पर्यावरण संरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय का कड़ा संदेश: टीटीजेड क्षेत्र में एक उद्योग सख्त शर्तों के साथ मिली स्थानांतरण की अनुमति, 1984 की एम.सी. मेहता याचिका के लंबित आवेदनों के निस्तारण की प्रक्रिया तेज
आगरा/नई दिल्ली। पर्यावरण संरक्षण और ताज ट्रेपेज़ियम जोन (टीटीजेड) से जुड़े बहुचर्चित मामले एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ एवं अन्य में सर्वोच्च न्यायालय ने विगत 23 फरवरी 2026 को एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए कई अंतरिम आवेदनों पर स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया है। न्यायालय ने जहां एक ओर फर्जी और अनधिकृत गतिविधियों पर अप्रत्यक्ष रूप से कड़ा संदेश दिया, वहीं दूसरी ओर नियमों के भीतर उद्योग स्थानांतरण को सशर्त अनुमति देकर संतुलित दृष्टिकोण भी अपनाया।
न्यायालय ने आईए संख्या 16582/2026 पर विचार करते हुए राजस्थान चर्मकला केंद्र द्वारा दायर उस आवेदन को स्वीकार कर लिया, जिसमें पूर्व में दाखिल आईए संख्या 68382-68384/2025 को वापस लेने की अनुमति मांगी गई थी। इन आवेदनों के माध्यम से उद्योग की निजी संपत्ति तक आने-जाने के लिए 79 पेड़ों की कटाई की अनुमति मांगी गई थी।
इस बारे में केंद्रीय सशक्त समिति (सीईसी) की रिपोर्ट संख्या 59/2025 में यह स्पष्ट किया गया कि याचिकाकर्ता की संपत्ति तक वैकल्पिक मार्ग पहले से उपलब्ध था। साथ ही, यह भी सामने आया कि अगस्त 2023 में वन क्षेत्र में अतिक्रमण कर सीमा चिह्नों को नुकसान पहुंचाया गया था, जिस पर वन अपराध रिपोर्ट दर्ज हुई और बाद में एक लाख रुपये के जुर्माने के भुगतान पर मामला निस्तारित किया गया।
इन तथ्यों के आधार पर सीईसी ने अनुमति देने की सिफारिश नहीं की थी। न्यायालय ने माना कि अब चूंकि आवेदक स्वयं पेड़ कटाई की अनुमति पर जोर नहीं दे रहा है, इसलिए आवेदन वापस लेने में कोई बाधा नहीं है, हालांकि यह आदेश भविष्य में विधि अनुसार होने वाली किसी भी कार्रवाई को प्रभावित नहीं करेगा।
इसी आदेश में आईए संख्या 15396/2026 एवं 19589/2026 पर नोटिस जारी करते हुए न्यायालय ने सीईसी और एमिकस क्यूरी को सॉफ्ट कॉपी उपलब्ध कराने और 13 अप्रैल 2026 को मामले की अगली सुनवाई सूचीबद्ध करने के निर्देश दिए।
एक अन्य अहम हिस्से में न्यायालय ने एम/एस सुपर ग्लास वर्क द्वारा दायर आईए संख्या 281016-281017/2024 पर विचार करते हुए उद्योग स्थानांतरण को लेकर बड़ा फैसला सुनाया। फिरोजाबाद स्थित इस कांच निर्माण इकाई को रानीवाला कंपाउंड से जलेसर रोड स्थित नई साइट पर स्थानांतरित करने की अनुमति दी गई। सीईसी की रिपोर्ट संख्या 3/2026 में स्पष्ट किया गया कि यह न तो नया उद्योग है और न ही विस्तार, बल्कि केवल स्थानांतरण है, जो न्यायालय के पूर्व आदेशों के अनुरूप है।
हालांकि न्यायालय ने शर्तें भी स्पष्ट कीं। उत्पादन क्षमता नहीं बढ़ेगी, केवल प्राकृतिक गैस का उपयोग होगा, पुरानी इकाई पूरी तरह बंद होने के बाद ही नई इकाई चालू होगी और सभी पर्यावरणीय नियमों का सख्ती से पालन किया जाएगा। स्थानांतरण के चार सप्ताह के भीतर अनुपालन शपथपत्र दाखिल करने के भी निर्देश दिए गए।
मुख्य रिट याचिका पर टिप्पणी करते हुए न्यायालय ने कहा कि वर्ष 1984 से लंबित इस मामले में पर्यावरण संरक्षण और टीटीजेड से जुड़े सिद्धांत पहले ही स्थापित हो चुके हैं, लेकिन लगातार नए अंतरिम आवेदनों के कारण मूल याचिकाएं तकनीकी रूप से लंबित बनी रहती हैं। इसी को देखते हुए रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि रिट याचिका (सिविल) संख्या 13381/1984 को 10 मार्च 2026 को केवल लंबित आवेदनों की पहचान और प्रभावी निस्तारण के उद्देश्य से सूचीबद्ध किया जाए। साथ ही सॉलिसिटर जनरल, राज्यों के महाधिवक्ताओं और वरिष्ठ अधिवक्ताओं से यह सुझाव देने को कहा गया कि इन पुराने मामलों को किस प्रकार पुनः शीर्षकित कर अंतिम रूप दिया जाए या आवश्यकतानुसार उच्च न्यायालयों को भेजा जाए।
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश पर्यावरण कानून, औद्योगिक गतिविधियों और न्यायिक प्रक्रिया, तीनों के संतुलन की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।