पश्चिमी दुनिया का आकर्षणः झटके, अचंभे और अविश्वास! हरियाली देखकर दिल भर आया, समोसा याद आया तो घर लौट आया
यूरोप की यात्रा ने पश्चिमी दुनिया की साफ-सफाई, नागरिक अनुशासन, सार्वजनिक व्यवस्था और तकनीक से प्रभावित किया, लेकिन साथ ही वहां की मशीन-केंद्रित जिंदगी और सीमित मानवीय संवाद का अनुभव भी कराया। इसलिए यूरोप घूमने और उससे सीखने की जगह जरूर है, मगर घर लौटने पर भारत की तमाम कमियों के बीच भी वही अपनापन सबसे ज्यादा अपना लगता है।
-बृज खंडेलवाल-
पश्चिमी यूरोप में उतरते ही मेरा पहला सवाल था, “कूड़ा गया कहां?”
सड़क साफ। फुटपाथ साफ। पार्क साफ। नदी साफ। कूड़ेदान तक ऐसे खड़े जैसे गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने आए हों।
घास इतनी करीने से कटी कि लगा, हर सुबह कोई अधिकारी उसकी हाजिरी लगाता होगा।
मैंने सोचा, “अरे वाह! यहां तो घास भी अनुशासन का पालन करती है।”
भारत से आया आदमी पहले प्रभावित होता है। फिर थोड़ा शर्मिंदा। फिर सोचता है, “आखिर हमसे ऐसा क्यों नहीं होता?”
यहां कोई चलती कार से चिप्स का पैकेट बाहर नहीं फेंकता। कोई सड़क को अपनी निजी पार्किंग नहीं समझता। कोई गाड़ी आड़ी खड़ी करके नहीं कहता, “भाई, थोड़ा एडजस्ट कर लो।”
‘जुगाड़’ यहां शायद किसी संग्रहालय में संरक्षित भारतीय विरासत है।
मैंने यूरोप से लौटते समय दिमाग में एक लंबी सूची बनाई।
“भारत को इनसे यह सीखना चाहिए।”
फिर किसी ने पूछा,
“तो फिर यहीं बस क्यों नहीं जाते?”
मैंने कहा, “क्यों नहीं?”
लेकिन जिंदगी में कई बड़े फैसले पेट से होकर गुजरते हैं।
और मेरा पेट लोकतंत्र की तरह स्वतंत्र है।
समोसा बनाम सलाद
पहले ही कुछ दिनों में मुझे यूरोपीय भोजन की खूबसूरती समझ आ गई।
प्लेट शानदार। खाना नपा-तुला। सब्जियां सजी हुईं। मसाला इतना कम कि वह शायद खाने से पहले माफी मांगता हो।
फिर एक दिन मुझे समोसा याद आया।
ऐसा समोसा जो जीभ को जला दे, पेट को चुनौती दे और घर की याद को स्थायी बना दे।
मुझे सड़क किनारे की चाट याद आई।
वह गोलगप्पे वाली चाट जिसके सामने कोई स्वास्थ्य अधिकारी खड़ा हो जाए तो शायद उसकी नौकरी खतरे में पड़ जाए, लेकिन ग्राहक चटखारे लेकर खाए और कहे, “भैया, थोड़ा और तीखा लगाना।”
तब समझ आया कि सभ्यता की भी कई परिभाषाएं हैं।
एक है खूबसूरत लॉन।
दूसरी है अच्छा समोसा कहां मिलता है, यह पता होना।
यूरोप में मशीन आपकी सबसे करीबी रिश्तेदार है
यूरोप में हर चीज का सिस्टम है।
सिस्टम के पीछे प्रक्रिया है। प्रक्रिया के पीछे नियम है। नियम के पीछे मशीन है।
और मशीन के पीछे कोई इंसान है या नहीं, AI के ज़माने में यह हमेशा साफ नहीं होता।
एक जगह मैंने मुस्कुराकर कहा, “हैलो, कैसे हैं?”
