अमेरिका–इज़राइल–ईरान संघर्ष: शक्ति संतुलन, विचारधारा और बदलती विश्व व्यवस्था
अमेरिका–इज़राइल–ईरान संघर्ष केवल सैन्य टकराव नहीं, बल्कि मध्य-पूर्व में शक्ति संतुलन, विचारधारा और वैश्विक राजनीति का परिणाम है। इसकी जड़ें 1979 की ईरानी इस्लामिक क्रांति, इज़राइल के अस्तित्व के प्रश्न और क्षेत्रीय वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा में हैं। तेल, डॉलर व्यवस्था, प्रॉक्सी युद्ध, खुफिया तंत्र और आधुनिक तकनीकें इस संघर्ष को और जटिल बनाती हैं। यह टकराव उभरती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में वैश्विक शक्ति पुनर्संतुलन की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
-पूरन डावर-
मानव इतिहास का कोई भी युग ऐसा नहीं रहा जिसमें युद्ध और संघर्ष न हुए हों। जब तक मानव चेतना अपने सर्वोच्च आंतरिक विकास तक नहीं पहुंचती, तब तक भू-राजनीतिक टकराव बने रहेंगे। और यह भी निश्चित नहीं कि तब भी वे पूरी तरह समाप्त हो जाएं। सतयुग, त्रेता और द्वापर में भी संघर्ष हुए हैं। कलियुग में वे और अधिक जटिल, बहुस्तरीय और गहरे हो चुके हैं।
आज के युद्धों को केवल दो देशों के बीच भूमि या संसाधनों के विवाद के रूप में देखना वास्तविकता को सरल बना देना होगा। रूस–यूक्रेन युद्ध हो, लैटिन अमेरिका के कुछ हिस्सों (जैसे वेनेजुएला) में अमेरिकी हस्तक्षेप हो, या ग्रीनलैंड में रणनीतिक रुचि, ये सभी व्यापक वैश्विक शक्ति संतुलन की प्रक्रिया का हिस्सा हैं। यह शीत युद्ध की निरंतरता, वैश्विक सत्ता संरचना में बदलाव और नई विश्व व्यवस्था के निर्माण की ओर संकेत करते हैं।
विश्व शांति को यदि समुद्र के रूपक से समझा जाए तो वह शांत दिखाई देता है, लेकिन उसके भीतर लहरें लगातार उठती और गिरती रहती हैं। कभी-कभी अम्फान जैसे चक्रवात, तूफान या सुनामी भी आती हैं। वैश्विक राजनीति भी इसी प्रकार स्थिरता और उथल-पुथल के चक्र से गुजरती रहती है।
वर्तमान अमेरिका–इज़राइल–ईरान संघर्ष को केवल भावनात्मक या सतही दृष्टि से देखना पर्याप्त नहीं है। विशेषकर भारत जैसे देशों में, जहां वैश्विक घटनाओं पर तीव्र प्रतिक्रियाएं आम हैं, वहां आवश्यक है कि हम गहरे संरचनात्मक कारणों को समझें।
संघर्ष के मूल कारण- मध्य-पूर्व और शक्ति संतुलन
मध्य-पूर्व दशकों से वैश्विक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र रहा है। इज़राइल को स्वीकार न करना, इस्लामिक क्रांति की विरासत, शिया–सुन्नी विभाजन, प्रॉक्सी युद्ध और वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेल की केंद्रीय भूमिका, ये सभी इस क्षेत्र को अस्थिर बनाए रखते हैं। तेल व्यापार में अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्व, जिसे पेट्रोडॉलर प्रणाली कहा जाता है, लंबे समय से अमेरिकी भू-राजनीतिक प्रभाव का आधार रहा है। इसी के सहारे अमेरिका ने ऊर्जा, रक्षा और अंतरिक्ष तकनीक में बढ़त हासिल की।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
द्वितीय विश्व युद्ध और यहूदी इतिहास अपने आप में एक स्वतंत्र और जटिल विषय है। इज़राइल की स्थापना 1948 में हुई, जिसे कई खाड़ी देशों ने प्रारंभ में मान्यता नहीं दी। ईरान को शिया इस्लाम का केंद्र माना जाता है, जबकि सऊदी अरब सुन्नी नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करता है।
एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 1979 से पहले, शाह के शासनकाल में ईरान और इज़राइल के बीच अच्छे संबंध थे और खुफिया सहयोग भी था। लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति ने ईरान की विदेश नीति को पूरी तरह बदल दिया। नई सत्ता ने इज़राइल विरोध को वैचारिक आधार बनाया और तथाकथित ज़ायोनिस्ट शासन के अंत को अपना लक्ष्य घोषित किया।
ईरान की रणनीतिक भूमिका
आयतुल्ला खामेनेई के नेतृत्व में ईरान की नीति चार मुख्य बिंदुओं पर केंद्रित रही है। ये हैं- इज़राइल के अस्तित्व का विरोध, हिज़्बुल्लाह और हमास जैसे संगठनों का समर्थन, मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम का विकास, तथा सीरिया, लेबनान और गाज़ा में क्षेत्रीय प्रभाव का विस्तार। इज़राइल इन सभी को अपने अस्तित्व के लिए संभावित खतरे के रूप में देखता है।
इस संघर्ष का मूल प्रश्न इज़राइल के अस्तित्व के अधिकार से जुड़ा है, जो विश्व का एकमात्र यहूदी-बहुल राष्ट्र है। इज़राइल की सुरक्षा नीति संभावित अस्तित्वगत खतरों को उनके पूर्ण रूप लेने से पहले ही निष्क्रिय करने पर आधारित है।
इज़राइल का सुरक्षा मॉडल
अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए इज़राइल ने प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मिसाइल रक्षा प्रणाली (जैसे आयरन डोम), उन्नत चिकित्सा और नागरिक सुरक्षा तंत्र तथा विश्वस्तरीय खुफिया क्षमताएँ विकसित की हैं। इसकी रणनीति में पूर्व-प्रहार (प्री-एम्पटिव एक्शन) को केंद्रीय स्थान प्राप्त है। अमेरिका के निरंतर समर्थन से इसकी प्रतिरोधक क्षमता और मजबूत हो जाती है। भारत जैसे देश भी आतंकवाद-रोधी सहयोग में इज़राइल को एक प्रभावी साझेदार मानते हैं।
हालिया घटनाक्रम और व्यापक संदर्भ
ईरानी ठिकानों पर इज़राइल और अमेरिका की हालिया कार्रवाइयों को 1979 से चली आ रही शत्रुता, ईरान के भीतर राजनीतिक असंतोष और इज़राइल की रणनीतिक नीति के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। रिपोर्टों के अनुसार, इन अभियानों में उन्नत खुफिया समन्वय और ईरान की आंतरिक कमजोरियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यह संघर्ष केवल सैन्य टकराव नहीं है। यह बदलते वैश्विक गठबंधनों, क्षेत्रीय प्रभुत्व की होड़, वैचारिक टकराव, ऊर्जा सुरक्षा, मुद्रा शक्ति और युद्ध की बदलती प्रकृति, जिसमें साइबर, खुफिया और एआई आधारित संघर्ष शामिल हैं, का प्रतिबिंब है। मध्य-पूर्व उभरती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का एक प्रमुख दबाव बिंदु बना हुआ है।
भू-राजनीति कभी भी सरल या एकरेखीय नहीं होती। यह परतदार, रणनीतिक और दीर्घकालिक प्रक्रिया है। अमेरिका–इज़राइल–ईरान संबंधों को समझने के लिए केवल तात्कालिक सुर्खियों पर नहीं, बल्कि इतिहास, विचारधारा, अर्थव्यवस्था, खुफिया तंत्र और वैश्विक शक्ति संरचना पर समग्र दृष्टि डालनी होगी। तभी यह आकलन संभव होगा कि ऐसे संघर्ष अस्थिरता की ओर ले जा रहे हैं या बदलती विश्व व्यवस्था में पुनर्संतुलन का संकेत हैं।
(लेखक प्रमुख उद्योगपति, विचारक एवं विश्लेषक हैं)