ताज महोत्सव: पर्यटन संवर्धन का महापर्व या सीमित वर्ग के मनोरंजन का मंच, पुनर्विचार और पुनर्रचना की ज़रूरत
ताज महोत्सव की मूल परिकल्पना और वर्तमान स्वरूप के बीच अंतर बढ़ता ही जा रहा है। ताज महोत्सव अब पर्यटन संवर्धन की बजाय सीमित लाभ वाला स्थानीय मेला बनता जा रहा है। इस महोत्सव को राज्य सरकार के सहयोग के साथ ही दीर्घकालिक पर्यटन योजना, व्यापक प्रचार और क्षेत्रीय पर्यटन सर्किट से जोड़ने की जरूरत है, ताकि ताज महोत्सव वास्तव में आगरा और प्रदेश की सांस्कृतिक-आर्थिक पहचान को सशक्त बना सके।
सन 1992 में, जहाँ तक स्मरण है, उत्तर प्रदेश सरकार के सांस्कृतिक एवं मनोरंजन विभाग ने ताज महोत्सव की परिकल्पना एक दूरदर्शी सोच के साथ की थी। इसका उद्देश्य पर्यटन के पीक सीज़न फरवरी में प्रदेश के उद्यमियों, कारीगरों और कलाकारों को एक वैश्विक मंच उपलब्ध कराना था। योजना यह थी कि विश्व के अन्य देशों में होने वाले सांस्कृतिक उत्सवों की तरह ताज महोत्सव का वर्ष भर प्रचार किया जाए, ताकि देसी और विदेशी पर्यटकों को आकर्षित किया जा सके। इसके माध्यम से आगरा के ऐतिहासिक स्थलों के साथ-साथ हस्तकला, लोककला और मनोरंजन के विविध माध्यमों को जोड़ा जाए, जिससे शहर, मंडल और प्रदेश की अर्थव्यवस्था एवं जीडीपी को सशक्त बनाया जा सके।
दुर्भाग्यवश, बीते कई वर्षों में ताज महोत्सव का स्वरूप उस मूल उद्देश्य से भटकता हुआ दिखाई देता है। यह आयोजन अब पर्यटन संवर्धन के महोत्सव की बजाय, स्थानीय आगरा निवासियों के लिए एक सामान्य मेले के रूप में सिमट कर रह गया है। स्टॉल लगाने वाले कारीगरों, हस्तशिल्पियों और खान-पान से जुड़े व्यवसायियों की मानें तो उन्हें अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिल पा रहा। इस वर्ष स्थान परिवर्तन और अत्यधिक विस्तार के कारण शहर भर में यातायात जाम की स्थिति बनी रही, जिससे न केवल स्थानीय नागरिकों का उत्साह प्रभावित हुआ बल्कि आयोजनों में सहभागिता भी सीमित रह गई।
कई स्टॉल धारकों और प्रतिभागियों का यह साझा मत है कि इस बार उन्हें भारी घाटे का सामना करना पड़ सकता है। यह स्थिति गंभीर चिंतन की मांग करती है। आगरा के प्रबुद्ध नागरिकों, व्यापारिक-सामाजिक संगठनों और चिंतनशील मीडिया को मिलकर यह प्रश्न उठाना होगा कि क्या ताज महोत्सव को लखनऊ महोत्सव की तर्ज़ पर राज्य सरकार से अधिक संगठित और ठोस सहायता नहीं मिलनी चाहिए? क्या इसे भारत के अन्य सफल सांस्कृतिक उत्सवों की तरह पुनर्जीवित, पुनर्गठित और पुनर्परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए?
यदि ताज महोत्सव को वास्तव में देसी और विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाना है, तो इसकी योजना को चंबल अंचल से लेकर ब्रजमंडल तक के पर्यटन सर्किट से जोड़ना होगा। ऐसी रणनीति बनानी होगी जिससे पर्यटक केवल कुछ घंटों के लिए नहीं, बल्कि ठहरकर आगरा की संस्कृति, विरासत और मेहमाननवाज़ी का अनुभव करें। यह आयोजन तभी एक मील का पत्थर बन सकेगा, जब इसके लिए राज्य सरकार, संस्कृति विभाग, पर्यटन विभाग, पर्यटन वेबसाइट्स और निजी क्षेत्र के सहयोग से गहन अध्ययन कर दीर्घकालिक योजना तैयार की जाए।
आगरा के नागरिक के रूप में यह विश्वास करना कठिन है कि स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर के मीडिया ने इस आयोजन को पूरी गंभीरता से देखा-परखा नहीं होगा। चार दशकों के अनुभव और तुलनात्मक अध्ययन मीडिया के पास हैं, फिर भी राष्ट्रीय स्तर पर ताज महोत्सव का अपेक्षित प्रचार सीमित ही रहा है।
यह सब लिखने के पीछे किसी आरोप का नहीं, बल्कि आत्ममंथन और सकारात्मक पहल का आह्वान है। यदि यह विचार सार्थक प्रतीत हो, तो आगरा को एक ऐसा ताज महोत्सव दिलाने का प्रयास किया जाए जो वास्तव में पर्यटन, संस्कृति और आर्थिक समृद्धि का प्रतीक बन सके, न कि केवल औपचारिकता का उत्सव।
-राजीव गुप्ता, जनस्नेही कलम से-
लोक स्वर, आगरा।
Top of Form