सामने वाली महिला ने मशीन की ओर इशारा कर दिया।
मैं मशीन को देखता रहा।
मशीन मुझे देखती रही।
दोनों में कोई बातचीत नहीं हुई।
मुझे लगा, इंसान से बात करने वाला फीचर नए सॉफ्टवेयर अपडेट में हटा दिया गया है।
कहीं नकद पैसे निकालिए तो ऐसा लगता है जैसे आपने कोई पुरानी बीमारी पाल रखी हो।
कार्ड दीजिए।
बटन दबाइए।
मशीन चलाइए।
अपना सामान उठाइए।
और आगे बढ़ जाइए।
भारत में ऐसा नहीं है।
आप दुकान में बिस्कुट खरीदने जाते हैं।
दुकानदार पूछता है, “कहां से आए?”
आप बताते हैं।
फिर वह पूछता है, “बच्चे क्या करते हैं?”
फिर राजनीति।
फिर महंगाई।
फिर क्रिकेट।
फिर पड़ोसी।
और अगर समय ज्यादा हो तो ब्लड प्रेशर भी।
अंत में चाय।
यूरोप आपको सामान देता है।
भारत सामान के साथ कहानी भी देता है।
अंग्रेजी भी बेचारी हो जाती है
भारत में हम भाषाई दीवारों से परेशान रहते हैं।
फिर फ्रांस, जर्मनी या इटली पहुंच जाइए।
अचानक अंग्रेजी भी अनाथ लगने लगती है।
आप पर्यटक हैं। जेब में पैसा है। कैमरा है। नक्शा है।
लेकिन सामने वाला अपनी भाषा में ही खुश है।
कभी-कभी संदेश साफ महसूस होता है:
“आपके पैसे का स्वागत है। आपकी अंग्रेजी एक अलग मामला है।”
बेशक, यह हर जगह सच नहीं है।
लेकिन भारतीय आदमी को यह अंतर जरूर महसूस होता है।
भारत में बातचीत के लिए विषय की जरूरत नहीं होती।
कह दीजिए,
“आज गर्मी बहुत है।”
पांच मिनट बाद आपको सामने वाले का गांव, नौकरी, परिवार, राजनीतिक पसंद और कभी-कभी ब्लड प्रेशर तक मालूम हो सकता है।
यूरोप में सामने वाला शायद सोच रहा हो,
“इस आदमी को मेरे ब्लड प्रेशर से क्या मतलब?”
आत्मनिर्भरता या आत्म-सेवा?
यूरोप में सेल्फ सर्विस का बोलबाला है।
अपना सामान खुद उठाइए।
अपना खाना खुद लीजिए।
मशीन खुद चलाइए।
चेक-इन खुद कीजिए।
रास्ता खुद खोजिए।
कभी-कभी लगता है कि पर्यटन नहीं, जीवन-कौशल की परीक्षा चल रही है।
इसे श्रम की गरिमा कह सकते हैं।
लेकिन कभी-कभी मन कहता है,
“भाई, गरिमा अपनी जगह, कोई मेरा सूटकेस भी उठा दे!”
मजेदार बात यह है कि इसमें आम आदमी का दोष नहीं।
जहां इंसानी श्रम महंगा होता है, वहां मशीन का इस्तेमाल बढ़ता है।
दक्षता आती है।
समय बचता है।
खर्च घटता है।
लेकिन उसके साथ कुछ और भी घट सकता है।
इंसानी संपर्क।
होटल में गांधीजी अभी भी जिंदा हैं!
एक होटल की लिफ्ट में एक यूरोपीय सज्जन से भारत की बात छिड़ी।
उन्होंने बड़ी मासूमियत से पूछा,
“क्या वह डंडे वाला बूढ़ा अभी भी अंग्रेजों से लड़ रहा है?”
