न्याय में AI सहायक बने, निर्णायक नहीं: वरदान को अभिशाप बनने से बचाने के लिए संतुलित और जिम्मेदार उपयोग जरूरी
न्यायपालिका में लंबित करोड़ों मामलों के भारी बोझ के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एक उपयोगी सहायक के रूप में उभर सकता है। केस लॉ की त्वरित खोज, फाइलों का संक्षेप, तारीखों का प्रबंधन जैसे कार्यों में यह न्यायाधीशों का समय बचाकर प्रक्रिया को तेज कर सकता है। हालांकि, न्यायिक निर्णय, साक्ष्यों का मूल्यांकन और सज़ा जैसे संवेदनशील विषयों में मानवीय विवेक और संवैधानिक मूल्यों की ही सर्वोच्च भूमिका रहनी चाहिए। इसलिए AI का उपयोग नियंत्रित, पारदर्शी और मानवीय निगरानी में डिजिटल सहायक के रूप में किया जाना ही न्याय को अधिक सुलभ, त्वरित और प्रभावी बना सकता है।
-के.सी जैन-
गुजरात हाई कोर्ट ने हाल ही में अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के उपयोग को लेकर एक विस्तृत नीति जारी की है। इस नीति का शीर्षक है- ‘Policy on Use of Artificial Intelligence in Judicial and Court Administration’ इस नीति के अंतर्गत AI को प्रशासनिक कार्यों जैसे दस्तावेज़ों का अनुवाद, व्याकरण की जांच तथा तारीखों के निर्धारण जैसे कार्यों में उपयोग की अनुमति दी गई है, परंतु न्यायिक निर्णय, तर्क, साक्ष्यों के मूल्यांकन, जमानत, सज़ा तथा अंतिम निर्णयों में AI के उपयोग पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाया गया है। नीति का उल्लंघन करने पर संबंधित न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी प्रावधान किया गया है।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि न्याय का आधार मानवीय विवेक और संवैधानिक मूल्यों पर ही होना चाहिए तथा किसी भी AI द्वारा उत्पन्न सामग्री का उपयोग तभी किया जा सकता है, जब उसे एक सक्षम मानव अधिकारी द्वारा जांचकर सत्यापित किया जाए।
निस्संदेह, न्यायालय की यह चिंता सराहनीय है कि न्यायिक निर्णय एक संवेदनशील और विवेकशील मानव द्वारा ही लिए जाने चाहिए। किंतु इस नीति पर और अधिक गहनता से विचार किए जाने की आवश्यकता है।
वर्तमान समय में भारत की न्याय व्यवस्था अत्यधिक दबाव में है। देशभर की अदालतों में पाँच करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। सर्वोच्च न्यायालय में अस्सी हजार से अधिक, उच्च न्यायालयों में साठ लाख से अधिक और जिला अदालतों में चार करोड़ से अधिक मामले वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। एक सामान्य मुकदमे के निस्तारण में दस से बीस वर्ष तक का समय लग जाना आम बात है। ऐसी स्थिति में गरीब और मध्यमवर्गीय नागरिकों के लिए न्याय प्राप्त करना लगभग असंभव प्रतीत होता है। यह स्थिति उस मूल सिद्धांत को चुनौती देती है- ‘न्याय में देरी, न्याय का इनकार है।‘
ऐसे गंभीर परिदृश्य में AI एक अत्यंत उपयोगी और प्रभावशाली साधन सिद्ध हो सकता है। यह पूर्व के निर्णयों और केस लॉ को त्वरित रूप से खोज सकता है, प्रासंगिक विधिक धाराओं की जानकारी दे सकता है, मामलों का संक्षिप्त और सटीक सार तैयार कर सकता है, तिथियों का प्रबंधन कर सकता है तथा भारी-भरकम फाइलों को सरल रूप में न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है। इससे न्यायाधीशों का बहुमूल्य समय बचेगा और वे अधिक मामलों पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।
इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है- जैसे एक कुशल चिकित्सक एक्स-रे और पैथोलॉजी रिपोर्ट की सहायता लेता है, परंतु उपचार का अंतिम निर्णय अपने अनुभव और विवेक से ही करता है। उसी प्रकार AI न्यायाधीश का सहायक बन सकता है, उनके कार्यभार को कम कर सकता है, शोध में सहायता कर सकता है, परंतु अंतिम निर्णय सदैव न्यायाधीश का ही होना चाहिए।
अतः AI को न्यायपालिका से पूरी तरह दूर रखने के बजाय, उसे एक नियंत्रित, पारदर्शी और निगरानी युक्त दायरे में उपयोग किया जाना चाहिए। AI को न्यायालय का एक ‘डिजिटल मुंशी’ बनाया जा सकता है, जो दस्तावेज़ तैयार करे, कानूनों की खोज करे, तिथियों को व्यवस्थित करे और न्यायाधीश पूर्ण एकाग्रता के साथ निष्पक्ष न्याय प्रदान करें।
पाँच करोड़ लंबित मामलों के बोझ तले दबे इस देश में AI एक क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है, बशर्ते उसका उपयोग संतुलित, जिम्मेदार और मानवीय निगरानी में किया जाए। न्याय को त्वरित, सुलभ और किफायती बनाना ही करोड़ों नागरिकों के प्रति हमारी वास्तविक जिम्मेदारी है।
(लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)