्र वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने भी पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने देश की सड़क व्यवस्था की भयावह तस्वीर पर गंभीर चिंता जताई।

सुनवाई में सार्वजनिक वाहनों में महिलाओं और यात्रियों की सुरक्षा का मुद्दा अत्यंत गंभीरता से उठा। न्यायालय के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि आज भी देश के 99 प्रतिशत से अधिक सार्वजनिक वाहन बिना ट्रैकिंग डिवाइस और पैनिक बटन के चल रहे हैं। ऐसी स्थिति में किसी बस का रास्ता बदल जाए, चालक संपर्क तोड़ दे या कोई आपात स्थिति उत्पन्न हो जाए तो यात्रियों के परिवार पूरी तरह असहाय हो जाते हैं।

न्यायालय को बताया गया कि वाहन स्थान ट्रैकिंग डिवाइस जीपीएस आधारित प्रणाली है, जो वाहन की लोकेशन को नियंत्रण केंद्र तक निरंतर भेजती रहती है, जबकि पैनिक बटन दबाते ही पुलिस नियंत्रण कक्ष और महिला सुरक्षा केंद्र को तत्काल अलर्ट पहुंचता है। निर्भया सुरक्षा ढांचे के अंतर्गत कई राज्यों में यह प्रणाली पहले ही प्रभावी साबित हो चुकी है।

सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के नियम 125H का हवाला देते हुए कहा कि नए और पुराने दोनों प्रकार के सार्वजनिक सेवा वाहनों में वीएलटीडी और पैनिक बटन की स्थापना अनिवार्य रूप से सुनिश्चित की जाए। न्यायालय ने निर्देश दिए कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 56 के अंतर्गत फिटनेस प्रमाण पत्र तभी जारी होगा, जब वाहन पोर्टल पर वीएलटीडी की स्थापना और उसकी कार्यशीलता सत्यापित हो। धारा 66 के तहत परमिट भी बिना ट्रैकिंग सत्यापन के जारी नहीं होगा।

आदेश के अनुसार 31 दिसंबर 2018 तक पंजीकृत पुराने वाहनों में भी रेट्रोफिटिंग अनिवार्य होगी। वीएलटीडी को वाहन डेटाबेस से जोड़ा जाएगा ताकि वास्तविक समय में निगरानी संभव हो सके। साथ ही केंद्र सरकार वाहन निर्माताओं को निर्माण स्तर पर ही ट्रैकिंग डिवाइस लगाने के बाध्यकारी निर्देश जारी करेगी।

सुनवाई में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि देश के 2.18 करोड़ परिवहन वाहनों में से केवल 10.70 लाख वाहनों में ही स्पीड लिमिटिंग डिवाइस (एसएलडी) लगे हैं। अर्थात 95 प्रतिशत से अधिक परिवहन वाहन बिना गति नियंत्रण के सड़कों पर दौड़ रहे हैं। न्यायालय ने इसे अत्यंत गंभीर स्थिति बताते हुए कहा कि अत्यधिक गति सड़क दुर्घटनाओं का सबसे बड़ा कारण है और राज्यों की लापरवाही सीधे हजारों मौतों के लिए जिम्मेदार बन रही है। न्यायालय ने निर्देश दिए कि सभी वाहन निर्माताओं को निर्माण अथवा वितरण के समय ही SLD लगाना अनिवार्य किया जाए।

आदेश के अनुसार राज्यों को वाहन आधारित सत्यापित आंकड़ों सहित विस्तृत शपथपत्र दाखिल करना होगा। नियम 118 का उल्लंघन करने वाले वाहनों को फिटनेस प्रमाण पत्र देने से इनकार करने पर विचार किया जाए तथा धारा 53 के तहत पंजीकरण निलंबन की कार्रवाई भी की जाए। एएनपीआर कैमरों और फास्टैग डेटा आधारित तकनीकी प्रवर्तन योजना प्रस्तुत करने के भी आदेश दिए गए हैं। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को 100 प्रतिशत अनुपालन हेतु राष्ट्रीय कार्य योजना न्यायालय में दाखिल करनी होगी।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा 215B के तहत गठित होने वाला राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड पिछले छह वर्षों से केवल कागजों में मौजूद है। न अध्यक्ष, न सदस्य, न कार्यालय और न ही कोई आधिकारिक व्यवस्था। न्यायालय ने इसे गंभीर प्रशासनिक विफलता करार देते हुए केंद्र सरकार को अंतिम अवसर के रूप में केवल तीन महीने का समय दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अब और देरी स्वीकार नहीं की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 3 सितंबर 2026 को होगी।

सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने सड़क दुर्घटनाओं की जड़ पर भी सीधी टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि भारत में लेन अनुशासन की स्थिति बेहद खराब है। चालक बिना नियमों के लेन बदलते हैं, बीच सड़क पर वाहन चलाते हैं और ओवरटेकिंग के दौरान जानलेवा हादसे होते हैं। न्यायालय ने कहा कि समस्या केवल प्रवर्तन की नहीं, बल्कि प्रशिक्षण और जागरूकता की भी है। अधिकांश चालकों को लेन अनुशासन का महत्व तक नहीं सिखाया जाता।

अधिवक्ता के.सी. जैन ने न्यायालय के समक्ष सुझाव दिया कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 136A और नियम 167A के तहत इलेक्ट्रॉनिक प्रवर्तन प्रणाली में लेन उल्लंघन को भी शामिल किया जाए। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित कैमरे स्वतः लेन उल्लंघन पहचान सकते हैं, वाहन नंबर रिकॉर्ड कर सकते हैं और तत्काल चालान जारी कर सकते हैं। फास्टैग और वाहन डेटाबेस से एकीकृत यह प्रणाली सड़क सुरक्षा में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। न्यायालय ने इस सुझाव को गंभीरता से लिया।

सुनवाई के बाद अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता के.सी. जैन ने कहा कि आज का दिन भारत की सड़क सुरक्षा के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा। वर्षों से हम कह रहे थे कि वीएलटीडी और पैनिक बटन जीवनरक्षक हैं, स्पीड गवर्नर अनिवार्य है और राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड का गठन तत्काल होना चाहिए। अब सरकारों के पास कोई बहाना नहीं बचा है। यह राजनीति का नहीं, हर भारतीय के जीवन के अधिकार का प्रश्न है।

SP_Singh AURGURU Editor