मैं कुछ पल उन्हें देखता रहा।
उनकी पत्नी ने धीरे से समझाया कि अंग्रेज कुछ समय पहले जा चुके हैं।
मैं कहना चाहता था, “ढेर सारे नए गांधी भी आ चुके हैं, साहब।”
लेकिन लिफ्ट हमारी मंजिल पर पहुंच गई।
इतिहास वहीं समाप्त हो गया।
रात नौ बजे होटल पहुंचिए, फिर भगवान मालिक
यूरोप की असली परीक्षा तब होती है जब टूरिस्ट बस आपको होटल से सौ मीटर पहले उतार दे।
सामने अंधेरा रास्ता।
हाथ में सूटकेस।
ड्राइवर का इशारा,
“पहाड़ी पर होटल उधर है।”
भारत में ऐसी स्थिति में कोई न कोई आदमी तुरंत प्रकट हो जाता।
“लाइए साहब, मैं उठा देता हूं।”
यूरोप में आप अपना सामान खुद उठाते हैं।
होटल पहुंचिए।
रिसेप्शन पर एक व्यक्ति।
चाबी लीजिए।
फिर लिफ्ट।
इतनी छोटी कि उसमें या तो आप जा सकते हैं या आपका सूटकेस।
दोनों साथ जाएं तो यूरोपीय इंजीनियरिंग की परीक्षा शुरू हो सकती है।
कमरे में पहुंचे।
पानी की बोतल नहीं।
अब अगला सांस्कृतिक प्रश्न।
बाथरूम में पानी कहां है?
यूरोप कहता है, “टिश्यू है।”
भारत कहता है, “पानी है।”
मैंने सोचा, सभ्यता की बहस बाद में करेंगे। पहले नल ढूंढते हैं।
यूरोप में सार्वजनिक शौचालयों के लिए शुल्क देना भी कई जगह सामान्य है।
भारत में आदमी कह सकता है,
“पहले काम निपटाओ, पैसे कहीं भी, कैसे भी, आजादी है।”
यूरोप की रात: शहर सोता नहीं, बस घर चला जाता है
रात होते ही कई यूरोपीय शहरों में ऐसा सन्नाटा उतरता है कि भारतीय पर्यटक घड़ी देखकर परेशान हो जाए।
हमारे यहां रात के दस बजे भी चाय की दुकान पर राष्ट्रीय राजनीति का भविष्य तय हो रहा होता है।
वहां कई जगहों पर ऐसा लगता है कि शहर ने सामूहिक रूप से घोषणा कर दी है,
“भाइयो, अब कल मिलेंगे।”
सड़कें शांत।
दुकानें बंद।
रोशनी सीमित।
और पर्यटक सोचता है,
“अब करें क्या?”
भारत में इस समय तक कोई न कोई आवाज जरूर आती है।
“चाय?”
यही दो अक्षर भारतीय सभ्यता की रीढ़ हैं।
कूड़ेदान भी हमसे आगे निकल गया
यूरोप की सबसे बड़ी सीख सफाई है।
कचरा अलग।
डिब्बे अलग।
जिम्मेदारी अलग।
और कई देशों में रीसाइक्लिंग की व्यवस्था काफी विकसित है। 2023 में यूरोपीय संघ में औसतन 48 प्रतिशत नगरपालिका कचरे का पुनर्चक्रण हुआ। जर्मनी में यह दर 69 प्रतिशत थी।
भारत में समस्या सिर्फ कूड़े की नहीं है।
कई बार समस्या यह है कि कूड़ेदान कहां है, यह ही पता नहीं चलता।
और कूड़ेदान मिल जाए तो उसके बाहर कचरे का छोटा-मोटा गणतंत्र बस चुका होता है।
इस मामले में मजाक नहीं होना चाहिए।
हमें यूरोप से सीखना ही होगा।
लेकिन यूरोप कोई स्वर्ग भी नहीं
यात्रा के दौरान एक बात समझ आई।
हर समाज की अपनी खूबियां हैं और अपनी कमियां।
यूरोप व्यवस्थित है, लेकिन हर यूरोपीय शहर एक जैसा नहीं।
कहीं व्यवस्था शानदार है, कहीं समस्याएं भी हैं।
कहीं भाषा की दूरी है।
कहीं महंगाई है।
कहीं आवास का संकट है।
कहीं अकेलापन है।
इसलिए दूर से चमकती तस्वीर को पूरा सच मान लेना भी ठीक नहीं।
लेकिन इतना जरूर है कि सार्वजनिक व्यवस्था को गंभीरता से लेने की यूरोपीय आदत हमें प्रभावित करती है।
तो क्या मैं वहां बसूंगा?
