आस्था, संस्कृति और जीवनरेखा के पतन की त्रासदी: ब्रज मंडल में यमुना की कराह, जहरीला होता जल, टूटता पर्यावरण और दशकों से चले आ रहे खोखले वादों की भयावह सच्चाई
ब्रज मंडल में यमुना नदी की पर्यावरणीय स्थिति निरंतर भयावह होती जा रही है। प्रदूषण, सीवेज और औद्योगिक कचरे ने नदी को लगभग मृत बना दिया है। करोड़ों खर्च होने के बावजूद यमुना एक्शन प्लान जमीनी स्तर पर विफल रहा। प्राकृतिक प्रवाह के अभाव और कमजोर निगरानी ने संकट को और गहरा किया है। यमुना का संकट अब केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक चुनौती बन चुका है।
Top of Form
-बृज खंडेलवाल-
कभी जिसके तट पर बंसी बजी थी, आज वहीं सन्नाटा है। कभी जिसके जल में आस्था डुबकी लगाती थी, आज वही जल ज़हर बन चुका है। ब्रज मंडल की जीवनरेखा कही जाने वाली यमुना आज अपने अस्तित्व की जंग लड़ रही है। नदी नहीं, नाला दिखती है। पानी नहीं, काला, बदबूदार, झाग से भरा तरल बहता है। तस्वीरें चीख रही हैं। सच सामने है। सवाल सिर्फ एक है, क्या हम सचमुच यमुना को बचाना चाहते हैं?
हाल की रिपोर्टों ने साफ कहा- “प्रदूषण से दम घोंटती यमुना नदी।” दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) की नवंबर और दिसंबर 2025 की रिपोर्ट्स के अनुसार, यमुना में फेकल कोलीफॉर्म का स्तर 92,000 तक पहुंच गया है, जो सुरक्षित सीमा (2,500) से 37 गुना अधिक है।
नदी दम तोड़ रही है। उसे ड्रेन में बदल दिया गया है। यह केवल पर्यावरण का संकट नहीं, यह जनस्वास्थ्य पर सीधा हमला है। नदी के पानी में घुलित ऑक्सीजन का स्तर खतरनाक रूप से गिर चुका है। टॉक्सिक झाग सतह पर तैरते हैं। बदबू इतनी तीखी कि किनारे खड़ा रहना मुश्किल हो जाए। एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि यमुना में माइक्रोप्लास्टिक की सांद्रता प्री-मॉनसून (मई-जून 2024) में औसतन 6,375 कण प्रति घन मीटर थी, जो पोस्ट-मॉनसून (दिसंबर 2024-जनवरी 2025) में घटकर 3,080 रह गई, लेकिन फिर भी खतरनाक स्तर पर है।
इसके अलावा, अमोनिया का स्तर 27.4 mg/L तक पहुंच गया है, जो जल उपचार संयंत्रों को बंद करने पर मजबूर कर रहा है। (बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड) 70 mg/L है, जबकि जीवन समर्थन के लिए यह 3 mg/L से कम होना चाहिए।
आगरा और ब्रज क्षेत्र में यमुना की हालत किसी से छिपी नहीं। “यमुना पॉल्यूशन: आगरा लूज़ेज़ आउट ऑन द एनवायरनमेंट फ्रंट”, यह हेडलाइन केवल खबर नहीं, चेतावनी है।
वर्षों से वादे होते रहे। यमुना एक्शन प्लान के बड़े-बड़े दावे किए गए। करोड़ों रुपये खर्च हुए। लेकिन नदी का रंग और गंध दोनों बदलते गए। सुधार नहीं हुआ।
यमुना एक्शन प्लान के तहत शहर के सीवेज को रोकने, ट्रीटमेंट प्लांट लगाने और औद्योगिक अपशिष्ट को नियंत्रित करने की योजनाएं बनीं। कागज़ों पर सब ठीक था। जमीन पर हालात जुदा निकले। कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट या तो अधूरे हैं, या क्षमता से कम काम कर रहे हैं। नालों का गंदा पानी बिना उपचार सीधे नदी में गिर रहा है। यमुना एक्शन प्लान के तीसरे चरण (2018 से) में 11 परियोजनाएं शुरू की गईं, जिनमें सीवर रिहैबिलिटेशन, टर्सियरी ट्रीटमेंट प्लांट और ओखला, रिठाला, कोन्डली जैसे क्षेत्रों में सीवरेज प्रोजेक्ट शामिल हैं, लेकिन प्रदूषण स्तर में कोई खास कमी नहीं आई।
दिल्ली में रोजाना 28 मिलियन गैलन अनुपचारित या आंशिक रूप से उपचारित अपशिष्ट जल नदी में गिरता है। एक रिपोर्ट में साफ कहा गया कि नदी एक विशाल सीवर नहर में तब्दील हो चुकी है।
यह केवल शब्द नहीं, यथार्थ है। दिल्ली से लेकर मथुरा और आगरा तक, नदी रास्ते भर गंदगी ढोती चलती है। ब्रज मंडल में प्रवेश करते-करते वह थक चुकी होती है।
नदी के किनारों पर कपड़े धोते लोग, मवेशी, प्लास्टिक कचरा, औद्योगिक रसायन, सब मिलकर इस पवित्र धारा को जहरीला बना चुके हैं। यह पानी न पीने योग्य है, न खेती के लिए सुरक्षित। भूजल भी प्रभावित हो रहा है। दिल्ली में भूजल में माइक्रोप्लास्टिक का औसत स्तर 1,200 कण प्रति घन मीटर है।
