यूपी चुनाव से पहले भाजपा के सामने अपनों की नाराजगी का पहाड़, दस साल की सत्ता ने बढ़ाई कैडर और नेताओं के बीच दूरी; तीन महीने में डैमेज कंट्रोल की बड़ी चुनौती

उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव के मुहाने पर खड़ी भाजपा के लिए असली परीक्षा विपक्ष को चुनौती देने से पहले अपने घर को व्यवस्थित करने की है। चुनाव में सबसे कठिन चुनौती कभी-कभी विरोधियों से नहीं, अपने ही नाराज लोगों से मिलती है। पार्टी नेतृत्व ने नाराज कार्यकर्ताओं के रूप में यह चुनौती भांप ली है और डैमेज कंट्रोल पर काम भी शुरू हो चुका है।

Nov 7, 2026 - 10:37
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यूपी चुनाव से पहले भाजपा के सामने अपनों की नाराजगी का पहाड़, दस साल की सत्ता ने बढ़ाई कैडर और नेताओं के बीच दूरी; तीन महीने में डैमेज कंट्रोल की बड़ी चुनौती
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी भाजपा के सामने अब एक ऐसी चुनौती खड़ी हो गई है, जिसका सीधा संबंध उसके अपने संगठन और कार्यकर्ताओं से है। पार्टी के लिए चिंता का विषय विपक्ष की चुनावी रणनीति से ज्यादा अपने नाराज और निष्क्रिय होकर घर बैठे कार्यकर्ता हैं। दस साल तक प्रदेश की सत्ता में रहने के दौरान संगठन के भीतर जिस तरह गुटबाजी बढ़ी और जनप्रतिनिधियों के आसपास अवसरवादियों का जमावड़ा हुआ, उसने पार्टी के मूल कैडर और नेतृत्व के बीच दूरी पैदा कर दी है। अब पार्टी नेतृत्व को एहसास होने लगा है कि यदि समय रहते इस नाराजगी को दूर नहीं किया गया तो चुनाव में इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

भाजपा की राजनीतिक ताकत हमेशा उसका समर्पित कैडर रहा है। बूथ से लेकर जिला और प्रदेश स्तर तक पार्टी का संगठन ऐसे कार्यकर्ताओं के दम पर खड़ा हुआ, जिन्होंने सत्ता और पद की अपेक्षा किए बिना लंबे समय तक संगठन के लिए काम किया। लेकिन सत्ता में लगातार बने रहने का एक दूसरा पहलू भी सामने आया है। सांसदों, विधायकों, जिलाध्यक्षों और अन्य पदाधिकारियों के इर्द-गिर्द ऐसे लोगों का प्रभाव बढ़ा है, जिनकी राजनीतिक सक्रियता सत्ता के साथ बदलती रहती है। ये लोग जनप्रतिनिधियों को खुश रखने और अपना काम निकालने में माहिर हैं। नतीजा यह हुआ कि पुराने और समर्पित कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस करने लगे।

सत्ता के गलियारों में बढ़ा अवसरवादियों का प्रभाव

पार्टी के मूल कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि जनप्रतिनिधियों और संगठन के जिम्मेदार पदाधिकारियों तक उनकी पहुंच पहले जैसी नहीं रही। जिन लोगों ने वर्षों तक संगठन को खड़ा करने में मेहनत की, उन्हें अब तवज्जो नहीं मिलती, जबकि नेताओं के आसपास रहने वाले नए चेहरों को प्राथमिकता मिलने लगी है। जनप्रतिनिधियों के आसपास बना यह नया घेरा धीरे-धीरे इतना प्रभावशाली हो गया कि पुराने कार्यकर्ता अपनी बात कहने में भी असहज महसूस करने लगे।

