आगरा में पालीवाल पार्क का ऐतिहासिक होली मिलन इस साल आखिर क्यों हुआ गायब: दशकों पुरानी सर्वसमाज परंपरा पर प्रशासनिक खामोशी, सवालों के घेरे में नगर निगम और जिम्मेदार तंत्र

आगरा की सामाजिक और सांस्कृतिक स्मृतियों में पालीवाल पार्क का सर्वसमाज होली मिलन समारोह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि शहर की साझी विरासत का प्रतीक रहा है। होली के दूसरे दिन भैया दूज पर नगर महापालिका (वर्तमान नाम- नगर निगम) द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम वर्षों तक उस आगरा की पहचान बना रहा, जहां रंग-गुलाल के साथ समाज के हर वर्ग, हर संस्था और हर राजनीतिक दल के लोग एक मंच पर दिखाई देते थे।

Mar 8, 2026 - 13:11
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आगरा में पालीवाल पार्क का ऐतिहासिक होली मिलन इस साल आखिर क्यों हुआ गायब: दशकों पुरानी सर्वसमाज परंपरा पर प्रशासनिक खामोशी, सवालों के घेरे में नगर निगम और जिम्मेदार तंत्र
प्रदीप खंडेलवाल।

लेकिन इस वर्ष  होली के मौके पर यह परंपरा अचानक गायब हो गई। न कोई घोषणा, न कोई वैकल्पिक आयोजन, बस खामोशी। सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर ऐसी क्या परिस्थिति पैदा हो गई कि दशकों से चल रहा यह सार्वजनिक होली मिलन इस वर्ष नगर निगम की प्राथमिकताओं से बाहर हो गया।

कुछ वर्ष पहले उद्यान विभाग द्वारा होली मिलन समारोह के लिए मुख्य मैदान उपलब्ध न कराने की घटना भी सामने आई थी। तब नगर निगम को मजबूर होकर कार्यक्रम नगर निगम पुस्तकालय के सामने सड़क पर आयोजित करना पड़ा था। उस समय भी यह सवाल उठा था कि शहर की इतनी पुरानी परंपरा के साथ यह व्यवहार क्यों किया जा रहा है।

इस बार पालीवाल पार्क में होली मिलन समारोह न होने से शहरवासी आहत हैं। ऐसे ही लोगों में से एक, ईको क्लब, पालीवाल पार्क से जुड़े पर्यावरण प्रेमी और सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप खंडेलवाल का कहना है कि यह आयोजन किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि सर्वसमाज का साझा मंच रहा है। यहां शहर की सामाजिक संस्थाएं, विभिन्न समाजों के संगठन और सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपने-अपने पंडाल लगाते थे। रंगों के बहाने संवाद और सौहार्द का जो वातावरण बनता था, वह आगरा की सामाजिक एकता की मिसाल माना जाता था।

वे कहते हैं, ऐसे में इस वर्ष आयोजन का पूरी तरह गायब हो जाना केवल एक कार्यक्रम का रुकना नहीं, बल्कि एक सामाजिक परंपरा के कमजोर पड़ने का संकेत भी है। सवाल यह भी है कि यदि किसी कारणवश पार्क उपलब्ध नहीं था तो क्या नगर निगम कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं कर सकता था?

प्रदीप खंडेलवाल का सीधा सवाल है- क्या इस विषय पर नगर निगम प्रशासन, नगर आयुक्त, नगर प्रमुख या प्रदेश सरकार का कोई स्पष्ट पक्ष सामने आएगा? क्योंकि जब कोई परंपरा वर्षों तक सरकारी संरक्षण में चलती रही हो, तो उसके अचानक समाप्त होने पर जवाबदेही भी उसी स्तर पर अपेक्षित होती है।

होली का यह मिलन समारोह केवल रंगों का उत्सव नहीं था, यह शहर की सांस्कृतिक संवाद परंपरा का जीवंत उदाहरण था। यदि प्रशासनिक उदासीनता या समन्वय की कमी से ऐसी परंपराएं टूटती हैं, तो नुकसान केवल एक कार्यक्रम का नहीं, बल्कि शहर की सामाजिक आत्मा का होता है।

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एक ओर 60–70 वर्ष पुरानी सार्वजनिक हिंदू होली मिलन की परंपरा को तोड़ दिया गया, जबकि सत्ताधारी दल के सांसदों, विधायकों, मंत्रियों और भाजपा महानगर संगठन के अध्यक्ष सहित अन्य नेताओं ने अपने-अपने निजी होली मिलन समारोह आयोजित किए, जो पहले न कभी इतने अलग-अलग रूप में देखे गए, न सुने गए।

सवाल यही है कि जब सार्वजनिक सर्वसमाज होली मिलन की परंपरा मौजूद थी, तो उसे मजबूत करने के बजाय निजी आयोजन करने की होड़ क्यों लगी? फिर ऐसे में सार्वजनिक हिंदू होली मिलन और सामाजिक समरसता की याद आखिर क्यों और किसलिए दिलाई जाती है?

हालांकि आलोचनाओं के बाद नगर निगम अब होली मिलन समारोह की औपरिकता 11 मार्च को पूरी करने जा रहा है। इस दिन आवास विकास कॊलोनी में नगर निगम यह आयोजन कराने जा रहा है, लेकिन फिर सवाल वही उठता है कि पालीवाल पार्क में दशकों से चली आ रही परम्परा को क्यों तोड़ा गया?

आज जरूरत इस बात की है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस सवाल को हल्के में न लें। आगरा की सांस्कृतिक परंपराएं केवल स्मृतियों में नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में जीवित रहनी चाहिए और इसके लिए पहल भी उसी व्यवस्था को करनी होगी, जिसने कभी इन्हें शुरू किया था।

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SP_Singh AURGURU Editor