हाल ही में विश्व जल दिवस पर एक सवाल उठा- “कैन यमुना बी सेव्ड?” यह सवाल हर साल उठता है। रैलियां निकलती हैं। एनजीओ जागरूकता अभियान चलाते हैं। बच्चे पोस्टर बनाते हैं, लेकिन सिस्टम की नींद गहरी है। पर्यावरण कार्यकर्ता जो रिवर कनेक्ट कैंपेन से जुड़े हैं, कहते हैं, “यमुना आगरा में वस्तुतः मृत है। सूखा नदी तल और अत्यधिक प्रदूषित पानी नदी के किनारे ऐतिहासिक स्मारकों के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है।”
डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं, “पवित्र ब्रज क्षेत्र अपनी जीवनरेखा, अपनी आत्मा के दर्दनाक अंत का साक्षी बन रहा है, जो दशकों की सरकारी उदासीनता और टूटे वादों की श्रृंखला से घुट रही है। कभी जीवंत घाट, जो तीर्थयात्रियों की भक्ति और नाविकों की जीवंत बातचीत से गूंजते थे, अब उजाड़ खंडहरों के रूप में खड़े हैं, जो नदी को एक विषाक्त, सड़ते घाव में बदलने के मूक साक्षी हैं।”
हकीकत यह है कि नदी का प्राकृतिक प्रवाह भी बाधित है। ऊपरी बैराजों से पानी का प्रवाह सीमित कर दिया जाता है। जब पर्याप्त पानी ही नहीं बहेगा, तो आत्मशुद्धि की क्षमता कैसे बचेगी? नदी को जीवित रहने के लिए न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह चाहिए। वह नहीं मिल रहा।
औद्योगिक इकाइयां भी कम दोषी नहीं। नियम हैं, लेकिन निगरानी ढीली है। अवैध डिस्चार्ज जारी है। केमिकल्स और भारी धातुएँ पानी में घुलती रहती हैं। प्रशासन नोटिस देता है। फिर खामोशी छा जाती है। दिल्ली में 58% अपशिष्ट नदी में डाला जाता है।
सवाल उठता है, इतने वर्षों में बदला क्या? जवाब कड़वा है, लगभग कुछ नहीं।
यमुना एक्शन प्लान का तीसरा चरण भी उम्मीद जगाने में असफल रहा। योजनाओं में पारदर्शिता का अभाव रहा। स्थानीय समुदाय को निर्णय प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया। निगरानी तंत्र कमजोर रहा। परिणाम, नदी की हालत जस की तस, बल्कि और बदतर।
ब्रज मंडल का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अस्तित्व यमुना से जुड़ा है। वृंदावन, मथुरा, गोकुल: इन सबकी आत्मा यमुना में बसती है। जब नदी बीमार है, तो संस्कृति भी बीमार हो जाती है। श्रद्धालु किनारे खड़े होकर आरती तो करते हैं, लेकिन जल को छूने से डरते हैं। यह विडंबना नहीं तो क्या है?
पर्यावरण विशेषज्ञ वर्षों से चेतावनी दे रहे हैं कि यदि अभी कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो नदी का पुनर्जीवन लगभग असंभव हो जाएगा। केवल ट्रीटमेंट प्लांट बनाना काफी नहीं। उनका नियमित रखरखाव जरूरी है। अवैध नालों को तत्काल बंद करना होगा। औद्योगिक प्रदूषण पर सख्त कार्रवाई करनी होगी।
सबसे महत्वपूर्ण; नदी को उसका प्रवाह लौटाना होगा। बिना पानी के नदी नहीं बचती।
लेकिन प्रशासनिक इच्छाशक्ति कहाँ है? योजनाएँ घोषणाओं तक सीमित क्यों रह जाती हैं? क्यों हर बार नई परियोजना पुराने वादों की कब्र पर खड़ी होती है?
यमुना का संकट केवल पर्यावरणीय नहीं, नैतिक संकट भी है। हमने विकास के नाम पर नदी का गला घोंट दिया। शहरों का सीवर, उद्योगों का कचरा, हमारी लापरवाही: सबने मिलकर इसे बीमार कर दिया।
ब्रज मंडल में आज यमुना की जो तस्वीर है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए शर्मनाक विरासत होगी।
फिर भी उम्मीद पूरी तरह मरी नहीं है। स्थानीय समूहों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जागरूक नागरिकों ने समय-समय पर आवाज उठाई है। लेकिन उनकी आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुँचते-पहुँचते कमजोर पड़ जाती है। रिवर कनेक्ट कैंपेन, यमुना को बचाने के लिए निरंतर प्रयासरत है। कैंपेन की मांगें : बैराज निर्माण, न्यूनतम जल प्रवाह सुनिश्चित करना, घाटों की सफाई, प्रदूषकों पर कार्रवाई और नदी तल की ड्रेजिंग।
अब जरूरत है कि यमुना को केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, जीवित पारिस्थितिकी तंत्र माना जाए। उसे कानूनी अधिकार दिए जाएँ। निगरानी स्वतंत्र एजेंसियों को सौंपी जाए। और सबसे बढ़कर: जनभागीदारी को केंद्र में रखा जाए।Top of Form