इसका असर संगठन की सक्रियता पर पड़ा है। कई कार्यकर्ता पार्टी के कार्यक्रमों और गतिविधियों से दूरी बनाकर घर बैठ गए हैं। वे भाजपा से वैचारिक रूप से दूर नहीं हुए हैं, लेकिन स्थानीय नेतृत्व के व्यवहार और उपेक्षा ने उनकी सक्रियता जरूर कम कर दी है। यही स्थिति पार्टी के लिए सबसे बड़ी चिंता है, क्योंकि चुनाव में केवल नेताओं के चेहरे और भाषण नहीं, बल्कि बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता भी निर्णायक होती है।

जिलों में गुटबाजी भी बड़ी चुनौती

प्रदेश के अनेक जिलों में पार्टी के भीतर गुटबाजी ने संगठनात्मक एकजुटता को प्रभावित किया है। सांसदों, विधायकों और जिला स्तर के नेताओं के अपने-अपने समर्थक समूह बन गए हैं। कई जगह आपसी खींचतान के कारण संगठन की सामूहिक ताकत कमजोर हुई है। इसका नुकसान चुनाव के समय उम्मीदवारों के चयन, प्रचार और बूथ प्रबंधन तक पहुंच सकता है।

पार्टी नेतृत्व अब ऐसे जिलों पर विशेष ध्यान दे रहा है, जहां आपसी मतभेद चुनावी संभावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं। बड़े नेताओं को वहां भेजकर स्थानीय प्रभावशाली नेताओं से बातचीत कराई जा रही है। कोशिश है कि व्यक्तिगत नाराजगी और वर्चस्व की लड़ाई को संगठन के हित में खत्म कराया जाए।

भड़ास निकालने का मौका देकर कार्यकर्ताओं को जोड़ने की कोशिश

भाजपा नेतृत्व की रणनीति नाराज कार्यकर्ताओं को केवल समझाने तक सीमित नहीं है। उन्हें अपनी शिकायतें खुलकर रखने का अवसर दिया जा रहा है। नेतृत्व का आकलन है कि वर्षों से मन में जमा नाराजगी बाहर निकलने के बाद ऐसे कार्यकर्ता फिर से संगठन के काम में सक्रिय हो सकते हैं। पार्टी को भरोसा है कि वैचारिक रूप से भाजपा से जुड़े पुराने कार्यकर्ता अंततः संगठन के साथ ही रहेंगे। उनकी नाराजगी पार्टी से नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर उपेक्षा और व्यवहार को लेकर है।

इस अभियान में प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जिला स्तर के पदाधिकारियों को भी सक्रिय किया जा रहा है। संगठन और संघ के बीच समन्वय के जरिए उन कार्यकर्ताओं तक पहुंचने की कोशिश है, जो लंबे समय से निष्क्रिय हैं। उद्देश्य केवल नाराजगी दूर करना नहीं, बल्कि चुनाव से पहले संगठन की पुरानी ऊर्जा और कार्यशैली को वापस लाना है।

तीन महीने में संगठन को फिर खड़ा करने की चुनौती

भाजपा के सामने समय सीमित और काम बड़ा है। अगले तीन महीने उसके लिए संगठनात्मक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण होंगे। इस दौरान उसे नाराज कार्यकर्ताओं को मनाने, जिलों में गुटबाजी कम करने और जनप्रतिनिधियों तथा पुराने कैडर के बीच संवाद बहाल करने की चुनौती से निपटना है।

दरअसल, चुनावी राजनीति में कार्यकर्ता केवल भीड़ जुटाने वाला व्यक्ति नहीं होता। वह मतदाता और पार्टी के बीच सबसे महत्वपूर्ण संपर्क सूत्र होता है। यदि वही निष्क्रिय हो जाए तो संगठन की चुनावी मशीनरी कमजोर पड़ सकती है। भाजपा नेतृत्व इस वास्तविकता को समझ रहा है। अब देखना यह है कि नाराज कार्यकर्ताओं को मनाने की पहल कितनी प्रभावी साबित होती है और क्या सत्ता के दौरान बढ़ी नेताओं और कैडर के बीच की दूरी चुनाव से पहले पाटी जा सकेगी।

SP_Singh AURGURU Editor