‘ऐसे वर को क्या वरूं जो जन्मे और मर जाए...’ बांके बिहारी संग विवाह की पहली वर्षगांठ पर भक्ति में विलीन हुईं इंदुलेखा
वृंदावन। ब्रजभूमि की पावन गलियों में रविवार को भक्ति, भाव और विश्वास का ऐसा संगम देखने को मिला, जिसने देखने-सुनने वालों को भीतर तक स्पर्श कर दिया। वृंदावन में इंदुलेखा ने ठाकुर बांके बिहारी जी के साथ अपने विवाह की पहली वर्षगांठ मनाई, पर यह कोई साधारण उत्सव नहीं, बल्कि आत्मा और आराध्य के शाश्वत प्रेम की गवाही बन गया।
इंदुलेखा ने बीते वर्ष 15 फ़रवरी को सामाजिक रूढ़ियों से परे जाकर ठाकुर बांके बिहारी को अपने पति रूप में स्वीकार किया था। वे बताती हैं कि इससे पहले उनका एक सांसारिक विवाह हुआ, जहां उन्हें सम्मान और अपनापन नहीं मिला। उसी पीड़ा से निकलकर उन्होंने उस प्रेम का वरण किया, जो नश्वर नहीं, बल्कि अमर है। मीराबाई के पद को स्मरण करते हुए वे भावुक स्वर में कहती हैं-
‘ऐसे वर को क्या वरूँ, जो जन्मे और मर जाए।
मैंने ऐसो वर चुनो, मेरो जन्म अमर कहाये।‘
इंदुलेखा का विश्वास है कि बांके बिहारी केवल उनके नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के पति हैं। सबके प्राणों के स्वामी, एक अगोचर शक्ति। जो लोग इस रिश्ते को नाटक या ढोंग कहते हैं, उनके लिए उनका उत्तर सीधा है- जा तन लागी, वही जाने...। प्रभु-प्रेम वही समझ सकता है, जिसके भीतर भक्ति जाग चुकी हो। वे कहती हैं कि संसार पति मिलने के बाद जीवन में किसी अभाव का अनुभव नहीं हुआ। घर का किराया हो या दैनिक आवश्यकताएं, उनका भरोसा है कि सब कुछ बिहारी जी स्वयं संभालते हैं।
इस वर्षगांठ को और भी पावन बनाया महाशिवरात्रि पर्व ने। इंदुलेखा पहले भगवान शिव की उपासक रहीं और उन्हें पिता रूप में मानती हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि शिव की कृपा से ही उन्हें बांके बिहारी पति रूप में प्राप्त हुए। जिस प्रकार शिव-पार्वती का दिव्य मिलन महाशिवरात्रि को हुआ, उसी पावन तिथि पर उनकी यह पहली विवाहगांठ मनाई जा रही है। यह संयोग इंदुलेखा के लिए वरदान से कम नहीं।
इस भावुक अवसर पर इंदुलेखा ने अपना भजन भी लॉन्च किया, जिसमें शब्द और स्वर बनकर उनका प्रेम छलक उठा-
‘ओ मुझे हो गया कन्हैया से प्यार, मैं तो वृन्दावन जाऊंगी...’
वृन्दावन में हैं बाँके बिहारी, लागे उनकी सूरत प्यारी, मैं तो देख-देख करूं प्यार…’
यह भजन संगीत भर नहीं, बल्कि उनकी आत्मा की पुकार है। एक स्त्री की कथा, जिसने संसार की ठोकरों से सीखकर ईश्वर को अपना सर्वस्व मान लिया।
आज वृंदावन की गलियों में इंदुलेखा की कहानी चर्चा का विषय रही। कोई इसे अटूट आस्था कह रहा है, कोई अंधविश्वास। लेकिन इंदुलेखा के चेहरे का संतोष और आंखों का प्रेम साफ़ कह देता है कि उनके लिए यह खबर नहीं, उनका सत्य है।