अमेरिका, ट्रम्प और वैश्विक सत्ता का जटिल समीकरण: धर्म, राजनीति और डॉलर की धुरी पर घूमती विश्व व्यवस्था

वैश्विक राजनीति को केवल व्यक्तियों या सतही घटनाओं से नहीं समझा जा सकता। अमेरिका की शक्ति केवल उसके नेताओं से नहीं बल्कि उसकी आर्थिक, तकनीकी और संस्थागत संरचना से आती है। आधुनिक युद्धों के पीछे अक्सर भू-राजनीतिक और आर्थिक हित होते हैं, जबकि वैश्विक अर्थव्यवस्था अभी भी बड़े पैमाने पर डॉलर की धुरी पर घूमती है।

Mar 5, 2026 - 20:15
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अमेरिका, ट्रम्प और वैश्विक सत्ता का जटिल समीकरण: धर्म, राजनीति और डॉलर की धुरी पर घूमती विश्व व्यवस्था

-पूरन डावर-

आम आदमी की सोच अक्सर सीमित दायरे तक ही सिमट जाती है। हर बात या हर परिस्थिति को हम पूरी तरह सही ढंग से नहीं समझ पाते और कई बार एकतरफा दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ते रहते हैं। उदाहरण के तौर पर बहुत से लोग अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की कार्यशैली के कारण उनके विरोधी हो सकते हैं और यह स्वाभाविक भी है, लेकिन यह समझना भी उतना ही आवश्यक है कि ट्रम्प ही अमेरिका नहीं हैं और अमेरिका केवल ट्रम्प तक सीमित भी नहीं है। जो लोग आज अमेरिका को कमजोर या समाप्त होता हुआ मान रहे हैं, उन्होंने अभी उसकी वास्तविक शक्ति, उसकी वैश्विक भूमिका, विज्ञान-प्रौद्योगिकी की क्षमता और अंतरिक्ष तक उसकी पहुंच का शायद एक प्रतिशत भी नहीं देखा है।

इतिहास यह बताता है कि सत्ताएं भले ही धर्म का सम्मान करें या उसके मूल्यों से प्रेरणा लें, लेकिन उनका स्वरूप मूलतः राजनीतिक होता है, धार्मिक नहीं। यदि भारत में शंकराचार्य सीधे शासन चलाने लगें या ईसाई देशों में पोप राज्य की सत्ता संभाल लें, तो शासन का स्वरूप असामान्य लगने लगेगा। इसी प्रकार किसी भी आधुनिक राष्ट्र में धार्मिक नेतृत्व का सीधा राजनीतिक वर्चस्व स्थायी समाधान नहीं हो सकता। किसी भी देश या समुदाय को दूसरे समुदाय, चाहे वह यहूदी हों या कोई और, के अस्तित्व के अधिकार से वंचित करने का अधिकार नहीं है।

सनातन परंपरा का मूल विचार भी सहअस्तित्व का है। वह यह नहीं कहती कि इस्लाम, जो इतिहास में बाद में आया, को जीने का अधिकार नहीं है। वास्तव में आधुनिक संघर्षों को केवल धार्मिक युद्ध के रूप में देखना भी पूरी सच्चाई नहीं है। कई बार धर्म केवल एक आवरण बन जाता है, जबकि उसके पीछे तेल, सामरिक हित, आर्थिक प्रतिस्पर्धा या चीन जैसे वैश्विक शक्ति समीकरणों की भूमिका भी सक्रिय रहती है। इजराइल-अमेरिका के ईरान से संघर्ष की पृष्ठभूमि में भी कुछ ऐसा ही नजर आता है।

सत्ता प्राप्त करने और रावण से युद्ध करने के लिए भगवान राम को भी दिव्य स्वरूप में नहीं, बल्कि एक साधारण मानव के रूप में जन्म लेना पड़ा। उन्हें वानरों और वनवासियों की सहायता लेनी पड़ी और संघर्ष के हर चरण में जनसमर्थन तथा समाज की भावनाओं का ध्यान रखना पड़ा। यही कारण था कि राजा बनने के बाद भी उन्हें जनता की शंका और प्रश्नों को महत्व देना पड़ा, यहां तक कि लोकमत के कारण उन्हें अपनी पत्नी सीता से भी विरह स्वीकार करना पड़ा। यह प्रसंग बताता है कि सत्ता केवल शक्ति से नहीं, बल्कि जनता की भावनाओं और स्वीकार्यता से चलती है।

वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों को भी इसी दृष्टि से देखा जा सकता है। इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच के युद्ध को भी भारत के ऒपरेशन सिंदूर की तरह ही देखा जाना चाहिए। ऒपरेशन सिंदूर आतंकवादियों के खात्मे के लिए था। ईरान के साथ भी युद्ध नहीं बल्कि यह एक विशिष्ट सैन्य अभियान या ऑपरेशन है। ऐसे अभियानों का उद्देश्य पूरे देश को निशाना बनाना नहीं होता, बल्कि विशेष संगठनों, सैन्य ठिकानों या सत्ता संरचनाओं को कमजोर करना होता है। ईरान में आईआरजीसी और खामनेई को टारगेट किया गया है, जो क्षेत्रीय संघर्षों को हिजबुल्लाह हों, हूती हों, हमास हों या अन्य समूहों के जरिए हवा देते रहे हैं।

दूसरी ओर वैश्विक राजनीति का एक बड़ा आयाम आर्थिक और सामरिक प्रतिस्पर्धा भी है। जब से चीन ने रेयर अर्थ मटेरियल जैसी रणनीतिक धातुओं के माध्यम से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी ताकत दिखानी शुरू की है, तब से ऊर्जा आपूर्ति और तेल मार्गों पर नियंत्रण का महत्व और बढ़ गया है। वेनेजुएला, ईरान या रूस से आने वाली तेल आपूर्ति और उसके वैश्विक संतुलन पर भी अमेरिका जैसी बड़ी शक्तियों की निगाह रहती है।

इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में आज भी अमेरिकी डॉलर एक महत्वपूर्ण धुरी बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार से लेकर अनेक वैश्विक संस्थाओं, जैसे संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक, विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनेस्को और नाटो की आर्थिक संरचनाएं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से डॉलर आधारित व्यवस्था से जुड़ी हुई हैं। यही कारण है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा उसी के इर्द-गिर्द घूमता है।

स्थिति कुछ वैसी ही है जैसे कहा जाता है- खरबूजा छुरी पर गिरे या छुरी खरबूजे पर, कटता अंततः खरबूजा ही है। उसी प्रकार वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में चाहे परिस्थितियाँ अमेरिका के पक्ष में हों या विरोध में, डॉलर का प्रभाव अक्सर बना रहता है।

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(लेखक आगरा के प्रमुख उद्योगपति, विचारक और विश्लेषक हैं)

SP_Singh AURGURU Editor