अब मेरा जवाब साफ है।
घूमने के लिए यूरोप शानदार है।
बसने के लिए...
थोड़ा सोचूंगा।
क्योंकि मुझे सड़कें पसंद आईं।
मुझे ट्रेनें पसंद आईं।
मुझे साफ पार्क पसंद आए।
मुझे नदियां पसंद आईं।
मुझे सार्वजनिक व्यवस्था पसंद आई।
लेकिन घर लौटकर कुछ और भी याद आया।
सड़क किनारे की चाय।
गरम समोसा।
बिना बुलाए बातचीत।
दुकानदार का सवाल,
“कहां से आए हो?”
वेटर का आग्रह,
“साहब, यह भी चखिए।”
पोर्टर का कहना,
“आप रहने दीजिए, मैं उठा देता हूं।”
और सबसे ज्यादा याद आया भारत का शोर।
भारत की अफरातफरी।
भारत का जुगाड़।
भारत की बहस।
भारत की हंसी।
भारत का वह अजीब-सा अपनापन जो कभी-कभी बिना टिकट आपके कमरे में भी पहुंच जाता है।
यूरोप में मशीन आपको बताती है कि क्या करना है।
भारत में बगल वाला आदमी बताता है।
मशीन ज्यादा कुशल है।
आदमी ज्यादा मजेदार है।
और शायद यही फर्क सिस्टम और समाज के बीच है।
यूरोप से भी सीखेंगे, भारत को भी नहीं छोड़ेंगे
भारत को यूरोप से बहुत कुछ सीखना चाहिए।
सफाई।
नागरिक अनुशासन।
कचरा प्रबंधन।
सार्वजनिक परिवहन।
शहरी योजना।
ऊर्जा की बचत।
सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान।
लेकिन आधुनिकता का मतलब यह नहीं कि इंसान को मशीन में बदल दिया जाए।
थोड़ी गर्मजोशी बची रहनी चाहिए।
थोड़ी बेवकूफी भी।
थोड़ी बातचीत।
थोड़ी बहस।
थोड़ी गुंजाइश गलती की।
और कभी-कभी किसी अजनबी से दोस्ती की गुंजाइश।
मैं यूरोप से दो स्मृतियां लेकर लौटा हूं।
पहली, यूरोपीय व्यवस्था के लिए गहरा सम्मान।
दूसरी, भारतीय अव्यवस्था के लिए उससे भी गहरा प्यार।
वहां लॉन ज्यादा सुंदर हैं।
सड़कें ज्यादा चिकनी हैं।
सिस्टम ज्यादा मजबूत हैं।
लेकिन मुझे एक गरमागरम समोसा दे दीजिए।
सड़क किनारे की चाय पिला दीजिए।
और पास में कोई अजनबी बैठा दीजिए जो क्रिकेट, राजनीति, मौसम और महंगाई पर बहस करने को तैयार हो।
फिर पूछिए,
“कहां रहना पसंद करेंगे?”
मेरा जवाब शायद होगा:
“यूरोप घूमने के लिए बहुत अच्छा है।
घर के लिए भारत ही ठीक है।”
क्योंकि भारत परफेक्ट नहीं है।
शायद कभी होगा ।
लेकिन उसकी खामियों में भी लोग हैं।
उनकी आवाजें हैं।
उनकी हंसी है।
उनकी बहसें हैं।
उनकी शिकायतें हैं।
उनका अपनापन है।
और शायद घर वहीं होता है, जहां कोई आपको देखकर पूछे:
“चाय पियोगे?”